मंगलवार, अक्तूबर 15, 2013

खबर

अपने कम्प्यूटर स्क्रीन पर अखबार के पन्नों को क्लिक करते करते उसकी नजर एक खबर पर ठहर गई। डेट लाइन से फौरन समझ में आ गया कि मामला कहां का है। खबर पढ़ते—पढ़ते ही दूसरे हाथ ने जैसे मोबाइल को बिना आदेश मिले ही थाम लिया हो। स्क्रीन को बिना देखे ही अंगूठे के सहारे लॉक भी खुल गया था। पहला पैरा पढ़ने के बाद उसकी नजर अब मॉनीटर से हटकर मोबाइल के स्क्रीन पर एक नंबर खोज रही थी।

नंबर आते—आते दूसरा हाथ डेस्क पर पढ़े टेलीफोन रिसीवर को कान तक पहुंचा चुका था। उंगलियां नंबर डायल कर रही थीं। बेल गई। ऐसे कई नंबर सामने वाले के मोबाइल फोन में भी दर्ज होते थे जहां उसे अपना परिचय नहीं देना होता था। आवाज आती थी भैया नमस्ते। बड़े दिनों बाद फोन किया। देर तक घंटी जाते रही। एक बार फोन नहीं उठा। दस मिनट इंतजार के बाद भी कॉल वापस न आता देख एक बार फिर नंबर को रिडायल कर दिया गया। इस बार स्वर किसी बच्ची का था। बच्ची के सवाल पर उसने अपना परिचय दिया। तब तक फोन किसी और हाथ में जा चुका था।

" पापा से बात करनी है ?" 

"पापा अभी खाना खा रहे हैं।"

"ठीक है।"

उसने अपने संदेश में इतना भर कहा कि पापा से कह दीजिएगा मेरा फोन था। उसने अपना परिचय और जगह का नाम बता दिया था। 

खबरों की खोज में यह उसकी दिनचर्या का एक आम हिस्सा था। अपने व्यवहार और बातचीत से उसने एक नए इलाके में भी अपने संबंध गढ़ ही लिए थे। ऐसे कई लोग थे जिन्हें वह बस आवाज से ही पहचाना करता था। लेकिन हां जब कई कॉपियों पर मेहनत करके छोटी—छोटी खबरों को भी बड़ा स्पेस मिलता तो उन लोगों के मन में एक अलग रिस्पेक्ट पैदा हुआ करती थी। वह भी एक छोटी जगह से समाचारों के संकलन का काम करता। लिखने की कोशिश करता। सीखता—समझता। अक्सर बातों ही बातों में कई ऐसी बातें बताता जो बड़े नाम वालों को भी पता नहीं होती। उसकी सबसे खास बात थी रिस्पांस। कभी कोई कॉल खाली नहीं जाता। बिजी होता तो भी राजधानी से गया कॉल उसके लिए प्राथमिकता होता।

एक बार फिर रिसीवर कान के पास गया। 

"हेलो।"

जवाब मे हेलो सुनाई दिया। आवाज कुछ भारी थी। उसने अपना परिचय दिया।

"हां, उससे आपकी बात हुआ करती थी।"

एक बारगी कुछ समझ नहीं आया। दोबारा उसने कुछ समझने की कोशिश की। पर शायद रिसीवर के दूसरी तरफ आवाज सब समझ रही थी। आखिर ऐसे कई फोन सुने होंगे।

"मुकेश अब नहीं रहा। पच्चीस जुलाई को वह चला गया।"

उसने रिसीवर को कान से थोड़ा और अधिक सटा लिया। नाक पर पड़ा चश्मा आंखों से अलग हो गया था। दो पल के सन्नाटे के बाद केवल एक शब्द का सवाल था।

"कैसे ?" 

" अटैक आया था, चला गया।"

वह अब अपराधबोध से भर गया था। कहां तो लगता था कि संबंध बेहद प्रगाढ़ हो चले हैं और कहां उसकी मौत का समाचार भी तीन महीने तक न पहुंचा। 

"अपने पीछे दो बच्चों को छोड़ गया है। बस अब तो हम ही हैं। बच्चों को संभालना है।" भाई ने शून्य को तोड़ते हुए बात आगे बढ़ाई।  आवाज का भारीपन और बढ़ रहा था।

" मेरे लायक कुछ हो तो बताईयेगा।"

शब्द लाचार हो चुके थे। मन में भारीपन बढ़ता ही जा रहा था। आफिस की छत पर जाकर उसने अपने जेब से गोल्डफलेक का पैकेट निकालकर एक सिगरेट सुलगाई। कदमों के साथ वह हवा में देख रहा था। कभी उस तरफ जहां से खबरें आती थीं।

राकेश कुमार मालवीय

दिनेश दर्द की टिप्पणी

राकेश भाई। बहुत जज़्बाती लगी ये कहानी (ख़ुदाया, कहानी ही हो)।

एक बार भोपाल में ही विकास को लेकर मेरे साथ भी ऐसा ही अनुभव घटित हुआ था। मैंने तो उसके जन्मदिन पर शुभकामनाएँ देने के लिए कॉल किया था उसे। उधर से कॉल उठते ही फित्रतन मस्ती भरे अंदाज़ में मैंने एक ही साँस में जन्मदिन की शुभकामनाएँ और तमाम दुआएँ जैसे उस पर उड़ेल दीं।

'कौन बोल रहे हैं ?', सिर्फ इतना-सा उत्तर मिला।

'अरे मैं बोल रहा हूँ विकास भाई, मैं उज्जैन से दिनेश 'दर्द'। अपन चित्रकूट और बाँधवगढ़ वाले सेमिनार में मिले थे ना, याद आया ?', मैंने बड़ी उत्सुकता से अपनी पहचान बताई।

'विकास से बात हो पाना तो अब मुमकिन नहीं होगा।', उधर से आवाज़ आई। दरअस्ल, फोन उसके भाई ने रिसीव किया था।

'लेकिन क्यूँ भाई ? आज तो उसका जन्मदिन है ना।', तमाम हैरत के साथ मेरा अगला सवाल था।

'क्योंकि अब वो हमारे बीच नहीं रहा।', विकास के भाई ने जवाब दिया।

उफ्फ.....ये कैसी ख़बर। कोई ऐसे मौके पर इस तरह की ख़बर के लिए तैयार हो सकता है भला ? पता नहीं कैसे, लेकिन हक़ीक़त के धरातल पर मैंने वो सच्चाई बर्दाश्त की। हालाँकि पैरों तले ज़मीन खिसक चुकी थी और स्मृतियों में विकास के साथ बीते लम्हे ऐसे मचल रहे थे, जैसे हैलिकाप्टर से गिरते खाने के पैकेटों पर टूटते, बाढ़ में घिरे लोग। कुछ याद नहीं कि मैंने विकास के भाई से और क्या-क्या बातें की थीं लेकिन हाँ, इतना ज़रूर याद आ गया कि मैंने भी ऐसा ही कुछ कहा था कि- 'भाई! कभी भी मेरी ज़रूरत पड़े तो ज़रूर बताना और उज्जैन आओ तो ज़रूर मिलना।'

इतने साल हो गए, ना विकास के भाई उज्जैन आए, ना विकास जैसा कोई मिला। हाँ, गाहे-बगाहे विकास ज़रूर आ जाता है अक्सर यादों में, किसी न किसी बहाने।

और हाँ, वह जुमला भी बताते चलूँ, जो मैं विकास से बिछड़ते वक़्त अक्सर कहा करता था- 'भाई! अपने भीतर की ये चिंगारी हमेशा जलाए रखना, कभी मद्धम मत होने देना।' दरअस्ल, बहस के दौरान विकास के तेवर ज़बरदस्त हुआ करते थे। सच को सच कहने और आख़िर तक उसके पक्ष में खड़े रहने का साहस देखा था मैंने उसमें। फिर चाहे सामने कोई भी हो, मुश्किल होता था उसकी आवाज़ (दहाड़) को दबाना। बस्स, उसके इसी माद्दे से मुतआस्सिर होकर मैं हमेशा उससे अपने भीतर साहस की ये शम्अ जलाए रखने की गुज़ारिश करता था। और वो भी खिलखिलाकर हँसते हुए कहता था, 'बिल्कुल दिनेश भाई बिल्कुल'

अब लगता है शायद मैंने कुछ ज़ियादा ही माँग लिया था उससे। मैं भूल गया था कि मेरी और उसकी मर्ज़़ियों के दरमियान कोई और भी है, जिसकी मर्ज़ी के इक इशारे पर दुनिया का होना-न होना टिका है। और उसी की मर्ज़ी ने एक दिन भोपाल की सड़क पर एक हादसे के बहाने उस शम्अ को हमेशा के लिए बुझा दिया। हालाँकि अब उसके सीने की शम्अ ब-ज़िद मैंने अपने सीने में जला ली है।

(मुआफ़ करना, राकेश भाई। आपकी लिक्खी कहानी पढ़ी तो मैं जज़्बाती हो गया और विकास की याद साझा करने से रोक नहीं सका ख़ुद को।)

1 टिप्पणी:

Dinesh Dard ने कहा…

राकेश भाई। बहुत जज़्बाती लगी ये कहानी (ख़ुदाया, कहानी ही हो)।

एक बार भोपाल में ही विकास को लेकर मेरे साथ भी ऐसा ही अनुभव घटित हुआ था। मैंने तो उसके जन्मदिन पर शुभकामनाएँ देने के लिए कॉल किया था उसे। उधर से कॉल उठते ही फित्रतन मस्ती भरे अंदाज़ में मैंने एक ही साँस में जन्मदिन की शुभकामनाएँ और तमाम दुआएँ जैसे उस पर उड़ेल दीं।

'कौन बोल रहे हैं ?', सिर्फ इतना-सा उत्तर मिला।

'अरे मैं बोल रहा हूँ विकास भाई, मैं उज्जैन से दिनेश 'दर्द'। अपन चित्रकूट और बाँधवगढ़ वाले सेमिनार में मिले थे ना, याद आया ?', मैंने बड़ी उत्सुकता से अपनी पहचान बताई।

'विकास से बात हो पाना तो अब मुमकिन नहीं होगा।', उधर से आवाज़ आई। दरअस्ल, फोन उसके भाई ने रिसीव किया था।

'लेकिन क्यूँ भाई ? आज तो उसका जन्मदिन है ना।', तमाम हैरत के साथ मेरा अगला सवाल था।

'क्योंकि अब वो हमारे बीच नहीं रहा।', विकास के भाई ने जवाब दिया।

उफ्फ.....ये कैसी ख़बर। कोई ऐसे मौके पर इस तरह की ख़बर के लिए तैयार हो सकता है भला ? पता नहीं कैसे, लेकिन हक़ीक़त के धरातल पर मैंने वो सच्चाई बर्दाश्त की। हालाँकि पैरों तले ज़मीन खिसक चुकी थी और स्मृतियों में विकास के साथ बीते लम्हे ऐसे मचल रहे थे, जैसे हैलिकाप्टर से गिरते खाने के पैकेटों पर टूटते, बाढ़ में घिरे लोग। कुछ याद नहीं कि मैंने विकास के भाई से और क्या-क्या बातें की थीं लेकिन हाँ, इतना ज़रूर याद आ गया कि मैंने भी ऐसा ही कुछ कहा था कि- 'भाई! कभी भी मेरी ज़रूरत पड़े तो ज़रूर बताना और उज्जैन आओ तो ज़रूर मिलना।'

इतने साल हो गए, ना विकास के भाई उज्जैन आए, ना विकास जैसा कोई मिला। हाँ, गाहे-बगाहे विकास ज़रूर आ जाता है अक्सर यादों में, किसी न किसी बहाने।

और हाँ, वह जुमला भी बताते चलूँ, जो मैं विकास से बिछड़ते वक़्त अक्सर कहा करता था- 'भाई! अपने भीतर की ये चिंगारी हमेशा जलाए रखना, कभी मद्धम मत होने देना।' दरअस्ल, बहस के दौरान विकास के तेवर ज़बरदस्त हुआ करते थे। सच को सच कहने और आख़िर तक उसके पक्ष में खड़े रहने का साहस देखा था मैंने उसमें। फिर चाहे सामने कोई भी हो, मुश्किल होता था उसकी आवाज़ (दहाड़) को दबाना। बस्स, उसके इसी माद्दे से मुतआस्सिर होकर मैं हमेशा उससे अपने भीतर साहस की ये शम्अ जलाए रखने की गुज़ारिश करता था। और वो भी खिलखिलाकर हँसते हुए कहता था, 'बिल्कुल दिनेश भाई बिल्कुल'

अब लगता है शायद मैंने कुछ ज़ियादा ही माँग लिया था उससे। मैं भूल गया था कि मेरी और उसकी मर्ज़़ियों के दरमियान कोई और भी है, जिसकी मर्ज़ी के इक इशारे पर दुनिया का होना-न होना टिका है। और उसी की मर्ज़ी ने एक दिन भोपाल की सड़क पर एक हादसे के बहाने उस शम्अ को हमेशा के लिए बुझा दिया। हालाँकि अब उसके सीने की शम्अ ब-ज़िद मैंने अपने सीने में जला ली है।

(मुआफ़ करना, राकेश भाई। आपकी लिक्खी कहानी पढ़ी तो मैं जज़्बाती हो गया और विकास की याद साझा करने से रोक नहीं सका ख़ुद को।)