जब तक हम इस विशाल देश को उसकी समूची खूबियों के साथ नहीं देखेंगे तब तक हमारा उसके प्रति प्रेम शाब्दिक ही होगा। परिक्रमा तीर्थाटन तथा पर्यटन से हम अपने देश से जुड़ते हैं। प्रकृति प्रेम देश प्रेम की पहली सीढ़ी है।
अमृतलाल बेगड़ ने अपनी तीसरी किताब तीरे—तीरे नर्मदा में यह बात लिखी है।
उन्होंने नर्मदा पर तीन अद्भुत किताबें लिखी हैं, जिनमें नर्मदा का सौंदर्य छनकर बाहर आता है, पर क्या इन किताबों के लिखे जाने के महज
तीन—चार दशक बाद भी नर्मदा उतनी साफ—स्वच्छ और निर्मल है या वह भी देश की अन्य
नदियों की राह पर चल पड़ी है।
पिछले दिनों जब मप्र के बड़वानी जिले में ककरा गांव में नर्मदा बचाओ आंदोलन के
लोगों ने नर्मदा जल का परीक्षण मुंबई की एक लैब से करवाया तो नतीजा आया कि वहां का
पानी पीने लायक नहीं बचा है। उसका केवल खेती के लिए उपयोग किया जा सकता है। उसमें
कठोरता निर्धारित मात्रा से लगभग 106 प्वाइंट ज्यादा पाई गई। यह सरदार सरोवर बांध का क्षेत्र है, विशेषज्ञ बताते हैं कि नदी का प्रवाह रुक जाने
से उसकी गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है, तो क्या नर्मदा पर बनने वाले तीस बड़े, 156 मझौले ओर तकरीबन हजार छोटे बांध बनने के बाद नर्मदा का
पानी अपनी गुणवत्ता खो बैठेगा।
नर्मदा वह नदी है जिसके बारे में कहा गया है कि उसके दर्शन मात्र से वह फल मिल
जाता है, जो कि गंगा में नहाने से
मिलता है। यह वह नदी है जिसकी सदियों से परिक्रमा करने की परम्परा है, जो अब भी जारी है। अन्य नदियों की तरह ही लोग
धार्मिक पर्वों पर इसमें स्नान करके पुण्य प्राप्त करते हैं, लेकिन क्या उन हजारोंं—लाखों लोगों केा
दिनोंदिन बदहाल होती इस नदी की रत्ती मात्र भी चिंता होती है?
सरकार ने अपना एक तंत्र बना रखा है जो समय—समय पर पानी की गुणवत्ता को लेकर अपनी रिपोर्ट जारी करता है। मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पानी मप्र में लगभग पचास जगह अपनी मॉनीटरिंग सेंटर स्थापित किए हैं। यह सेंटर पानी की जांच करके ‘ए’ से लेकर ‘डी’ तक ग्रेड देते हैं। पानी में पाए जाने वाले विभिन्न अवयवों की क्या स्थिति है, यह बताते हैं। ‘ए’ श्रेणी में पाए जाने वाला पानी सबसे बेहतर होता है जिसे साफ़ करके पीया जा सकता है, ‘बी’ श्रेणी में आने वाले पानी में नहाया जा सकता है, ‘सी’ कैटेगिरी के पानी को पारंपरिक उपचार और ठीक से रोगाणु रहित किए जाने के बाद ही पीया जा सकता है, ‘डी’ श्रेणी का पानी केवल वाइल्ड लाइफ और फिशरीज के काम के लिए उपयोग की सलाह दी जाती है, जबकि ‘ई’ श्रेणी का पानी केवल सिंचाई के लिए ही उपयोग में लेने की सलाह दी जाती है।
बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक पांच साल पहले यानी 2016—17 में में उद्गम स्थल अमरकंटक से लेकर मप्र की अंतिम सीमा ककराना अलीराजपुर के सभी स्टेशनों पर पानी ए ग्रेड यानी सबसे बेहतरीन स्थिति में पाया गया था। हर मानक बेहतरीन था। लेकिन इसके अगले ही साल से रिपोर्ट पानी की गुणवत्ता खराब होते जाने का प्रमाण प्रस्तुत कर रही हैं। 2017—18 में नर्मदापुरम जिले के सांडिया घाट से लेकर सीहोर जिले के होलीपुरा स्टेशन का पानी बी ग्रेड में पाया गया। अगले साल 18—19 में भी बुधनी घाट से लेकर होलीपुरा घाट का पानी बी ग्रेड में था। अगले साल भी नदी के इस हिस्से में हालात कमोबेश ऐसे ही थे जबकि संकेतक बी ग्रेड में रहे। 2020—21 में इसी हिस्से के बी वाले भाग में पानी सी ग्रेड में चला गया, जबकि दो स्टेशनों में पानी डी ग्रेड को छू गया, जबकि यह साल तो कोरोना से प्रभावित रहा और इस साल लॉकडाउन के चलते कई जगह से पर्यावरण स्वच्छ होने की खबरें भी आईं थी। ऐसे साल में पानी का सी ग्रेड और डी ग्रेड में पहुंचाना चौंकाता है।
सबसे बुरे हालात में जैत स्टेशन का पानी पाया गया, जहां अक्टूबर में पानी सी ग्रेड में था, वहीं नवम्बर और दिसम्बर में यह डी ग्रेड को छू
गया। जिनकी वजह थी टी केलीफोर्म बैक्टीरिया जिसकी मात्रा 24000 को छू गई। इसके अगले हिस्से में टैक्सटाइल्स
मिल्स स्टेशन होलीपुरा तक पानी या तो सी ग्रेड का है या डी ग्रेड का है। पानी की
गुणवत्ता को प्रभावित करने वाला टी कैलीफार्म बैक्टीरिया 92000 की सीमा को छू गया, साल में इसकी औसत मात्रा 13 हजार रही।
सवाल यह है कि कुछेक सालों के अंदर ही यह हालत क्यों हो रही है? मोटे तौर पर इसके कुछेक कारण बहुत साफ नजर आते
हैं, इनमें पहला है नर्मदा की
सहायक नदियों की हालत साल—दर—साल खराब होते जाना, क्योंकि नर्मदा इन्हीं सहायक नदियों के मिलने के साथ—साथ
बड़ी होती जाती है। दूसरा रेत का अवैध उत्खनन जिसके चलते उसकी स्वाभाविक
पारिस्थितिकीय बिगड़ती जा रही है, तीसरी वजह है
बड़े बांधों के बनते जाने के बाद नदी का बड़े—बड़े जलाशय में तब्दील होते जाना और
पानी का प्रवाह रुक जाना और शहरों और कारखानों का अशुद्ध पानी नदी में सीधे छोड़ते
चला जाना।
ऐसा नहीं है कि इसकी चिंता नहीं है, या इसे ठीक करने के लिए कुछ नहीं किया जाता। होता है, नर्मदा के नाम पर यात्राएं भी निकलती रहती हैं, करोड़ों पौधे भी रोप दिए जाते हैं, लेकिन अपने पर्यावरण के प्रति चेतना का अभाव और
प्रकृति से वास्तविक प्रेम का अभाव ऐसे सारे अभियानों पर पानी फेर देता है। इसलिए
जरूरी है कि नर्मदा को आने वाली कई सदियों तक नर्मदा बनाए रखने के लिए कुछ ठोस
काम किए जाएं।
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