बुधवार, सितंबर 11, 2019

विनोबा को क्यों याद किया जाना चाहिए

राकेश कुमार मालवीय

यह गांधी का 150वां साल है। बा का भी। बा और बापू की 150 साल में विनोबा को भला क्यों याद करें ? इसलिए क्योंकि विनोबा के भी इधर 125 साल हो रहे हैं। आज उनकी जयंती है। समय की यह गिनती छोड़ भी दें और दुनिया के किसी भी कोने को देख लें तो क्या यह दो महापुरूष बदली हुई परिस्थितियों में अब भी कोई रास्ता दिखा रहे हैं ? भले ही अब वह बातें ठीक उसी तरह से लागू नहीं होती होंगी जैसी कि आज से सौ बरस पहले कही और समझाई जा रही थीं, लेकिन सिद्धांतों तो शाश्वत हैं।
विनोबा के बारे में बहुत सारे चिंतक कहते हैं कि उनका व्यक्तित्व गांधी से श्रेष्ठ हो जाता है। गांधी के चले जाने के बाद सही मायने में गांधी के अंत्योदय के विचार को सर्वोदय में परिभाषित करने वाले विनोबा उनकी विरासत को सही मायने में संभालने वाले हैं भी। इसके संकेत उन्होंने गांधी को दे दिए थे और गांधी भी सहज भाव से उन्हेंक इसकी स्वीकृति दे भी देते हैं।

विनोबा जेल में हैं। जेल में उनका सामना उस वक्त के सभी विचारों से हो रहा है। एकांत को पसंद करने वाली विनोबा इस मौके को कई तरह के विचारों को समझने का एक मौका बना लेते हैं। विनोबा लिखते हैं कि ‘वहां जो सज्जनता गांधी वालों में दिखाई देती है वही दूसरे लोगों में भी पाई जाती है और जो दुर्जनता दूसरों में दिखाई देती है वह इनमें भी पाई जाती है। तब मैंने पाया कि सज्जनता किसी एक पक्ष की चीज नहीं है बहुत सोचते पर वे इस निर्णय पर पहुंचे कि एक खास पक्ष में या संस्था में रहकर मेरा काम नहीं चलेगा सबसे अलग रहकर जनता की सेवा ही मुझे करनी चाहिए।‘

इसी विचार को वह गांधी के सामने भी इसी सहजता से प्रस्तुत कर देते हैं तिस पर गांधी कहते हैं कि ‘तेरा अभिप्राय मैं समझ गया, तू सेवा करेगा और अधिकार नहीं रखेगा। यह ठीक ही है।‘ और इसके बाद विनोबा तमाम उन संस्थाओं से खुद को हटा लेते हैं जो उन्हें बहुत प्रिय थीं। यह विनोबा होने की शुरूआत है। जिस तरह से आजादी पाने के बाद गांधी का रास्ता भी सत्ता की ओर नहीं जाता ठीक उसी तरह विनोबा भी सत्ता को क्या संस्थाओं के विचार से भी खुद को अलग करा लेते हैं।

आज जब इन मिसालों को हम देखते हैं तो ऐसे उदाहरण हमें दिखाई नहीं देते हैं। हमारे समाज का पूरा राजनैतिक—सामाजिक और आर्थिक विमर्श भी इससे ठीक उल्टी तरफ जाते हैं, सारे जतन—यतन त्यागने के नहीं,  पाने के हैं। वि‍नोबा संघ जैसे शब्दउ से भी संतुष्टा नहीं हैं, वह सर्वोदय समाज की स्थाेपना करते हैं, आज हजारों संस्थाएं हैं, संघ हैं, लेकि‍न समाज गायब है, आखि‍री आदमी का वि‍मर्श गायब है।

विनोबा का संस्था का त्याग इसलिए है क्योंकि वह अहिंसा के सिद्धांत में इतना अधिक भरोसा करते हैं कि संस्था में होने से हिंसा का तत्व कहीं न कहीं आ ही जाता है और भारत जिसने दुनिया में स्वतंत्रता संघर्ष की सबसे नायाब और रचनात्मक लड़ाई लड़ी, वह उसके महत्व को उसकी प्रतिष्ठा को और आगे ले जाना चाहते हैं, उनकी दृष्टि वैश्विक है।

विनोबा कहते हैं कि आज विज्ञान की प्रगति को देखते हुए शस्त्रों के उपयोग से जो अपार हानि होगी उसकी तुलना में उनसे होने वाला लाभ इतना मामूली होगा कि उसे हिसाब में गिना भी न जाएगा। सोचिए, गांधी और विनोबा के विचारों को भुलाकर आज दुनिया किस मुहाने पर आ खड़ी हुई है। आज सब तरफ हथियारों का बोलबाला है, हथियारों का एक बड़ा बाजार है। शस्त्रों से हिंसा ही होती है। यह बाजार रोटी की कीमत पर है। देश परमाणु हथियारों को लिए किसी भी क्षण मनुष्यता पर हमला कर सकते हैं। सर्वोदय होना अब और दूर होता दिखाई देता है, क्योंकि मनुष्यता के इन महान मानकों पर नहीं, सामान्य रोटी—कपड़ा और मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य के रोज—रोज के संघर्ष अब और बड़े होते जा रहे हैं, इसलिए क्या दो पल ठहरकर एक बार पीछे को नहीं देखा जाना चाहिए कि हमारे अपने देश में बुजुर्ग क्या कुछ कह गए हैं।

जिस लोकतंत्र को हम दुनिया का सबसे बड़ा मानते हुए गौरव करते हैं क्या वहां अब असहमतियों के लिए स्थान शेष है। क्या वहां हम किसी की वैसी आलोचना कर सकते हैं जैसी विनोबा गांधी को कह देते हैं। विनोबा कई मौकों पर सवाल करते हैं कि क्या गांधीजी के कारण सत्य की प्रतिष्ठा बढ़ी है या सत्य के कारण गांधी जी की। या फिर यह कि गांधी जी ने शरीर परिश्रम अपनाकर उसकी प्रतिष्ठा बढ़ाई। एक मौके पर विनोबा पूछ ही लेते हैं कि गांधी जी कौन थे जो श्रम को प्रतिष्ठा देते, शरीर परिश्रम अपनाकर गांधीजी ने खुद प्रतिष्ठा प्राप्त की। सिद्धांत व्यक्ति से बढ़कर होते हैं, इसलिए उन पर अमल करके व्यक्ति को प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। अब के मौकों पर व्यक्ति ही महत्वपूर्ण हो जाते हैं, सिद्धांत नहीं। सिद्धांत अपना लक्ष्य पाने के लिए बदल लिए जाते हैं।

शनिवार, मई 11, 2019

मतदान लाइव: पुलिसवाले मानवता कह रहे थे, और रौब दिखाता कलेक्टर रैंक का आदमी

टोल कर दीजिए कि हमारी कई कारणों से मतदान में रुचि नहीं रही हैं। 2014 से पहले से लगता रहा कि कुछ आधा—अधूरा है। यह भी लगता रहा कि विकल्प क्या है। यह भी लगता रहा कि जिसे बैठाते हैं वह जनपक्षीय न होते हुए कुछ और ही नीतियों पर चलता है, उसके केन्द्र में सबसे गरीब आदमी नहीं होता। फिर लगता था कि सौ में से साठ लोगों के दवारा चुनी हुई सरकार है।
फिर पत्रकार बन गए तो निष्पक्षता का भूत चढ़ गया। पंचायत चुनावों में तो खूब रुचि रहती, लेकिन दलीय राजनीति में एक किस्म का पशोपेश था कि पत्रकार वोट डालेगा तो उसे तो किसी का पक्ष लेना ही पड़ेगा।

इधर जब 2019 में देश एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया जिसे आने वाले पचास सालों का भविष्य बताया जाने लगा तो लगा कि एक सभ्य नागरिक के रूप में मतदान करना चाहिए, भले ही किसी का पक्ष लेना पड़े। हालांकि जिस पार्टी की ओर अपना सबसे अधिक स्वाभाविक झुकाव बिना कोई किताब पढ़े, सिद्धांत जाने रहा है, वहां से कोई उम्मीदवार ही नहीं है, इसे हमारी असफलता मानने में कोई शर्म नहीं है। लेकिन जब भोपाल का सीन कुछ अदृभुत बन गया तो तय हो ही गया कि वोट करना ही है। किसे, आप समझते रहिए।

तो साहब आज जब साढ़े सात बजे मतदान करने पहुंचे तो वहां राहुल भैया मिल गए। उन्होंने बताया कि वह साढ़े छह बजे लाइन में लग गए थे। तीसरा नंबर था और एक घंटा लग गया मतदान करने में। मशीन चालू नहीं हो पाई, और कोई कर्मचारी प्र​शिक्षित ही नहीं। लाइन लंबी होती गई और मोहल्ले के कई सारे लोग मिल गए। अच्छा लग रहा था, इतने सारे लोग एक साथ मिल ही नहीं पाते। मैं लाइन में खड़े चेहरों को बारी—बारी से देखता, कि किसके मन में क्या चल रहा होगा। आखिर कौन किसे वोट देे जा रहा होगा। वहां पर दो मटके रखे हुए थे, लेकिन पीने के लिए कोई मग्गा या गिलास ही नहीं था। मैंने फोटो टवीट करी। थोड़ी देर बाद कोई मग्गा रख गया। मेडम ने बताया कि टवीट का असर देखो। मैंने कहा अरे छोड़ो, इतनी जल्दी कोई असर थोड़ी होता है। कोई रख गया होगा। अभी अखबार में काम कर रहा होता तो फट से इम्पेक्ट न्यूज बना देता।

कुछ देर बाद लाइन सरकना शुरू हुई। धीरे—धीरे आगे बढ़ती गई। लाइन में सभी लगे थे। एक सज्जन ने पुलिसवालों पर चिल्लाना शुरू किया। बोले आप नियम से नहीं कर रहे। दो लाइन नहीं लगाई जा सकती। दरअसल आजू—बाजू में कमरा होने से वहां पर दो लाइनें साथ लगाना मजबूरी थी। वह व्यक्ति लगातार पुलिसवालों से झगड़ने लगा। पुलिसवाले ने शालीनता से कहा सर दूसरी तरफ गेट नहीं है। रौबदार आदमी ने कहा कि दीवाल तुड़वा दो। दीवाल तुड़वा कर गेट बनवाना था। आपको कुछ पता नहीं है। कुछ देर बाद एक बुजुर्ग की तबियत ठीक नहीं थी, तो उसे लाइन में आगे कर दिया। उसके बाद फिर उसने रौब झाड़ा। बोला ऐसा कोई नियम नहीं है, कहां लिखा है बताओ। वह पुलिसवालों से नियम मांगने लगा।

लाइन से चलाईये। पुलिस वाले और एक स्टार पुलिस वाली ने मुस्कूराकर जी कहा। पुलिसवाली बोली सर कोई बुजुर्ग हो तो उसे तो पहले ही कर सकते हैं न। आदमी ने रौबदार आवाज में कहा ऐसा कोई नियम नहीं है। पुलिसवाली ने कहा सर, कोई बुजुगों से नहीं बन रहा होगा या किसी का छोटा बेबी होगा तो उसको तो पहले करना पड़ेगा न सर। रौबदार आदमी ने बोला नहीं ऐसा कोई नियम नहीं है। पुलिसवाली ने कहा सर मानवता के नाते तो कर सकते हैं। रौबदार आदमी ने कहा कि नहीं, कोई मानवता वानवता नहीं। यह सुनने के बाद पुलिसवाली ने सिर नीचे कर लिया। वह मतदान कक्ष के अंदर चली गई। पुलिसवाले को इशारा किया, अंदर बुलाया। उसके कान में कुछ कहा। क्या, मैं समझ नहीं पाया।

मतदान करते लौटते एक आदमी ने पुलिसवाले को बताया ये कलेक्टर रैंक के आदमी हैं, इनको नियम मत बताओ। यह जानकारी देने वाला उनका पडोसी रहा होगा।

मैंने यह सुनकर कलेक्टर रैंक के आदमी की ओर देखा। उसका मुंह देखा, समझ नहीं आया कि कलेक्टर आदमी होता है या नहीं। क्या उसमें आदमियत होती होगी या वह केवल नियमदार आदमी ही होगा। अपना तो ज्यादा पाला पड़ता नहीं और जिनसे पड़ा वह अच्छे ही अधिकारी निकले। जाने यह कैसा रौबदार कलेक्टर था। सोचा तो लगा कि इसे शायद लाइन में खड़े होने की आदत नहीं रही होगी। आज खड़े होना पड़ा तो खीज गया। खीज बेचारे नए—नवेले पुलिसवालों पर निकाल रहा जो यह कह रहे थे कि सर हम तो आप लोगों की सेवा के लिए खड़े हैं, व्यवस्था करना हमारा काम नहीं है।

अचानक जेहन में शब्द गूंजा राष्टवाद। इस चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा तो यही रहा। फिर यह कैसा राष्टवाद कि केवल लाइन में खड़े होने की जेहमत नहीं उठा सकते एक घंटे। कैसे हम पाकिस्तान को नेस्तेनाबूत कर देने का नारा बैठे—ठाले लगा देते है, जबकि देश के लोकतंत्र के लिए लाइन में आधा घंटा खड़े नहीं हो सकते। उन बेचारे पु​लिसवालों का क्या दोष है। मतदान पूरा कराना उनका भी काम है या इसमें हमारी भी कोई भूमिका हो सकती है। यदि कोई स्थिति बिगड़ भी गई तो क्या हमारा कर्तव्य नहीं है कि प्रशासन को सहयोग कर दें। या हम नियम दिखाएंगे। क्या हमारी देशभक्ति फेसबुक पर फोटो डालने भर से है, या पाकिस्तान को गाली देने भर से है या मोदीजी को सबसे बड़ा देशभक्त बताने भर से है।

सोचिएगा इस लोकतंत्र में हमारी भूमिका क्या है। मैं भी देखने के अलावा और कुछ नहीं कर सका। मेरा चुप रहकर लाइन में खड़े होकर धैर्य से मतदान में सहयोग करना ही मेरी भूमिका है। हम चुप रहकर भी देशभक्त रह सकते हैं, कोई दिखावे की जरूरत नहीं है, हमारे दिल में हमारा हिंदुस्तान है, हमारे सपनों का हिंदुस्तान है, एक बराबरी का जहान है। 

मंगलवार, अप्रैल 23, 2019

आज चर्चा नेहरू सत्य और मिथक की




चूंकि आज ​विश्व पुस्तक दिवस है, और भले ही अपन खूब पढ़ा​—लिखी नहीं भी कर पाते हों पर किताबों से लगाव तो बना ही हुआ है, इसलिए बार—बार उनके पास जाने को मन करता है, और तब जबकि किताबें केवल अपने ज्ञान का स्तर बढ़ाए जाने के लालच से बढ़कर समाज की घटनाओं—परिघटनाओं के संदर्भ में एक अनिवार्य जरूरत बन जाए, इस स्थिति में अपने ही एक मित्र की किताब का बखान करना प्रायोजित माना जा सकता है, किंतु अपने प्रकाशन के महज तीन महीनों में एक हजार संस्करण, फिर हजार संस्करण और फिर पांच हजार संस्करणों का प्रिंट आर्डर अपने आप में उस दस साल की धैर्यपूर्ण लिखापढ़ी की स्थापना कर देता है।

मैं अपने अभिन्न मित्र पीयूष बबेले की ही पहली लेकिन धमाकेदार और जरूरी किताब नेहरू सत्य और मिथक का जिक्र कर रहा हूं जिसमें वह गांधी के सत्य के मूल्य को बचाने के लिए उस असत्य पर सीधे—सीधे हमला बोल रहे हैं जिसके इस दौर में सबसे बड़े शिकार नेहरू हुए हैं, इसलिए मैं कहता हूं कि यह इस दौर की महत्वपूर्ण किताब है, इसलिए कि यह मिथकों को तोड़कर सच को सामने लाती है, और मैं बहुत खुले मन से यह चुनौती देता हूं कि यदि इसमें एक भी बात अप्रमाणिक और आधारहीन है तो उसका उसी तरह जवाब दिया जाना चाहिए, जिस तरह पीयूष उसे पेश करते हैं। 

मैं कहता हूं कि नेहरू युग की इससे बेहतर, इससे सरल, इससे सुबोध किताब हो नहीं हो नहीं सकती। केवल तथ्यों के प्रस्तुतिकरण पर ही नहीं इसके शिल्प की जो भी रचना पीयूष बबेले ने की है, उससे न केवल इतिहास में हमारी रुचि बनी रहती है, जिसे अक्सर सामान्य पाठक वर्ग अरुचिकर ही मानता रहा है, बल्कि वह ऐसे समय में हमारे सामने आती है, जिस वक्त तमाम संचार माध्यमों से किसी का चेहरा भी बहुत आसानी से बदरंग भी किया जा सकता है और बहुरंग भी। इसलिए इस आभासी मायावी संसार में केवल अपने तर्कों के सहारे ठीक सही जगह खड़े हो सकते हैं, और तर्कों के लिए सही, प्रामाणिक और ठोस तथ्य आपके हाथ में होने चाहिए।

किताब के कवर पेज पर एक फलैप की तरह इतिहास जरूर लिख दिया गया है, पर वास्तव में यह इतिहास भर तो नहीं है। और फिर यह नेहरू के आधुनिक भारत के निर्माण पर एक विहंगम दृष्टि भी है। इसलिए भी यह नेहरू युग होकर भी नेहरू युग ही तो नहीं है। यह केवल नेहरू भी नहीं है, इसमें गांधी की बात भी है, इसमें सरदार भी आते हैं, इसमें भगतसिंह भी चले आते हैं, ओर इसमें गोलवलकर भी हैं। इनके आए बिना इतिहास कहां बन सकता है, इसलिए यह विहंगम दृष्टि के साथ—साथ समग्र दृष्टि से देखकर लिखी गई किताब है। यह किताब एक तरह का संदर्भ ग्रंथ है, और इसे आप जरूरत के हिसाब से अध्यायों में बांटकर अपनी सुविधा से भी पढ़ सकते हैं। यह आपके ज्ञान को बढ़ाती भी है और चौकाती भी है। इसमें लेखक खुद भी चले आते हैं और अपने स्कूल के अनुभव और नेहरू की मूर्ति के नीचे लग रही शाखा के बारे में भी जिक्र करते हैं, ऐसे यह एक दिलचस्प इतिहास से रूबरू कराती हैं। मेरी अपेक्षा थी कि इस किताब में वह आरक्षण पर भी एकाध अध्याय करते, बस एक उसी जरूरी विषय की कमी खली। बाकी यदि आप खुद के लिए इस साल कुछ लिखना—पढ़ना चाहते हैं, तो मुझे लगता है यह किताब जरूर ही पढ़ें।

और इधर आज विश्व पुस्तक दिवस के दिन ही गुरूजी पीपी सिंह ने गांधी पर प्रकाशित स्मारिका दफ्तर में​ भिजवा दी। इस किताब की योजना की शुरूआती योजनाओं में सर ने मुझे शामिल रखा, इसके लिए मैं सर का आभारी हूं। आज इस किताब को देखा तो लगा कि गांधी 150 के संदर्भ में बहुत उम्दा काम हो गया है। यह गंभीर काम भी पब्लिक रिलेशंस सोयायटी की ओर से किया गया, जिसे केवल हम जनसंपर्क संस्था के रूप में जानते रहे हों, उसका भोपाल चैप्टर कैसे एक बेहतरीन नेतृत्व में आगे बढ़ता है उसकी मिसाल बनकर आई है किताब देश समाज और गांधी। देश के चालीस शीर्ष लेखकों के विचारों का ऐसा संकलन तो कोई गांधीवादी संस्था भी नहीं कर पाई। इसके पीछे की भावना भी आपको किताब के सबसे पीछे के लेख्र में मिलेगी जिसमें संपादक अपनी बात कह रहा है बाकी लेखकों को फिलहाल नहीं पढ़ पाया हूं।

भोपाल से निकलने वाली दो अद्भुत पत्रिकाएं साइकिल और प्लूटो को खुद भी पढ़ें, अपने मोहल्ले के बच्चों को जरूर पढ़ाएं। बाल साहित्य के लिए बहुत उम्दा काम किया जा रहा है। यह चकमक की चमक का विस्तार है, जो आपको खुबसूरत किंतु तार्किक संसार में ले जाता है। बहुत इंतजार के बाद इस बार मेरी एक कहानी प्लूटो के अंक में छपी है। इसके पारिश्रमिक के लिए फोन आया तो मैंने उसकी जगह दोनों पत्रिकाओं का सालभर की सदस्यता का निवेदन कर लिया, जो स्वीकृत भी हो गया।

दो दिन पहले एक व्याख्यान सुनने सप्रे संग्रहालय गया था। किताबों से खचाखच भरी अलमारियों के बीच वह सभागार सचमुच विचारों के लिए सबसे मुफीद जगह लगा। एक अलमारी से चांद पत्रिका की प्रतियां झांककर मुझे देख रही थीं, यह वही पत्रिका थी जिसका किस्सा राजेश बादल कुछ दिन पहले सुना रहे थे। इस संग्रहालय में आकर आपका अहंकार टूटता है कि कितना कुछ है जो छूने के लिए बाकी है। 

समय कम है और बहुत कुछ किया, सुना, बोला जाना शेष है सचमुच।

मंगलवार, मार्च 19, 2019

BLOG: सोचियेगा, समझिएगा, दुनिया में हिन्दुस्तान की भद्द न पिटवाइयेगा



राकेश कुमार मालवीय

परीक्षा में पास होने के लिए न्यूनतम 33 प्रतिशत अंक होने चाहिए. हमने पिछली लोकसभा में 34 प्रतिशत ऐसे सांसदों को चुन लिया, जिन्होंने अपने घोषणा पत्र में स्वयं पर कोई न कोई आपराधिक मामला दर्ज होना घोषित किया था. 2019 में एक बार फिर यही राजनेता आपके सामने वोट मांगने के लिए आ खड़े हुए हैं. गंभीर बात यह है कि ‘चौकीदार चोर है’ और ‘मैं भी चौकीदार’ के बीच मतदाता फिर असमंजस में है ! चुनावी परिप्रेक्ष्य में भारत की समसामयिकी में जो भी विषय चल रहे हैं, उनमें देखिए कि जनता के असली विषय कहाँ हैं ? अच्छी शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं, कृषि, रोजगार, बच्चे, महिलाएं और सुरक्षित समाज के तमाम विषयों जिनमें हम बदतर बने ही हुए हैं, छोड़ चौकीदार जैसी बहसों पर पूरीपूरी ऊर्जा  खर्च की जा रही है. सब जानते हैं कि राजनीति में कम ही लोग दूध के धुले होते हैं, बावजूद इसके राजनीति एक बार फिर आम जनता को उल्लू बनाने पर आमादा है.

भला हो एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) का, जो बहुत मेहनत करके ऐसी रिपोर्ट तैयार करती है, जिससे भारतीय राजनेताओं का सही चेहरा हमारे सामने आ पाता है. इसमें माननीयों की संपत्ति, आपराधिक जानकारियां और बहुत से विश्लेषण होते हैं, जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मतदाताओं को जानना बेहद जरूरी है. यह रिपोर्ट्स मतदाताओं से भी सवाल करती हैं कि वह आखिर ऐसे नेताओं को कैसे चुन लेते हैं, जिनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज है, केवल आपराधिक ही नहीं गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, और कई तो इतने कि वह चोरी जैसे अपराधों से भी बहुत ज्यादा गंभीर हैं.

लोकसभा 2014 के चुनाव में भी 34 प्रतिशत ऐसे ही सांसदों को जिताकर लोकतंत्र के पवित्र स्थल पर पहुंचाया. श्री नरेन्द्र मोदी को भारी बहुमत देकर देश का महत्वपूर्ण पद सौंपा, और उन्होंने भी संसद की देहरी पर माथा टेककर एक नई सुबह का सूत्रपात किया, यह नई सुबह महज अगले चुनाव तक चोरचोर जैसे विमर्श पर आ टिकेगी, राजनीति का यह अधोपतन किसने सोचा होगा ? सोचिए कि दुनिया में क्या सोचा जाएगा जब वह तरक्की की सुनहरी इबारतें लिख रही थी तब भारत जैसे विश्वगुरू का दावा करने वाले देश के राजनेता एक दूसरे को चोर और चौकीदार कह रहे थे, और भूखी, प्यासी, बीमार और बेरोजगार जनता चुनाव के गंभीर समय में भी राजनीति का यह तमाशा देख रही थी.

देश की जनता ने जिन सांसदों को चुना उनमें से 185 किसी न किसी मामले में अपराध के आरोपी थे, इनमें से 112 पर वह मामले दर्ज थे, जिन पर कोई गंभीर अपराध दर्ज था, यानी भारतीय दंड संहिता के तहत इन अपराधों के लिए कम से कम पांच साल या उससे अधिक की सजा मुकर्रर थी. इनमें से 443 सांसद ऐसे थे, जिनकी संपत्ति करोड़ों में थी, औसतन 14 करोड़ रुपयों की घोषित आय थी, यानी उनके पास बाहुबल के अलावा धनबल था.

एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि दस सांसद ऐसे थे जिन्होंने अपने पर हत्या का आरोप होना घोषित किया था, और 17 सांसद ऐसे थे, जिन पर हत्या करने का प्रयास वाला मामला दर्ज था. गंभीर बात तो यह है कि इन अपराधों में भारतीय जनता पार्टी जो ‘मैं भी चौकीदार’ का नारा दे रही है, उसके सांसद सर्वाधिक थे. हत्या करने का आपराधिक मामला शपथपत्र में देने वाले दस में से चार, और हत्या का प्रयास करने वाले 17 में से 10 सांसद भारतीय जनता पार्टी के थे. दस सांसद ऐसे थे, जिन्होंने अपने पर लूट और डकैती का मामला दर्ज होना भी खुद ही अपने शप​थपत्र में बताया इनमें से 7 चौकीदार भारतीय जनता पार्टी के थे. सात सांसद ऐसे थे, जिन्होंने कहा कि उन पर अपहरण का मामला दर्ज है, इनमें से 3 भाजपा के थे. याद रखिए केवल भाजपा के नहीं थे, दूसरे दलों के भी थे.

पवित्र संसद में ऐसे लोगों की संख्या पिछले चुनाव से बढ़ गई. 2009 के चुनाव में ऐसे आरोप वाले 30 प्रतिशत सांसद थे. इसलिए सवाल तो भारत की जनता से भी उतना ही होना चाहिए, कि वह किन पैमानों पर अपना प्रतिनिधि चुनकर संसद और विधानसभाओं में भेजती है. क्या हत्या जैसे संगीन अपराध के आरोपियों पर भी आपका विश्वास हो सकता है. एडीआर का ही विश्लेषण बताता है कि 2014 में जिन 165 सांसदों को आपने दोबारा चुनकर संसद में भेजा, इनमें से 71 यानी 43 प्रतिशत पर कोई न कोई अपराध दर्ज था, इनमें से भी 13 प्रतिशत ऐसे थे, जिनपर पहले से दर्ज अपराधों की संख्या बढ़ गई यानी सांसद रहते हुए भी उनपर आपराधिक प्रकरण दर्ज हुए और 30 प्रतिशत सांसदों ने यह भी बताया कि 2009 में जब वह सांसद के रूप में चुने गए तब उन पर कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं था, लेकिन इसके बाद जब 2014 के लिए चुनाव लड़े तब उन पर कोई मामला दर्ज हो गया.

हो सकता है कि इनमें से बहुत सारे मामलों में हमारे प्रिय सांसदों पर झूठे मुकदमें दर्ज करवा दिए गए हों, जिनमें न्यायालय अपना फैसला सुनाएगा, लेकिन 34 प्रतिशत की यह संख्या छोटी नहीं होती, इसलिए 2019 में जब यह सारे माननीय अपनाअपना शपथपत्र चुनाव लड़ने के लिए दाखिल करें, तो इस बात पर भी जरा गौर कर लीजिएगा कि 2019 में जब एडीआर अपनी रिपोर्ट बनाने बैठे तो दुनिया में भारत की भद्द पिटवाने वाले तथ्य न पेश करने पड़ें. किसी भी ​सोशल मीडिया टेंड को अपनी बुद्धि गिरवी न रखिएगा, सोचिएगा, समझिएगा, पढ़िएगा, जानिएगा, और तब ही अपनी सबसे मजबूत ताकत मतदान का उपयोग कीजिएगा.  

Published on : Khabar NDTV

शुक्रवार, मार्च 15, 2019

गाहे—बगाहे नहीं, हमेशा करना होगा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार


राकेश कुमार मालवीय

हमारे देश में दिवाली पर बीसतीस रुपयों में मिलने वाली चाइनीज झालरों पर खूब हल्ला मचता है अबकी चाइनीज आइटम का विरोध दिवाली के अलावा भी टॉप ट्रेंड कर रहा है। इसलिए कि पुलवामा हमले के कर्ता धर्ता आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना अजहर मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करवाने में भारत का साथ नहीं दिया, बल्कि चाइना के रवैये के कारण ही ऐसा होतेहोते रह गया। अब इसका गुस्सा कहीं तो निकलना ही है, चाइनीज आइटम पर ही निकालें!  


सोशल मीडिया के अवैतनिक मजदूर किसी भेड़ियाधसान की तरह ही ऐसी परिस्थितियों में रैलमपेला मचा देते हैं, इससे आक्रोश जो सड़कों पर होना चाहिए, उसकी इतिश्री एक मैसेज फारवर्ड भर करके हो जाती है। अच्छा है कि गांधी के जमाने मे यह सुविधाएं नहीं थीं, वरना विदेशी वस्त्रों के होली जलती तो कैसे ? अलबत्ता यह गंभीर सवाल हैं !

वैश्विक बाजार और भूमंडलीकरण की नीतियों के बावजूद हमें यह विमर्श करते रहने की बहुत जरूरत है कि इस देश की सेहत के लिए स्वदेशी कितना जरूरी है, वह गाहेबगाहे नहीं हो सकता है। इसके लिए न केवल नीतियों में बल्कि हिंदुस्तानियों के जेहन में भी स्वदेशी चीजों के प्रति वास्तविक प्रेम होना चाहिए, फौरी और अस्थायी नहीं। यह सोचने की भी उतनी ही जरूरत होगी कि यदि हमने उन चीजों का बहिष्कार भी किया, तो हमारी अपनी चीजों के जरिए क्या होंगे ? क्या हम थोड़ा महंगा खरीदने को तैयार हैं।

अब दवाओं को ही लें, भारत में इस वक्त आयात होने वाली दवाओं का 66 फीसदी हिस्सा चाइना से आयात हो रहा है। पिछले तीन सालों में चाइना से 38 हजार करोड़ रुपए की दवाओं का आयात हुआ है। इसी अवधि में भी आयात होने वाली दवाओं के घटक 316 से बढ़कर 354 तक जा पहुंचे हैं। हम बड़ी मात्रा में चाइनीज दवाओं का सेवन कर रहे हैं। अब दवाओं का क्या विकल्प होगा ? क्या विदेशी सामान के बहिष्कार का मतलब मतलब केवल चाइनीज झालर हैं ?

गांधी की स्वदेशी का भावना का मूल मंतव्य यही था कि किसी उद्योग को स्वदेशी कहलाने के पूर्व यह सिद्ध करना होगा कि वह आम जनता के हित में है या नहीं। इस परिभाषा को गौर से देखें और अर्थजगत में बढ़ती गैरबराबरी को देखें तो स्वदेशी का मूलमंत्र ध्वस्त होता चला जा रहा है। गांधी का स्वदेशी दर्शन कहता है कि‍ हममें यह वह प्रेरणा है जो हमें इस बात के लिए प्रेरित करती है कि हम नजदीक के वातावरण का प्रयोग करें और दूर के वातावरण को छोड़ें, जैसे धर्म से हम अपने धर्म से हम अपने धर्म का पालन करें, राजनीतिक संस्थाओं का प्रयोग करें, आर्थिक क्षेत्र में हम प़ड़ोसी द्वारा बनाई गई वस्तुओं का प्रयोग करें और उन भारतीय उद्योगों को कुशल एवं पूर्ण बनाएं जिनमें कमजोरियां नजर आती हैं।

आज देखि‍ए कि‍ मशीनों ने आम लोगों के रोजगार को खत्म कर दिया है और बड़ी कंपनियों ने छोटी कंपनियों को निगल लिया है। अब भले ही हम स्टार्ट अप के जरिए रोजगार देने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में तो पिछले दशकों में हमारी नीतियों ने हमारे छोटेछोटे बनेबनाए स्टार्ट अप को खत्म कर दिया। स्टार्ट अप की कब्रगाहों पर नए स्टार्ट अप रचे गए,  यह कहां तक टिकाउ होंगे, उनकी जमीनें तो वास्तव में खोखली हैं !

देश में ज्यादा समय शासन करने वाली कांग्रेस ही गाँधी की स्वदेशी नीति को आत्मसात नहीं कर पाई, और उसने उन्मुक्त बाजार के दरवाजे खोलकर देश की अर्थव्यवस्था पर पहली छूट की, स्वदेशी केवल एक वस्तु ही तो नहीं है एक विचार भी है। यह विचार तिल-तिल मरता ही गया ! तो यह विरोध किसलिए ? यह माजरा किसलिए ? यदि वास्तव में मेड इन इंडिया की ताकत को दिखाना है तो वह इन उथले तौरतरीकों से होने वाला है क्या ?

केवल चा​इना ही नहीं,  दवा के मामलों में तो हमारी परनिर्भरता बढ़ी ही है। 2015 में हम 44 देशों से दवाओं का आयात कर रहे थे, अब हम तकरीबन साठ देशों से दवाएं खरीदने लगे। यह आंकड़ा घटने की बजाए बढ़ क्यों गया। इसे रोकने के लिए हमने क्या किया। अपने देश में नए उद्योगधंधो, मेडिकल अनुसंधान और प्रोत्साहन के लिए क्या है ? जब हमारे देश का शीर्ष नेतृत्व ही भले ही वह किसी भी पार्टी का हो अपना इलाज कराने के लिए विदेशों में भाग जाया करता हो, तो वह कैसे अपने देश की दशा सुधारेगा ?

वास्तव में हमें केवल दवाओं के मामले में ही नहीं कि‍सी भी क्षेत्र में ऐसी नीति‍ बनाने की जरूरत है जि‍ससे आम लोगों का भला हो। हमें यह संदेश भी देना होगा कि यदि आतंकवाद का साथ दिया गया तो हम हिंदुस्तानी तुम्हारी किसी भी चीज का उपयोग न करने के लिए कमर कस लेंगे। तभी वास्तव में कुछ सबक मिल पायेगा.

गुरुवार, मार्च 14, 2019

लो ये नोटबंदी फिर जवाब मांगने लगी ?


राकेश कुमार मालवीय

नया इंडिया अखबार के पहले पन्ने पर यह खबर है कि नोटबंदी के निर्णय पर देश का रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया सहमत नहीं था। नोटबंदी के ढाई घंटा पहले तक भी इस निर्णय पर सवाल किए गए थे और शंका जताई गई थी कि जिस लक्ष्य को लेकर यह फैसला लिया जा रहा है वह इससे हासिल नहीं होगा ! यानी काला धन के लौटने पर आशंका जताई गई थी। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया में सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन से यह बात ऐन चुनाव के वक्त एक ​बार फिर सामने आ गई है, हालांकि मुख्यधारा के अखबारों ने इस खबर को कोई खास तवज्जो नहीं दी।

जब आरबीआई सहमत नहीं था तो फिर आखिर क्या वजहें थीं, जिनके चलते ऐसा निर्णय लिया गया ? क्या भारतीय सांख्यिकी संस्थान कोलकाता की ​वह रिपोर्ट ही इस फैसले के पीछे काफी थी जिसमें बताया गया था कि ​हिंदुस्तान के अंदर वर्ष 201415 में 411 करोड़ रुपए के जाली नोट प्रचलन में थे। देश में बड़े पैमाने पर चल रहे इन जाली नोटों और असली नोटों में फर्क करना मुश्किल होता जा रहा था और बड़े नोटों के मार्फत देश में काला धन जमा किया गया था। इसलिए यह निर्णय लिया जाना बहुत जरूरी था।  

निश्चित ही यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी था भी तो क्या इसके लिए पूरी तैयारी थी ? जिस तरह से इसे लागू किया गया, उसकी तो अनंत कथाएं देश भर में हैं ही, लेकिन अब ज​बकि चुनावों को बिगुल बज गया है, और तमाम मुद्दे रहरह कर ट्विटर के हैशटेग में ट्रेंड किए और कराए जा रहे है तब यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि इस सरकार के सबसे बड़े फैसलों में से एक नोटबंदी का हासिल क्या है ? क्या वह महज सरकार की जिद थी, या वाकई एक सही फैसला जिससे वह सबकुछ हासिल कर लिया गया है,  जिसका दावा किया जा रहा था।

यदि नोटबंदी सफल हो ही गई है तो जाहिर तौर पर वह इस चुनाव में बैनर पोस्टर में नजर भी आएगी जैसे कि हमारे अभिनन्दन की सफल घर वापसी के बाद कहींकहीं यह उपलब्धि बैनरपोस्टर में नजर आने लगी,  लेकिन इतने सालों बाद भी कोई ऐसा उम्दा पोस्टर किसी भी माध्यम पर हमें नहीं दिखा है, जिसमें विमुद्रीकरण को महिमामंडित किया गया हो, आपको कहीं दिखा हो तो जरूर ट्विट ​कीजिएगा।

यही नहीं नोटबंदी के प्रभावों के लिए देश में कोई ठीकठाक अध्ययन ही करवाने की जरूरत नहीं समझी गई। लोकसभा में दी गई एक जानकारी में वित्त राज्यमंत्री ने यह बताया कि 1516 में जहां देश में जाली नोटों की संख्या 632926, 201617 में 7,62, 072 थी वह 201718 में घट कर 522783 हो गई। इस जानकारी का मतलब तो यह है कि नोटबंदी के बाद भी 522783 अदद जाली नोट देश में नोटबंदी के बाद भी पकड़ में आए।

दूसरी एक बड़ी उपलब्धि यह भी बताई गई जो यह बताती है कि नोटबंदी के बाद के महीनों में तकरीबन 900 समूहों पर आयकर विभाग ने छापामारी की, और 900 करोड़ से अधिक की आस्तियां जब्त कीं। 7900 करोड़ रुपए की अघोषित आय का भी पता चला। नवंबर 17 तक 360 और समूहों की तलाशी ली गई और 700 करोड़ की आस्तियां, और तकरीबन दस हजार करोड़ की आय का प्रकटन हुआ।

सवाल यह है कि पूरे देश को लाइन में खड़ा करने के विकल्प के अलावा क्या कोई विकल्प था, जिससे यह टैक्सचोरी का यह खेल का खुलासा हो पाता। देश में आयकर विभाग का अपना काबिल ढांचा है, क्या यह एक विकल्प हो सकता था कि सरकार इस काबिल ढांचे को भी सेना की तरह ही काम करने को कहती, और ऐसे तमाम चोरों का काला चिट्ठा सामने आ पाता। क्या यह भी नहीं हो सकता था कि देश से ऐसे भगोड़ों पर भी सर्जिकल स्टाइक करके सरकार अपने नंबर बढ़ा लेती, जिससे उनका दोबारा सरकार बनाने का दावा और पुख्ता हो जाता। लंदन की गलियों में पिछले दिनों टहलते पाए गए अकेले नीरव मोदी ही इस पूरी नोटबंदी के हासिल बराबर यानी तकरीबन 11 हजार करोड़ रुपए का धन डकार के बैठे हैं।

नोटबंदी के बाद आतंकवाद की रीढ़ आर्थिक रूप से तोड़ देने के दावे को तो सरकार भूलकर भी नहीं कह पाएगी क्योंकि पुलवामा के हमले के बाद तो यह देश के मतदाताओं के दिल और दिमाग पर उलटा ही असर करेगी।  

अब धीरेधीरे जब आदर्श आचार संहिता की छाया में देश दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री या प्रधानसेवक चुनेगा तब यह सवाल बारबार आएंगे कि जनता चुने तो किसे चुने और चुनने का आधार क्या हो ? क्या वह नोटबंदी के दर्द को पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान को दिए गए जवाब से संतुष्ट होगी या​ फिर उसे भी नोटबंदी की तरह ही दबे मन से शंका की नजरों से देखेगी ?

देश की सुरक्षा के मामलों में देश की जनता को किसी पर भी कोई शंका नहीं है, कोई अविश्वास भी नहीं है, लेकिन यह भी सही बात है कि जिस तरह से राजनीति ने समाज में अपनी प्रतिष्ठा को रसातल तक गिरा लिया है, और कोई चारपांच बरस से नहीं, दशकों से लोकतंत्र में ‘लोक से तंत्र’ की खाई बढ़ती गई है, उसने जनता के विश्वास को हिलाकर भी रख दिया है। इसलिए भी व्यक्ति की जुबान को खामोश किया जा सकता है, लेकिन उसके मन में उठे सवालों का जवाब तो देना ही चाहिए, इसलिए नहीं कि वह मांगा जा रहा है, इसलिए नहीं कि कोई सवाल कर रहा है, इसलिए क्योंकि भारत जैसे लोकतांत्रिक समाज में अभी यह गुंजाइश पूरी तरह से बची हुई है और लोकतंत्र पर इस भरोसे को बनाए रखना, लोकप्रतिनिधियों की साख को बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि वह सब कुछ उन लोगों को बताया जाए जो लोगों के मन में है। उसे शब्दों की बाजीगरी से बरगलाया न जाए।

नोटबंदी भी एक ऐसा ही सवाल है ? देखना होगा कि सरकार अपने को बचाने के ​लिए इस मुद्दे को कैसे आगे ले जाते हैं और ​क्या विपक्ष आरबीआई की ताजा जानकारी के मार्फत क्या इस पर सरकार को लोकसभा चुनाव में घेर पाता है ?