सोमवार, फ़रवरी 22, 2010

वैज्ञानिकों के हाथ खून से रंगे हैं: देविन्दर शर्मा


  राकेश मालवीय. इंदौर   

 


खाली होती थाली: बढ़ता खाद्यान्न संकट विषय पर व्खाख्यान का आयोजन सर्वोदय प्रेस सर्विस के संस्थापक स्वर्गीय महेन्द्र भाई और समाजसेवी, पत्रकार ओमप्रकाश  रावल की स्मृति में इंदौर में किया गया। इस कार्यक्रम में देवेन्दर शर्मा मुख्य वक्ता के रूप  में उपस्थित  थे। उन्होंने बताया कि जीडीपी को आर्थिक विकास  का पैमाना माना जाता है, लेकिन दरअसल जीडीपी की बढ़ने का मतलब ही विकास नहीं है। उन्होंने कहा कि हम बाहर की चीजों का स्वागत कर रहे हैं और अपने परिवेश  की चीजों को खोते जा रहे हैं। भारत में गाय की तीस किस्में हुआ करती थीं और आज इनकी संख्या बहुत कम रह गई है। उन्होंने बताया कि देश में विभिन्न स्त्रोतों से प्रति एक हजार हेक्टेयर जमीन से सत्तर से लेकर सात करोड़ रूपए निकालकर कंपनियां ले जा रही हैं। सरकार की नीतियां भी किसान विरोधी हैं। सरकार नैनो जैसे प्रोजेक्ट को चार हजार करोड़ रूपए का ऋण 01 क़ी ब्याज दर से देती है और किसानों को दी जाने वाली रियायतों का लगातार कम किया जा रहा है। छठवे वेतनमान के बाद सरकारी चपरासी को पंद्रह हजार रूपए मासिक वेतन मिल रहा है और किसान के हिस्से में दो हजार रूपए महीना भी नहीं आ रहा। यही कारण है कि युवा पीढ़ी खेती छोड़कर बाहर जा रही है क्योंकि किसान की किस्मत में कुछ भी नहीं है और उसकी थाली खाली हो गई है। किसान पर कर्ज आ गया है। पंजाब में हर दूसरे घर में ट्रेक्टर है और यहां कुल जरूरत से सत्तर फीसदी ज्यादा ट्रेक्टर हैं। देश  में हर कहीं यही हालत है कि टेक्नोलॉजी का जरूरत से ज्यादा उपयोग किया जा रहा है। बुनियादी चीजें गायब हो रही हैं और देश की जीडीपी बढ़ाने के लिए इसको प्रोत्साहित किया जा रहा है।

देवेन्द्र शर्मा ने कहा कि अमरीका सरीखे देश में खेती में केवल सात लाख किसान रह गए हैं और सत्तर लाख लोग या तो जेल में हैं या बेल पर। भारत में साठ करोड़ किसान हैं और यह संख्या अमरीका से कई गुना ज्यादा है। अब सरकार कह रही है कि खेती में साठ करोड़ किसान की जरूरत नहीं है। इससे पहले विषय प्रवर्तन अरुण डीके ने किया. पद्मा श्री कुट्टी मनों ने भी  विचार व्यक्तय किये. सञ्चालन वरिष्ठ पत्रकार चिन्मय मिश्र ने किया. कार्यक्रम में विकास संवाद भोपाल द्वारा प्रकाशित किताब भूख को विकास का ताज बना दिया का विमोचन भी किया गया. इस किताब का लेखन और संकलन विकास पत्रकार सचिन जैन ने किया है.

भारतीय कृषि वैज्ञानिकों के हाथ खून से रंगे हैं। आज खेती की जो हालत हो गई है, उसमें कृषि वैज्ञानिकों का भी हाथ है, वे कभी खेतों में नहीं जाते, जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं होते और ऐसी तकनीकें थोप रहे हैं जो स्थायी विकास के लिए घातक हैं।  सरकार की नीतियां भी किसानों के पक्ष में न होकर कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली हैं। हालत यह है कि आज देश में किसान मर रहा है और कंपनियां पनप रहीं हैं। मप्र का किसान तो गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहा है। देश में विकास की प्रक्रिया इतनी असंतुलित और गैरबराबरी वाली है कि अब नक्सलवाद की आहट बढ़कर 230 जिलों में सुनाई दे लगी है। हालत ऐसी रही तो ऐसे ही खतरे देश के हर कोने से सुनाई देने लगेंगे। रास्ता केवल एक ही है कि टिकाऊ  खेती के जरिए देश की जड़ों को मजबूत किया जाए। डेढ़ घंटे के छोटे से भाषण के दौरान जब ख्यात कृषि वैज्ञानिक देवेन्दर शर्मा ने खेती के बड़े खतरों से आगाह कराया तो सभा में शामिल हर व्यक्ति ने समवेत स्वरों में इन खतरों से हाथ उठाकर जेहाद की हामी भरी।

1 टिप्पणी:

prashant ने कहा…

sahamat hoon sir aap se