सोमवार, जनवरी 09, 2017

एमपी का दशरथ मांझी ‘सुखदेव’, पत्थरों में निकाला पानी

PIC: RAKESH KUMAR MALVIYA
 -    राकेश कुमार मालवीय

वो न शानदार बोलता है, जबर्दस्तजिंदाबाद। सुखदेव किसी के गम मे बावरे भी न हैं। उनका मानसिक संतुलन ​बिलकुल ठीक है। लेकिन उनका हौसला बीवी की ​जुदाई में गमगीन दशरथ मांझी से बिलकुल भी कम नहीं है। वही दशरथ मांझी जिसकी कहानी आप रुपहले परदे पर देख चुके हैं। दशरथ ने पहाड़ तोड़ सड़क निकाल दी, सुखदेव ने बंजर पथरीली जमीन खोद पाताल से पानी निकाल दिया। इस पानी से सुखदेव की जिंदगी लहलहा गयी है। एक और फिल्मी सी लगने वाली कहानी इस बार जमीन पर उतरी है मध्यप्रदेश में। सतना जिले का सुखदेव आदिवासी मध्यप्रदेश का नया दशरथ बन गया है।

सतना जिले का मझगवां ब्लाक यूं तो पिछले सालों में आदिवासी बच्चों की कुपोषण से मौत के मामले में सुर्खियों में रहा है लेकिन यहां पर यही आदिवासी अपने संघर्ष से कामयाबी की मिसाल गढ़ रहे हैं। ब्लॉक मुख्यालय से बिरसिंहपुर जाने वाली सड़क का एक रास्ता सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम की ओर जाता है। कहा जाता है कि यहां पर भगवान राम ने वनवास के दौरान एक रात का वक्त गुजारा था। एक प्राचीन मंदिर और एक कुंड से हमेशा बहती रहने वाली जलधार यहां का वातावरण सुंदर बनाती है, लेकिन कुदरत का यह आशीर्वाद लोगों के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके आसपास के इलाके में पानी की भारी किल्लत है।

इस आश्रम से थोड़ी ही दूर पर बसे ग्राम सिल्हा में सुखदेव रावत (कोल आदिवासी) अपने परिवार के साथ रहते हैं। सुखदेव को कुछ साल पहले जमीन का एक छोटा सा बंजर पथरीला टुकड़ा सरकार ने बंटन में दिया था। यह टुकड़ा कैसा रहा होगा ? इसका अंदाजा लगाने के लिए आपको ज्यादा मेहनत नहीं करनी है। आप सुखदेव के घर के ठीक दूसरी तरफ देख लेंगे तो पता चल जाएगा कि कुछ इंच मिट्टी के बाद पत्थर के अलावा कुछ नहीं है और कुछ पत्थरों के पास तो तन ढंकने को मिट्टी भी नहीं है। यह पत्थर चुनौती देते हैं कि आओ, कुछ कर सको तो कर लो, हम तो पत्थर हैं।

पत्थरों से लड़ना कोई आसान तो नहीं, पर जाने कहां से सुखदेव के मन में यह बात गहरे बैठ गई कि इन्हीं पत्थरों  से बीच से पानी निकालना है। साल 2009 में शुरू हुआ उसका यह मिशन एक दो दिन नहीं चला। पूरे पांच साल लगे, यह अब भी जारी है, पांच साल में करीब 1825 दिन होते हैं, लेकिन एक दिन भी निराशा का भाव मन में नहीं आना, ही तो सुखदेव है। एकएक पत्थर को हथौड़े से हराना आसान नहीं था, लेकिन धीरेधीरे 35 फिट तक पत्थरों को हराने में अपना पसीना बहाता गया यह हाड़ मांस का जुनूनी आदमी। वह भी अपने दम से, गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले सुखदेव के पास उसका शरीर ही एकमात्र मशीन थी। लोग उस पर हंसते, पर उसका मन कहता कि ‘एक दिन वह जीतेगा जरूर’। उसके इस जुनून पर हमारा सवाल स्वाभाविक था, “कहां से मिल गई इतनी ताकत ?” उसका जवाब सीधा और सरल ‘अपने मन से। हमारा मन कहता था यहां पर एक दिन पानी जरूर निकलेगा।‘

PIC: RAKESH KUMAR MALVIYA
धीरेधीरे वह अपने सारे हथियार वहां जमा कर लेता हैं। हथियार इसलिए लिख रहा हूं, क्योंकि यह जंग ही तो था, पत्थरों से लड़ना, जो औजारों से नहीं जीती जा सकती। पत्थर पसीनों की बूंदों से भी नहीं पिघलते, श्रम कणों को बेहरमी से भाप बनाकर उड़ा देते हैं और मेहनत का मखौल उड़ाते हैं। उसका हथौड़ा, उसकी कुदाल, उसका सब्बल, उसका फावड़ा भी अब इस जीत के साथ सुखदेव के साथ इतराते से नजर आते हैं। आखिर पाताल बसे पानी को पचास फुट का पत्थर अपने दम पर अकेले जो निकाल दिया। एकएक चोट का निशान पत्थरों पर साफ नजर आता है, विभिन्न आकृतियों में, जैसे कोई कुआं न हो, हो कोई कलाकृति।

पत्थरों को भी महज पत्थर समझकर फेंक न दिया सुखदेव ने। उसे भी सम्मान दिया अपने घर में। जमीन का पत्थर अब जमीन के उपर सुखदेव के परिवार को आसरा देता है। सुखदेव का डुप्लेक्स गजब का है। दो कमरे उपर दो नीचे। रोशनी और अहवा का इंतजाम। वह बताते हैं ‘महसूस कीजिए, ठंड के मौसम में भी घर गरम है और गरमी में यह ठंडाता है। सचमुच, ऐसे ही तो सुखदेव जैसे लोगों ने सदियों से अभावों में जीना नहीं सीख लिया। मिट्टी की दीवारे हैं, लिपीपुती सी। घर के अंदर हाथ से चलने वाली घट्टी  है । घर के बाहर एक और है वह मोटे अनाज के लिए है। बीच में तुलसी क्यारा है, इसमें गेंदे के फूल लगे हैं। घर की दीवारों पर बच्चों के नाम दीवार छाबते वक्त ही उकेर दिए गए हैं स्थायी रूप से, उसमें लड़की का नाम भी है हिना। और हम कहते हैं लड़की पराये घर की होती है। कुछ बच्चों के अंग्रेजी के पहला अक्षर निकालकर शॉर्ट फार्म भी बनाए गए हैं।

इस हाड़तोड़ मेहनत के बाबद सुखदेव और उसके परिवार में क्या बदला। इसका कोई बहुत बड़ा पैमाना नहीं है। है तो केवल हरियाली। कुएं से सटी छोटी सी जमीन पर सात प्रकार के फलों के पौधे पेड़ बनने को आतुर हैं। खाने-पीने की लिए सब्जियां अलग हैं। घर के पीछे अरहर की फसल सर्द मौसम में एक संगीत रच रही है। ऐसा इसलिए हो पाया, क्योंकि अब सुखदेव के पास अपना कुआं है, अपनी मेहनत का पानी है।

(यह न्यूज फीचर खबर एनडीटीवी पर प्रकाशित हुआ है।) 


बुधवार, दिसंबर 28, 2016

समझें अपनी विरासत का मूल्य: दैनिक भास्कर की अच्छी पहल

अनुपम मिश्र अब हमारे बीच नहीं हैं। उनके जाने के बाद लोग अपने तई उन्हें याद कर रहे हैं। लेकिन दैनिक भास्कर इस संदर्भ में एक खास मुहिम चला रहा है। पिछले आठ—दस रोज से हर दिन अनुपम मिश्र और उनके पिता भवानी प्रसाद मिश्र के गांव टिगरिया पर रोज लिखा जा रहा है। यह बहुत अच्छी कोशिश है। हमें अपनी विरासत के मूल्य को समझना चाहिए। इस बहाने कुछ ठोस हो सके तो बहुत अच्छा। क्योंकि इस जिले ने माखनलाल चतुर्वेदी, हरिशंकर परसाई और भवानीप्रसाद मिश्र जैसे साहित्यकार दिए। 

इस सीरीज को चलाने वाली युवा पत्रकार सुरभि नामदेव बधाई की पात्र हैं। 

-राकेश कुमार मालवीय














मंगलवार, दिसंबर 20, 2016

स्मृति: खुद भी उतने ही खरे, जितने कि उनके तालाब




Anupam Mishra in Kesla Media Conclave: Pic Gagan Nayar
बचपन से जिन कुछ बातों पर हम गांव के दोस्त इतराते थे, उनमें एक यह कि हमारे गांव में एक भारतीय आत्मा माखनलाल चतुर्वेदी ने गुरूकुल ‘सेवा सदन’ स्थापित किया था। जिसे बचपन से ‘सौराज’ सुनते आए, बहुत बाद में यह समझ आया कि यह ‘स्वराज’ होतेहोते ‘सौराज’ हो गया, वह इसलिए कि आजादी की गुप्त बैठकें यहां क्रांतिकारी किया करते थे। 
 
इतराने का दूसरा बहाना यह कि गांव से तेरह किलोमीटर की दूरी पर सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का जन्म हुआ। पाठ्यपुस्तकों में जब लेखक परिचय पढ़ाया जाता, उसमें यह पढ़कर बहुत अच्छा लगता कि अरे यह तो अपने बाजू का ही गांव ‘जमानी’ है।

तीसरी बात यह भी कि हमारे ही गांव से पंद्रह बीस किलोमीटर की दूरी पर नर्मदा किनारे एक और छोटा सा गांव है टिगरिया, जिसे हम सतपुड़ा के घने जंगल वाले भवानी प्रसाद मिश्र के गांव से जानते हैं,  इसलिए भी जानते हैं क्योंकि यह गांव ‘आज भी खरे हैं तालाब वाले’ अनुपम मिश्र से भी जुड़ा। वह वहां पैदा तो नहीं हुए, लेकिन हर हिंदुस्तानी का एक गांव तो होता ही है। अनुपम जी ने हिन्दुस्तान के हजारों गांवों को अपना बनाया। अपने काम की अमि‍ट छाप छोडी। वह हमारे बीच अब नहीं हैं। लंबे समय से कैंसर से लड्ते हुए भी अपना काम कर रहे थे। 

न तो उस वक्त पत्रकारिता की कोई समझ थी, साहित्य अपने लिए उतना ही था जितना कि हिंदी की किताबों में पढ़ रहे थे, लेकिन अपने आसपास तीन-तीन सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक विभूतियों का जन्म गर्व करने का एक मौका तो देता है, बिना मिलेदेखे ही। वक्त ने ‘मन्ना’ के योग्य बेटे अनुपमजी के साथ थोड़ा बहुत समय गुजारनेबातचीत करने और सीखने का मौका जरूर दिया, ऐसे वक्त में जबकि हमारे पास आदर्शों का बड़ा संकट है, वह हमें रोशनी दिखाते थे। ‘मन्ना’ के जीवन आदर्शों का विस्तार अनुपम थे। 

वैसे अनुपमजी को पहली बार ग्राम सेवा समिति में सुनने को मिला। होशंगाबाद में यह गांधीवादी संस्था उस जमाने में बनी थी, जब अनुपमजी ने प्राइमरी स्कूल में दाखिला भी नहीं लिया होगा। इस संस्था से भवानी भाई,  गांधीवादी बनवारीलाल चौधरी आदि का जुड़ाव बना था। सत्तर के दशक में जब तवा बांध तैयार हुआ और उसने पूरे जिले में दलदल की भयावह समस्या पैदा कर दी तब बनवारी लाल चौधरी जी ने देश में पहली बार बड़े बांधों के खतरों से आगाह कराते हुए मिट्टी बचाओ आंदोलन शुरू किया था। इसमें अनुपम मि‍श्र की सक्रि‍य भागीदारी थी। 

Anupam Mishra's Book on Mitti Bachao Abhiyan
बांधों के विरोध में यह नर्मदा बचाओ आंदोलन से भी पहले का एक अभियान था, जिसने पर्यावरणीय मसलों पर यह आवाज उठाई थी। आज भी खरे हैं तालाब की लाखों कॉपि‍यों को घर-घर पहुंचाने वाली इस करि‍श्‍माई लेखक की पहली कि‍ताब इसी अभि‍यान की पुस्‍ति‍का थी। इसी जुड़ाव के चलते भवानी भाई और उनके पिता भी की याद में हर साल होने वाले कार्यक्रम में आते रहे। वह हमेशा अपने से लगे।

इस बात पर कोई विवाद ही नहीं है कि अपने काम के दायरे को सर्वश्रेष्ठ स्तर पर पहुंचाने के बावजूद इतनी सरलता प्रायः कम ही देखने को मिलती है। कठिन लिखना आसान है, लेकिन आसान लिखना कठिन है की परिभाषा को किसी के व्यक्तिव के मामले में लागू किया जा सकता है, लेकिन वह सचमुच आसान थे। इतने कि यदि उन्हें बिना दाढ़ी मूंछों वाला संत कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, उन्हें करीब से जानने वाले समझते हैं क्योंकि उनके मुंह से किसी की निंदा सुनना मुश्किल ही था। हां, वि‍षय और व्‍यवहारों पर वह जरूर खरा बोलते थे।

जिस वक्त में रायपुर में रहकर एक मीडिया संस्थान में काम कर रहा था, उनका रायपुर आना हुआ। उनसे मैंने एक मीडिया प्रतिनिधि के रूप में ही साक्षात्कार के लिए समय लिया था। तय वक्त पर वीआईपी गेस्ट हाउस पहुंचा, उस वक्त वह भाजपा नेता नंदकुमार साय से लंबी चर्चा कर रहे थे। चर्चा कुछ ज्यादा लंबी हो गई। मेरा नंबर आया तो एक दो सवालों के बाद मेरा अपना गांव का परिचय निकल आया क्योंकि दोपक्षीय संवाद का यह पहला मौका था उनके साथ। तब तो उन्होंने मुझे घर का मोड़ा बताकर मेरा इंटरव्यू टाल ही दिया और अधिकारपूर्वक कहा कि अपन दोपहर में बात करते हैं, उन्हें कार्यक्रम के लिए देर भी हो रही थी। यह उनका एक सहज और आत्मीय भाव था। 

बाद में वह इंटरव्यू नहीं हो सका, लेकिन मैं अवाक रह गया जब दस दिन बाद उन्होंने फोन करके कहा कि अपनी तो उस दिन पूरी बात ही नहीं हो पाई। ऐसा हम कितने लोग कर पाते हैं। हम लोग की जेब में अब महंगे फोन तो हैं, इंटरनेट का फ्री जीओ डेटा पैक भी है, पर संवाद के मामले में तो हम कंगाल हुए जा रहे हैं।

वह जेब में बिना मोबाइल फोन डाले भी खूब संवाद कर लेते थे, सबके साथ संवाद कर लेते थे, भैयाभैया की भाषा में संवाद कर लेते थे। ऐसा नहीं था कि उन्हें तकनीक से परहेज था। कठिन दौर की फोटोग्राफी कर उन्होंने अपने पानी के काम में खूब प्रयोग किया, पानी के काम को दूरदूर तक पहुंचाने, उसे लोगों तक समझाने में वह अर्से से अपने स्लाइड शो का इस्तेमाल करते रहे, लेकिन सोशलमीडिया के भेड़ियाधसान से बचते हुए उन्होंने संवाद की एक समृद्ध परंपरा को हमारे लिए इस दौर में भी दिखाकर गए हैं।

आज लगातार यात्रा करते हुए वह याद इसलिए भी आते रहे क्योंकि उनसे दिल के बहुत करीब से जुड़े सर्वोदय प्रेस सर्विस के संपादक चिन्मय मिश्र के साथ में यात्रा करता रहा। जिनसे हर दस दिनों में वह घंटों संवाद किया करते थे। सर्वोदय प्रेस सर्विस देश की सबसे पुरानी समाचार और विचार सेवा है, जिसे विनोबा भावे ने एक रूपए का दान देकर शुरू करवाया था। संसाधनों के अभाव में यह आज भी निरंतर है, अनुपम जैसे ही कुछ लोगों के कारण। उन्होंने खुद भी तो अपने को वैसा ही ढाला था। दिल्ली जैसे क्रूर शहर में बारह हजार रूपए की पगार पर कौन कितने दिन जिंदा रह पाता है।

Anupam Mishra : Pic By Gagan Nayar.
अनुपम हमारे लिए बहुत कुछ छोड़ गए हैं। एक जीवनशैली, एक लेखनशैली, एक विचारशैली, एक व्यक्तित्वशैली। वह हमें इस दौर में भी कभी निराश नहीं करते। हमेशा उम्मीद बंधाते हैं। जैसे कि लोगों ने उनकी किताब पढ़कर लाखों तालाबों के पाल बांध दिए। उनमें एक तालाब मेरे गांव हि‍रनखेडा का भी है, वह नया नहीं है, हजारों साल पुराना गोमुखी तालाब है, जिसके बारे में वह खुद भी बताते थे। कहींकहीं बातचीत में उसका जिक्र भी करते। तालाब हमें आत्मनिर्भरता देता है, अपनी आजादी देता है, अपने पानी के साथ अपना जीवन देता है, समृद्धता देता है। हमारे अपने तालाबों का बचना, अपनी आत्मनिर्भरता और अपनी अस्मिता का बचना बेहद जरूरी है इस दौर में। 

उनके जीवन का आकाश बहुत बड़ा था, उसका एक छोटा सा टुकड़ा हमें मिल पाया। यह छोटा भी विशाल है। वह हमेशा हमारी प्रेरणाओं में रहेंगे। नमन।

 (यह ब्लॉग एनडीटीवी खबर पर भी प्रकाशित हुआ है।)

शुक्रवार, नवंबर 11, 2016

क्या हम बिना नगदी के कुछ समय रह सकते हैं


इस दौर में जबकि तमाम तरह की सर्जरी देश में चल रही हैं, यह बात करना कि ‘क्या हम कुछ समय बिना नगदी के रह सकते हैं,’ अटपटी लग सकती है। हालांकि यह उतनी अटपटी नहीं है जितनी कि आज के दौर में बना दी गई है। यह कोई नयी बात नहीं है, हमारे समाज में पारंपरिक रूप से ऐसा होता चला आया है। आज जबकि पांच सौ और हजार रुपयों के नए नोट लाने पर ‘देश थमने’ जैसा हंगामा खड़ा हो गया तभी मुझे अचानक वह सब स्थितियां एकएक कर याद आने लगी जहां कि बिना नगदी के भी काम चल जाया करता था।

ऐसी व्यवस्था में लेनदेन केवल नगदी और वस्तु आधारित नहीं था, उसके पीछे के रिश्तेनाते और एक दूसरे की खैरखबर भी हुआ करती थी। विकास की मोटरबोट पर सवार जीडीपी के ज़माने में इसे आप पुरातनपंथी राग की संज्ञा भी दे सकते हैं,  लेकिन यह भी सच है कि प्लास्टिक मनी से लेकर ऑनलाइन लेनदेन की एक पल में धराशायी हो जाने वाली व्यवस्थाओं (जैसे कि हमने पिछले दिनों एसबीआई कार्ड के संदर्भ में देख भी लिया) के पीछे अंधी दौड़ लगाते हुए हम समय से कुछ ज्यादा ही तेज भाग रहे हैं। इसमें हम यह भी नहीं देखते कि कौन दौड़ पा रहा है....? कौन नहीं दौड़ पा रहा है...?  कौन पीछे छूट गया है...? और कौन तो इसमें औंधे मुंह गिर ही पड़ा है !

इसे आप बाजार विरोधी (और कई लोग इसे विकास विरोधी भी मानेंगे) सोच भी कह सकते हैं। यह सोच मार्केट को उतना ही फायदा पहुंचाती है,  जिससे कि जीता रहे। इस सोच में हो सकता है कि चमचमाती जिंदगी मयस्सर न हो,  लेकिन यह जरूर है कि जिंदगी बची रहती है वह मशीन नहीं हो जाती। जैसी कि आजकल हो गयी है।

पिछले दिनों ख्यात आलोचक विजय बहादुर सिंह की साहित्य साधना के पचास बरस पूरे होने पर उनके जीवन पर आधारित एक किताब हाथ लगी। इस किताब में शामिल एक चिट्ठी बहुत दिलचस्प लगी,  इसके बाद यह सोच और भी आक्रांत हो गई। मन्ना यानी ‘सतपुड़ा के घने जंगल’ कविता वाले भवानीप्रसाद मिश्र ने एक चिट्ठी में विजय बहादुर सिंह को लिखा है कि ‘हमें धनोपार्जन की स्पर्धा में नहीं पड़ना है। थोड़ी आ​र्थिक तंगी आदमी को आदमी बनाए रखने में मदद करती है। दारिद्रय और संपन्नता मनुष्य को खा लेती है। इन दोनों से बचनाबचाना विचारवानों का सपना रहा है। हमारे सार्वजनिक प्रयत्न इस दिशा में होने चाहिए।‘ 

हमारा समाज आज क्या ऐसा सोच पाता है ? आज अमीर बनने की बात सबसे अधिक होती है और मनुष्य बनने की सबसे कम। यह कुछकुछ ऐसा ही है जैसे शिक्षा अंतिम उद्देश्य नौकरी पाना और नौकरी पाकर अमीर बन हो गया है। इस पूरे दौर के सारे एजेंडों में मनुष्यता का गायब होते जाना खतरनाक संकेत है। मैं इसे कोई साजिश नहीं कहूँगा पर आप ऐसा होता हुआ महसूस कर ही रहे होंगे। अब तो नयी पीढ़ी को ऐसी समझाइश देने वाली पीढ़ी भी नहीं बची। समझाइश दे भी दे तो वैसा माहौल भी तो नहीं है। इसीलिए जब यह सवाल आता है कि ‘क्या हम नगदी के बिना कुछ समय रह सकते हैं...? तो बैचेनी की स्थिति बन जाती है।

समाज में ऐसी व्यवस्थाएं लगभग गायब हैं जहां कि कुछ समय बिना नगदी के भी काम चल जाया करता था। इस पूरे सिस्टम ने बाजार की गुलामी में ऐसा जकड़ा है कि उसका छूटना प्राय: मुश्किल है। आखिर क्यों कुछ कागजी मुद्राओं के एक-दो दिन बंद होने से इतना हल्ला मचना चाहिए ?

याद कीजिए उन व्यवस्थाओं को जब कुछ दिन, कुछ महीने पूरे साल भर एक तंत्र चल जाया करता था। वह बढ़ई,  धोबी,  नाई,  लोहार,  पंडित,  किसान सबक जरूरतों को पूरा कर दिया करता था,  हालांकि उसके अपने गुणदोष प्रेमंचद की कहानियों की तरह सामने आते रहे हैं, लेकिन वहां की मनुष्यता का पैमाना और कथित रूप सी विकसित-डिजिटल-स्मार्ट बसाहटों की मनुष्यता के पैमानों में जो अंतर दिखाई देता है, उसे आप इस दौर में साफ महसूस कर सकते हैं। बिलकुल आप गांव में जाकर अपने बटुए को ताख में रखकर सुकून से यहांवहां घूम सकते हैं, लेकिन शहर का माहौल मुझे ऐसा करने की एक पल भी इजाजत नहीं देता, लेकिन हुआ तो उलटा है। गांव भी अब गांव कहां, वह भी शहर बनने पर आमादा है।

यह कहानी भी अब एक दुखद राग की तरह है जिसे चाहे न चाहे गाना ही पड़ेगा.

राकेश कुमार मालवीय