गुरुवार, फ़रवरी 04, 2010

ठाकुर का कुआं गायब

प्रेमचंद की एक मशहूर कहानी है ठाकुर का कुआं। ठाकुर का कुआं पिछड़े तबके के लोगों को पानी लेने की इजाजत नहीं देता। प्रेमचंद की कहानी में लड़ाई पानी पर सभी के अधिकार और बंटवारे को लेकर है, पर सुकून की बात यह है कि कुआं तो है। कुए में पानी भी है। प्रेमचंद इस जमाने में यह कहानी लिखते तो संभवत: कुआं गायब ही हो गया होता।

प्रेमचंद की इस कहानी के लगभग सौ साल बाद विकास ने मानव समाज, सभ्यता और संसाधनों की तस्वीर में आमूलचूल बदलाव कर दिए हैं। मौजूदा दौर में ठाकुर की कहानी का
पुनर्पाठ करते हुए जब मैं अपने आसपास पर नजरें टिकाता हूं तो पाता हूं कि कुआं गायब है। दूर-दूर तक कुआं नहीं है। मेरी कॉलोनी ज्यादा पुरानी नहीं है। कोई सात-आठ बरस ही हुए होंगे, इसे अस्तित्व में आए। सीमेंट की सड़कें हैं, पक्की नालियां हैं, बीच-बीच में कई पार्क भी हैं। इस जैसी एक-दो नहीं बीसियों कॉलोनियां चारों तरफ विकसित हो चुकी हैं, हो रही हैं। सब कुछ है पर एक अदद कुआं नहीं है। कुआं गायब है, गायब होता जा रहा है या यूं कहें गायब किया जा रहा है।


दरअसल कुआं और इस जैसे संसाधनों जिन पर लोगों का नैसर्गिक हक बनता है, पर से एक सोची-समझी साजिश के तहत हमले किए जा रहे हैं। जिसे हम विकास के पैमाने मानते और कहते हैं दरअसल वे केवल एक वर्ग की तरफ खड़े नजर आते हैं। उस विकास में सभी का विकास और सभी की बढ़ोत्तरी का हक सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है। निश्चित ही एक बड़ी रकम खर्च करके एक बड़ा सा मकान खरीद लेने के बाद पानी की उपलब्धता के लिए खर्च की जाने वाली राशि कोई बड़ी भारी नहीं पड़ने वाली, पर पानी के लिए निर्भरता एक बिंदु पर जरूर सिमट रही है, अब यह उसी के हाथों में है कि वह आपको किस कीमत पर पानी उपलब्ध कराता है। उस कॉलोनी के आसपास रहने वाले तीसरी दुनिया के लोगों के सामने तो यही मुश्किल है कि उनके हिस्से में तो संसाधन हैं ही नहीं। उनके पास इतनी बड़ी कीमत चुकाने के लिए संसाधन नहीं हैं। यदि हैं भी तो इतनी कम मात्रा में कि जिससे उनका गुजारा होना बेहद मुश्किल है। इसी तस्वीर के बरअक्स यह बात मौजूं हो जाती है कि दुनिया के अस्सी प्रतिशत संसाधनों का इस्तेमाल विकसित देशों में रहने वाली बीस प्रतिशत आबादी कर रही है और शेष बीस प्रतिशत संसाधनों पर ही बाकी की अस्सी प्रतिशत आबादी निर्भर है। इससे आगे की स्थिति और भी खतरनाक है क्योंकि शेष बीस प्रतिशत संसाधनों पर भी सभी का बराबर का हक नहीं है।

ठाकुर का कुआं कहानी के इतर राजस्थान की पारम्परिक सीता-बावड़ियों की तस्वीर भी जेहन में आती है, जहां कि वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत भी बावड़ी के चारों कोनों पर समाज के हर तबके के लिए व्यवस्था है। इस व्यवस्था की सबसे खास बात यह है कि सभी के लिए इसमें बराबर के प्रावधान हैं। लगातार सभ्य होते समाज ने न केवल वर्ण व्यवस्था में भी ऊंच नीच के स्तंभ तय कर दिए बल्कि संसाधनों के बंटवारे पर भी वह व्यवस्थाएं बना दीं जिससे प्रेमचंद को कहानी के विषय मिलते गए। वह विषय आज भी न केवल मौजूं हैं बल्कि उनकी स्थिति अब और गंभीर होती जा रही है। सभ्य होते समाज की तस्वीरों से कुआ और उस जैसे संसाधन सबकी पहुँच से दूर होते जा रहे हैं.

 राकेश मालवीय

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