खाली होती थाली: बढ़ता खाद्यान्न संकट विषय पर व्खाख्यान का आयोजन सर्वोदय प्रेस सर्विस के संस्थापक स्वर्गीय महेन्द्र भाई और समाजसेवी, पत्रकार ओमप्रकाश रावल की स्मृति में इंदौर में किया गया। इस कार्यक्रम में देवेन्दर शर्मा मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे। उन्होंने बताया कि जीडीपी को आर्थिक विकास का पैमाना माना जाता है, लेकिन दरअसल जीडीपी की बढ़ने का मतलब ही विकास नहीं है। उन्होंने कहा कि हम बाहर की चीजों का स्वागत कर रहे हैं और अपने परिवेश की चीजों को खोते जा रहे हैं। भारत में गाय की तीस किस्में हुआ करती थीं और आज इनकी संख्या बहुत कम रह गई है। उन्होंने बताया कि देश में विभिन्न स्त्रोतों से प्रति एक हजार हेक्टेयर जमीन से सत्तर से लेकर सात करोड़ रूपए निकालकर कंपनियां ले जा रही हैं। सरकार की नीतियां भी किसान विरोधी हैं। सरकार नैनो जैसे प्रोजेक्ट को चार हजार करोड़ रूपए का ऋण 01 क़ी ब्याज दर से देती है और किसानों को दी जाने वाली रियायतों का लगातार कम किया जा रहा है। छठवे वेतनमान के बाद सरकारी चपरासी को पंद्रह हजार रूपए मासिक वेतन मिल रहा है और किसान के हिस्से में दो हजार रूपए महीना भी नहीं आ रहा। यही कारण है कि युवा पीढ़ी खेती छोड़कर बाहर जा रही है क्योंकि किसान की किस्मत में कुछ भी नहीं है और उसकी थाली खाली हो गई है। किसान पर कर्ज आ गया है। पंजाब में हर दूसरे घर में ट्रेक्टर है और यहां कुल जरूरत से सत्तर फीसदी ज्यादा ट्रेक्टर हैं। देश में हर कहीं यही हालत है कि टेक्नोलॉजी का जरूरत से ज्यादा उपयोग किया जा रहा है। बुनियादी चीजें गायब हो रही हैं और देश की जीडीपी बढ़ाने के लिए इसको प्रोत्साहित किया जा रहा है।
देवेन्द्र शर्मा ने कहा कि अमरीका सरीखे देश में खेती में केवल सात लाख किसान रह गए हैं और सत्तर लाख लोग या तो जेल में हैं या बेल पर। भारत में साठ करोड़ किसान हैं और यह संख्या अमरीका से कई गुना ज्यादा है। अब सरकार कह रही है कि खेती में साठ करोड़ किसान की जरूरत नहीं है। इससे पहले विषय प्रवर्तन अरुण डीके ने किया. पद्मा श्री कुट्टी मनों ने भी विचार व्यक्तय किये. सञ्चालन वरिष्ठ पत्रकार चिन्मय मिश्र ने किया. कार्यक्रम में विकास संवाद भोपाल द्वारा प्रकाशित किताब भूख को विकास का ताज बना दिया का विमोचन भी किया गया. इस किताब का लेखन और संकलन विकास पत्रकार सचिन जैन ने किया है.
भारतीय कृषि वैज्ञानिकों के हाथ खून से रंगे हैं। आज खेती की जो हालत हो गई है, उसमें कृषि वैज्ञानिकों का भी हाथ है, वे कभी खेतों में नहीं जाते, जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं होते और ऐसी तकनीकें थोप रहे हैं जो स्थायी विकास के लिए घातक हैं। सरकार की नीतियां भी किसानों के पक्ष में न होकर कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली हैं। हालत यह है कि आज देश में किसान मर रहा है और कंपनियां पनप रहीं हैं। मप्र का किसान तो गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहा है। देश में विकास की प्रक्रिया इतनी असंतुलित और गैरबराबरी वाली है कि अब नक्सलवाद की आहट बढ़कर 230 जिलों में सुनाई दे लगी है। हालत ऐसी रही तो ऐसे ही खतरे देश के हर कोने से सुनाई देने लगेंगे। रास्ता केवल एक ही है कि टिकाऊ खेती के जरिए देश की जड़ों को मजबूत किया जाए। डेढ़ घंटे के छोटे से भाषण के दौरान जब ख्यात कृषि वैज्ञानिक देवेन्दर शर्मा ने खेती के बड़े खतरों से आगाह कराया तो सभा में शामिल हर व्यक्ति ने समवेत स्वरों में इन खतरों से हाथ उठाकर जेहाद की हामी भरी।
नर्मदापुरम (होशंगाबाद) जिले के गांव हिरनखेड़ा में जन्म, जहां राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी ने गुरूकुल और स्वतंत्रता संग्राम की गुप्त गतिविधियों के केन्द्र ‘सेवा सदन’ की स्थापना की थी। स्कूल शिक्षा से ही संपादक के नाम पत्रलेखन से पत्रकारिता, लेखन और साहित्यिक, सामाजिक गतिविधियों में झुकाव।
1999 में गांव से ही साइक्लोस्टाइल त्रैमासिक बाल पत्रिका बालप्रयास शुरू की, चार साल तक इसका संपादन किया। शैक्षणिक संस्था ‘एकलव्य’ के साथ जुड़कर बालगतिविधि केन्द्र बालसमूह का 1996 से 2002 तक संचालन किया। ‘ग्राम सेवा समिति’ के साथ जुड़ाव व लेखन कार्यशालाओं में सक्रिय भागीदारी से सामाजिक मुद्दों पर लिखना सीखा। अपने आसपास के मुद्दों पर पत्रलेखन के माध्यम से मुहिम चलाई, इससे कई मुद्दों को हल भी किया गया। युवा पत्र लेखक मंच के सिवनी मालवा ब्लॉक अध्यक्ष का दायित्व निभाया।
2002 में पत्रकारिता में औपचारिक पढ़ाई के लिए माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि में दाखिला लिया, प्रथम श्रेणी में डिग्री हासिल की। 2004 से 2009 तक देशबंधु, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर व राजस्थान पत्रिका भोपाल में रिपोर्टिंग और डेस्क की जिम्मेदारी संभाली।
2012 से 2015 तक दैनिक भास्कर डॉट कॉम के छत्तीसगढ़ हायपर लोकल का लांच किया और तीन साल तक स्टेट हेड के रूप में काम किया। 2016 से 2019 तक एनडीटीवी में बतौर राइटर लेखन, जी न्यूज में 2019 से 2020 तक और 2020 से 2024 तक नेटवर्क 18 में बतौर राइटर लेखन किया।
वर्ष 2020 से देश की ख्यात पर्यावरण पत्रिका ‘डाउन टू अर्थ’ में कृषि, पर्यावरण, स्वास्थ्य, जनसरोकार के विषयों पर मध्यप्रदेश से ग्राउंड—रिसर्च बेस्ड स्टोरीज पर काम जारी।
समानांतर रूप से सामाजिक शोध संस्था ‘विकास संवाद’ के साथ जनसरोकार के मुद्दों पर जमीनी काम कर रहे हैं। जनसरोकारी पत्रकारिता के लिए सक्रिय रूप से संवाद कार्यक्रमों का समन्वय। अब तक 12 नेशनल मीडिया कान्क्लेव का सफल संयोजन। सामाजिक विषयों पर दस किताबों का संपादन। लेखन, सोशल मीडिया, डिजाइनिंग और फोटोग्राफी पर प्रशिक्षक की भूमिका का निर्वाह।
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कुछ प्रतिष्ठित फैलोशिप और अवार्ड
2020 - सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज फैलोशिप फॉर एफॉर्डेबल हाउसिंग, नई दिल्ली
2019- नेशनल वाटरएड फैलोशिप, नई दिल्ली
2019— गांधीयन ईको फिलॉसफी फैलोशिप, एप्को, मप्र
2017— रीच लिली टीबी मीडिया नेशनल अवार्ड, नई दिल्ली
2015— नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया का नेशनल अवार्ड
2014— एक्सीलेंस रिपोर्टिंग आन इम्युनाइजेशन अवार्ड, यूनीसेफ, नई दिल्ली
2011— रीच लिली टीबी मीडिया फैलोशिप, चैन्नई
2007— विकास संवाद मीडिया फैलोशिप के लिए भी चुना गया।
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