गुरुवार, सितंबर 06, 2018

BLOG: एक लाख स्कूल के बच्चों के पास नहीं प्रिय शिक्षक चुनने का विकल्प



राकेश कुमार मालवीय

आज शिक्षक दिवस है। देश के तकरीबन चौदह लाख स्कूलों के बच्चे अपने प्रिय शिक्षक को तरहतरह से शुभकामना दे रहे होंगे। किसी ने अपने प्रिय शिक्षक के चेहरे पर मुस्कान बिखेरने के लिए घर के बगीचे से फूल तोड़कर दिया होगा, कुछ ने ग्रीटिंग कार्ड बनाकर दिया होगा। किसी भी आधारभूत सुविधा से ज्यादा बड़ी जरूरत शिक्षक का होना है। हम सभी के जेहन में अपनेअपने प्रिय या अप्रिय भी शिक्षक के छवि कैद जरूर होती है। पर देखिए कि देश की एक बड़ी विडंबना है कि देश के लाखों बच्चों के पास अपने प्रिय शिक्षक चुनने का विकल्प ही नहीं है, क्योंकि वहां पर उन्हें पढ़ाने के लिए केवल एक ही शिक्षक मौजूद है। एक ही शिक्षक के भरोसे पूरा स्कूल है, सारी कक्षाएं हैं, ऐसे में आप खुद ही सोच लीजिए कि हमारे देश के ऐसे स्कूल का क्या होने वाला है ? बिना शिक्षक के स्कूल कैसे चलने वाले हैं, भविष्य का भारत कैसे बनने वाला है ?

डाइस देश में शिक्षा व्यवस्था की आधारभूत व्यवस्था का एक रिपोर्ट कार्ड रखता है। यह कोई गोपनीय दस्तावेज नहीं है, यू डाइस नामक वेबसाइट पर जाकर आप खुद भी देश की शिक्षा व्यवस्था का साल दर साल लेखाजोखा हासिल कर सकते हैं। यह डेटा पूरी तरह सरकारी है, विश्वसनीय है। इसका सबसे ताजा आंकडा जो साल 1617 का है कहता है कि देश में तकरीबन 7.2 प्रतिशत स्कूल ऐसे हैं जहां पर कि सिंगल टीचर मौजूद हैं। देश के 14,67, 680 कुल स्कूलों में यह संख्या तकरीबन 1,05,672 होती है। इससे पहले के साल में भी यह संख्या 7.5 थी। मतलब तेजी से विकास करने वाली, डिजिटल इंडिया बनाने वाली और अच्छे दिन लाने वाली सरकार भी प्वाइंट तीन प्रतिशत की कमी कर पाई है !

गुणवत्ता एक अलग सवाल है और आधारभूत संरचनाओं का विकास इसका दूसरा पक्ष है। पिछले सालों मे शिक्षा का अधिकार कानून आ जाने के बाद संरचनात्मक विकास पर बेहद जोर रहा है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षण पर यह बातचीत शून्य है। इसे आप केवल खबरों की हेडलाइन पढ़कर समझ सकते हैं, जो केवल यह बताती हैं कि स्कूल में कमरा नहीं है, शौचालय नहीं बना है, मध्याहन् भोजन खराब है या ज्यादा गहराई में गए तो भवन बनाने में घपले की खबर निकलकर सामने आ जाएगी।

स्कूली शिक्षा व्यवस्था को सुधारने की सबसे बड़ी इकाई केवल और केवल शिक्षक है, शिक्षक स्कूल ​सुधारने या स्टूडेंट को सुधारने का काम ही नहीं करता वह समाज को सुधारता है, देश को सुधारता है, आप केवल एक पल को सोच ​लीजिए जिन विद्यालयों में केवल एक शिक्षक नियुक्त होता होगा, उसमें और छड़ी लेकर जानवरों के पीछे जा रहे चरवाहे मे क्या कोई अंतर हो सकता है ? क्या चरवाहे का काम और शिक्षक का काम एक जैसा हो सकता है, यह बात थोड़ी कड़वी है और इसकी तुलना करना बेहद गलत है, लेकिन मैं यह चाहता हूं कि यह बात आपको अंदर तक चुभे और आप सरकार से यह मांग करें कि इन एक लाख से ज्‍यादा स्कूलों में जल्दी से जल्दी शिक्षकों के व्यवस्था करें। कम से कम अगले साल जब यह यू डाइस अपनी रिपोर्ट जारी करे तो इसमें केवल प्वाइंट तीन प्रतिशत की शर्मनाक कमी नहीं आए इसमें कम से कम पूरे तीन प्रतिशत की कमी तो जरूर आनी चाहिए।

शुक्रवार, जुलाई 06, 2018

बेगड़ जी की यात्रा अमर रहेगी

नर्मदा के दर्शन तो लाखों ने किए, लेकिन ​जैसे दर्शन का लाभ बेगड़ जी को नर्मदा ने दिया, वह दुर्लभ है। बेगड़ की आंखों से नर्मदा के दर्शन करना, आपकी दर्शन दृष्टि को खोल देना है। नर्मदा के दर्शन की अपार संभावनाएं हैं, अलबत्ता पिछले तीन—चार दशकों में नर्मदा नदी की जो दुर्दशा वैध और अवैध तरीकों से हुई है, वह बेगड़ जी को क्या हर नर्मदाप्रेमी को कचोटती है। यह वक्त वह नहीं था जबकि नर्मदा के दर्शन के गीत गाए जाएं, यह वक्त अगली कई सदियों तक नर्मदा दर्शन के लिए उसे बचाने की इक छोटी कोशिश का वक्त है, ऐसे समय में एक नर्मदाप्रेमी का जाना सालता है। बेगड़ जी की यात्रा अमर रहेगी।

शुक्रवार, अप्रैल 13, 2018

Blog : दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा के मायने...


दिग्विजय सिंह जो कहते हैं, करते भी हैं. राजनीति से 10 साल संन्यास लेने को कहा था, हारे, तो करके दिखाया भी. नर्मदा परिक्रमा को ही लीजिए. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की यात्रा पूरी होते-होते पूर्व मुख्यमंत्री ने भी घोषणा कर दी, और उसे पूरा किया भी. शि‍वराज की भव्‍य यात्रा का जवाब अपनी ज़मीनी यात्रा से दिया. मध्य प्रदेश में पांव-पांव वाले भैया शिवराज सिंह चौहान कहलाते रहे हैं, क्योंकि इसी पैदलपन की वजह से उन्होंने मध्य प्रदेश के लोगों के दिलों में जगह बनाई, उमा भारती और बाबूलाल गौर के बाद मध्य प्रदेश में BJP की सरकार को एक स्थायी नेतृत्व दिया, बहरहाल अपनी तीसरी पारी तक आते-आते मजबूरी कहें या पूरी सरकार चलाने की ज़िम्मेदारी उनकी यात्रा को भव्‍य सरकारी परि‍क्रमा माना गया और इसके ठीक बाद सोशल इंजीनियरिंग के महारथी दिग्विजय सिंह ने शिवराज के ही पैंतरों से अपनी ज़मीन तैयार कर ली है.

क्या वास्तव में यह दिग्विजय सिंह की एक निजी धार्मिक यात्रा रही, जिसे हजारों साल से नर्मदा के किनारे हर साल लाखों लोग इसी तरह किनारे-किनारे नर्मदा का सौंदर्य देखते हुए करते रहे हैं, अथवा नर्मदा के बहाने केवल विपक्ष को ही नहीं, अपनी पार्टी के अंदर भी ऐसा पैंतरा खेला है, जिसे कोई जान-समझकर भी कह नहीं सकता. यात्रा खत्म हुई है और सवाल शुरू हुए है


इन सवालों का जवाब अगले कुछ महीनों में ही तय हो पाएगा, क्योंकि राजनीति में कई बार बहुत खुलकर कुछ भी नहीं बोला जाता, किया जाता है और समझा जाता है, बहरहाल दिग्विजय ने राजनीति की अपनी बंजर हो चली ज़मीन को बखर कर फिर तैयार कर दिया है, हो सकता है कि फसल भी लहलहा जाए.

यह सही है कि नर्मदा मध्य प्रदेश में ही नहीं, गुजरात और महाराष्ट्र में भी लोगों के दिलों में महत्व रखती है. यह दुनिया की इकलौती ऐसी नदी है, जिसकी परिक्रमा का पौराणिक महत्व है. हजारों साल से नर्मदा के किनारे परिक्रमा पथ पर लाखों यात्री पैदल यात्रा करते रहे हैं. इन परकम्मावासियों की जिम्मेदारी नर्मदा किनारे के लोग उठाते रहे हैं. चौमासे में यह यात्रा स्थगित रहती है, तो उसी दौर में ठहरने और खाने-पीने का बंदोबस्त. परकम्मावासियों को भरोसा इतना कि जेब में पैसे भी नहीं हों, तो कोई चिंता नहीं.

पुराणों में नर्मदा परिक्रमा का वर्णन मिलता है, इसलिए नर्मदा किनारे के लोग भी हर अमावस्या और पूर्णिमा को स्नान कर पुण्य लूट ही ले जाते हैं. केवल पौराणिक ही नहीं, अपने अलौकिक सौंदर्य की वजह से भी नर्मदा मध्य प्रदेश को संपन्न बनाती है. कोई ज्यादा वक्त तो नहीं बीता, तकरीबन 40 साल पहले ही तो शांतिनिकेतन से पढ़े-लिखे चित्रकार अमृतलाल बेगड़ ने नर्मदा की यात्रा की और यह लिख भी दिया कि यह उनकी जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है, यदि वह नर्मदा परिक्रमा नहीं करते, तो उनका पूरा जीवन व्यर्थ चला जाता.

अलबत्ता सौंदर्य की नदी नर्मदा की पहली किताब से वह महज़ 15 सालों के कम समय में अपनी चौथी किताब 'तीरे-तीरे नर्मदा' पर आते हैं, तो ठिठककर सवाल पूछने लग जाते हैं, क्योंकि नर्मदा तब बांधों में बंध चुकी है, उसके परिक्रमा मार्ग ध्वस्त हो चुके हैं, यदि बेगड़ अब फिर कोई किताब लिख सकते, तो वह नर्मदा के सौंदर्य की बर्बादी को ही बता रहे होते.

आश्चर्य की बात तो यह है कि नर्मदा के सौंदर्य को क्षीण-क्षीण होते देखे जाने की जो कहानी लिखी गई, उसके हिस्से में तकरीबन-तकरीबन वही दो मुख्यमंत्री रहे हैं, जो नर्मदा की परिक्रमा कर रहे हैं. बावजूद इसके कि नर्मदा को बचाने के लिए तमाम संघर्षों की आवाजें भी उसी पुरजोर तरीके से घाटी से उठती रही हैं. उन आवाजों को हर सरकार ने अनसुना किया.

अब सवाल यह है कि क्या वाकई दो पूर्व मुख्यमंत्रियों की यात्रा का मकसद नर्मदा का संरक्षण था अथवा उसके ज़रिये अपनी राजनीतिक ज़मीन को मजबूत करना था. दिग्विजय सिंह की नर्मदा यात्रा के बारे में तो यह कयास और भी नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि वह शुरू से ही इसे गैर-राजनीतिक बताते रहे, लेकिन छह महीने पहले अपने राजनैतिक भविष्य और मध्य प्रदेश में अपनी स्वीकार्यता के जिस संकट से वह जूझ रहे थे, इस यात्रा ने प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से एक आधार तैयार कर दिया है. दिग्विजय सिंह को कोई बड़ी भूमिका मिल भी गई, तो इसे वह वाकई नर्मदा का आशीर्वाद ही समझेंगे, यह सायास होगा या अनायास होगा, यह तो वह खुद ही बता सकते हैं.

लंदन की टेम्‍स नदी एक वक्‍त इतनी बुरी हालत में चली गई थी, वहां खड़े होना मुश्किल हो गया था, नदी में शहर के मलमूत्र की बदबू राजमहल तक पहुंच रही थी. इस नदी के वीडि‍यो आप इंटरनेट पर ज़रूर देखि‍एगा और जरा अपने देश की नदि‍यों के बारे में भी गंभीरता से सोचि‍एगा.

एक पिता का पत्र जो हर स्कूल के लिए एक सबक है


प्रवेश प्रक्रिया के दौरान मैंने यह महसूस किया कि स्कूल प्रबंधन की मानसिकता सिर्फ अंको की दौड़ तक ही सीमित है और अंकीय आधार का यह क्रूर पैमाना कक्षा 1 के स्तर पर कितना उचित है. यह कैसा पैमाना है जो प्रतिभा की भ्रूण हत्या कर दे, जो प्रतिभा को निखारने के पहले उसे संभावना शून्य घोषित कर दे. यह कैसा परीक्षण है तो बिना बीजारोपण के पौधे को विकसित और पल्लिवित होने की संभावना को किसी भी सिरे पर अस्वीकार कर दे. यहां मेरा शिक्षा से आशय महज अंकों से नहीं है, बल्कि उस सर्वांगीण विकास से है, जिसका दावा अक्सर शैक्षणिक संस्थान करते हैं.
यह हिस्‍सा हाल ही में स्‍कूल प्रबंधन को लिखे गए उस पत्र का है जो एक पिता ने अपनी बेटी का एडमिशन निरस्‍त करने के लिए लिखा है. स्कूल भी ऐसा—वैसा नहीं, शहर के सबसे प्रतिष्ठित स्कूलों में एक जिसमें प्रवेश के लिए साम-दाम-दंड-भेद लगाने पड़ते हों ! आखिर क्यों एक पिता को अपनी बेटी के पक्ष में ऐसा निर्णय लेने को मजबूर होना पड़ा ?
क्या वाकई हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का क्रूर चेहरा सबके सामने उजागर हो चुका है. जवाब खोजने के लिए आपको कहीं दूर नहीं जाना है. हमारे ही घरों में, हमारे ही आस—पड़ोस में ऐसा खुलेआम हो रहा है.
यह एक महत्‍वपूर्ण पत्र इसलिए है क्‍योंकि अभिभावक की तरफ से एक साहसिक कदम उठा कर लिखा गया है. पर क्‍या हमारे समाज में सभी इस तरह का फैसला ले पाते हैं या भव्‍य स्‍क्‍ूलों में मनमानी को स्वीकार्य भाव से देखा जाने लगा है. दरअसल इसके लिए बच्चों के प्रति एक संवेदनशील नजरिया चाहिए होता है, लेकिन अपेक्षाओं के बोझ में कोई ऐसा नजरिया लाए भी तो कैसे, कोई प्रतिकार करे भी तो कैसे ?
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा यह पत्र कई कारणों से खास बन गया है. इससे पहले हम कोटा के कलेक्‍टर रवि कुमार के उस पत्र को भी पढ चुके हैं जो उन्‍होंने कोटा शहर में बच्‍चों की आत्‍महत्‍याओं से आहत होकर लिखा था. इससे पहले हम सिगापुर के एक स्‍कूल के प्रिंसिपल के पत्र को भी पढ चुके हैं, लेकिन उन पत्रों में जरूरी सलाहें ही थीं, इस वक्‍त में जरूरत ऐसे साहसिक कदमों की है जो तथाकथित बेस्‍ट स्‍कूलों को उनका चेहरा दिखा सकें.
वास्‍तव में उन्‍हें प्रोफेसर यशपाल की वह बात याद रखनी होगी जिसमें वह कहते हैं कि ‘अगर आप वास्तव में देखें तो जिन्होंने पिछले 50 साल में देश पर असर डाला होगा, वो आईआईटीमें पहले दर्जे पर आए लोग नहीं होंगे या बहुत कम होंगे. ज़्यादातर उनमें औसत नंबर पाने वाले होंगे.‘
क्या यह सही नहीं है कि नंबर गेम केवल स्कूल में ही नहीं होता. वह बच्चों का भयानक तरीके से पीछा कर रहा होता है. क्लासरूम से निकलकर वह बस में सवार हो जाता है, घर में घुस आता है, आस—पड़ोस में बच्चों के साथ टहलता है, मेहमानों की पीठ पर सवार होता है और मेजबानों की तश्तरी में भी परोस दिया जाता है. क्या इस नंबर गेम से मुक्ति संभव है और क्या इसमें कुसूर केवल एक स्कूल भर का है. शायद नहीं. सवाल इतने भारी भी नहीं हैं और इतने आसान भी नहीं हैं.
यह सवाल केवल शिक्षा व्यवस्था के भी नहीं हैं, यह सवाल एक व्यक्ति के जीवन के अधिकारों की सुनिश्चितता के भी हैं, आजीविका के हैं, अपनी गरिमा और सम्मान के भी हैं. एक भरोसा खड़े करने के भी हैं जो यह कहे कि तुम्हारे नंबर नहीं आए तो भी कोई बात नहीं, मैं तुम्हें सम्माजनक जीवन जीने का भरोसा दिलाता हूं. चलो तुम यह न बनो, तुम जो चाहो बनो, खूब रचनात्‍मक बनो, अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार तुम्हें भी है और उसमें हम सभी सहभागी हैं. .
दरअसल तो हमारे समाज में ऐसे मॉडल ही खडे नहीं हो पाए हैं. हैं तो इक्‍के ‘-दुक्‍के प्रयोग हैं, जिन्‍हें फल्‍मों में देखकर हम वाह-वाह तो कर सकते हैं, पर वास्‍तव में अपने बच्‍चे को वहां नहीं भेज सकते, यह हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था की असफलता की भी एक कहानी है जो हमारे पास बिना अंकों की प्रतियोगिता वाले मॉडल ही नहीं हैं. ऐसे में यदि पालक किसी एक स्‍कूल से निकाल भी ले तो सवाल यह है कि वह जाएंगे कहां. महती जरूरत इस बात की भी है कि हम बच्‍चों के लिए एक ऐसे संसार की रचना कर सकें जहां वास्‍तव में उनका बचपन भी फलफूल सके और भविष्‍य की बुनियाद भी मजबूत हो सके.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

शुक्रवार, अप्रैल 06, 2018

शिक्षा के अधिकार कानून ने बढ़ाया निजीकरण: अनिल सदगोपाल



भोपाल, 5/4/2018 शिक्षा के अधिकार कानून ही बच्चों की शिक्षा को छीनने वाला कानून बन चुका है। इस कानून में जो प्रावधान किए गए हैं, उनका असर आज दिखाई दे रहा है। सार्वजनिक स्कूल बर्बाद होने को हैं और निजी स्कूलों की कहानी किसी से छिपी नहीं है, ऐसे में सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को बचाने की बड़ी चुनौती हमारे सामने खड़ी है। इसे समझना होगा। ख्यात शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल ने यह विचार व्यक्त किए। वह मीडिया एडवोकेसी संस्था विकास संवाद और मध्यप्रदेश लोक सहभागी साझा मंच की ओर से आयोजित एक परिचर्चा में बोल रहे थे। 

पर्याप्त बजट का प्रावधान ही नहीं

अनिल ने बताया कि 1966 में कोठारी आयोग बना तो उसने अनुमान लगाया कि देश में अच्छी शिक्षा व्यवस्था के लिए जीडीपी का अभी जो ढाई प्रतिशत खर्च हो रहा है उसे 1986 तक छह प्रतिशत तक ले जाना होगा। लेकिन 1986 में यह केवल साढ़े तीन प्रतिशत ही था। शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने से पहले 2006 में एक समिति बनाई गई और उस समिति ने भी अनुमान लगाया कि अगले दस सालों में शिक्षा का अधिकार देने के लिए जीडीपी का 10 प्रतिशत तक ले जाना होगा, लेकिन सरकार ने इस रिपोर्ट को गायब ही कर दिया गया। शिक्षा पर सरकार जीडीपी का केवल तीन प्रतिशत हिस्सा ही खर्च करती है। 

अभी तक जनगणना के काम में लगे शिक्षक

शिक्षा के अधिकार कानून में लिखा है कि शिक्षकों को गैर शिक्षकीय कार्यों में नहीं लगाया जाएगा, लेकिन इसमें जनगणना, चुनाव और राष्टीय आपदा आदि को छोड़ दिया गया। लेकिन देखिए कि जनगणना का स्वरूप 2011 में बदलने के बाद अब भी कई तरह की जनगणना में शिक्षक लगे हुए हैं, और जब स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है तो उसका नुकसान देश के सबसे गरीब बच्चों का होता है, क्योंकि प्राइवेट स्कूल के किसी मास्टर को इस काम में नहीं लगाया जाता है। उन्होंने बताया कि कोठारी आयोग की रिपोर्ट में जिस पड़ोस स्कूल का जिक्र था शिक्षा के अधिकार कानून में उसकी अवधारणा भी बदल दी गई है।

खतरनाक है दिल्ली के स्‍कूलों का यह नजरि‍या 

दिल्ली में स्कूलों के वर्तमान मॉडल पर उन्होंने कहा कि जिस तरह के विजन को लेकर काम कि‍या जा रहा है वह बहुत खतरनाक है। उन्होंने बताया कि दिल्ली के स्कूलों में पिछले तीन सालों से पहली कक्षा को दो भागों में ​बांट दिया है, एक हाईपरफार्मेंस और दूसरा लो परफार्मेंस। हाई परफार्मेंस वाले बच्चे इंग्लिस में पढ़ते हैं और लो परफार्मेंस वाले हिंदी में। इस तरह से बच्चों के बंटवारा की अवधारणा समाज के लिए घातक है।




केलीफोर्निंया में खोजने से नहीं मिला प्राइवेट स्कूल

केलीफोर्निंया में खोजने से नहीं मिलता प्राइवेट स्कूल: अनिल ने बताया कि जब वह 2008 में कुछ मित्रों के आग्रह पर केलीफोर्निंया में शिक्षा के सिस्टम को समझने के लिए गए तो उन्होंने वहां पर कुछ प्राइवेट स्कूल मे विजिट करवाने का निवेदन किया। इसके लिए उनके मित्रों को बहुत परिश्रम करना पड़ा, क्योंकि वहां पर सरकार ने स्कूल शिक्षा व्यवस्था को बचाए रखा है। बहुत खोजने पर एक स्कूल मिला, तो वहां जाते ही गेट पर बच्चे बर्तन मांजते मिले। इस बारे में जब उन्होंने उस स्कूल के प्राचार्य से पूछा तो उन्होंने बताया कि इसे तो हमने आपके देश से ही सीखा है। सेवाग्राम में महात्मा गांधी की बुनियादी तालीम के मॉडल को देखकर उन्होंने इसे अपने स्कूल में लागू किया और इसे वहां बुरा नहीं माना जाता। वहां बारीबारी से मिड डे मील भी बच्चे मिलकर बनाते हैं, हमारे यहां इससे ठीक उलट नजरिया है।

गुरुवार, अप्रैल 05, 2018

VIDEO : एक भारतीय आत्मा की कुछ अनसुनी बातें


माखनलाल चतुर्वेदी के व्यक्तिव्और कृतित्व पर जितेन्द्र विद्यार्थी के साथ फेसबुक पर लाइव वार्ता

 इस लिंक को क्लिक करेंhttps://www.facebook.com/jitendradev.pandeyvidyarthi/videos/1704659022934432/

https://www.facebook.com/jitendradev.pandeyvidyarthi/videos/1704659022934432/