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प्रेम और इंसानियत के प्रोमिस की सबसे ज्यादा जरुरत है !

‘प्रामिस-डे’ वैसे तो विशुद्ध प्रेम में तरबतर होकर इस बासंती मौसम में हमें छूकर गुजरता है, लेकिन यदि मन को छूती हवाओं पर चुनावी बयार हावी हो तो यही दुआ निक
लेगी कि काश इस मौसम से कुछ सीख-समझ लिया जाए, सोच-समझकर प्रोमिस किया जाए
, पुराने वायदों को  मान—सम्मान से तौला जाए,  किए हों प्रोमिस पूरे तो माथे पर तसल्ली हो,  और रह गए हों बाकी तो थोड़ी शर्म भी आए।

बदकिस्मती से हमारे यहाँ की राजनीति में ऐसा नहीं है। यहां वादे ही वादे हैं, वादों की बहार है, बेशुमार इश्तेहार है, लेकिन इस बात की फुर्सत किसी के पास नहीं है कि जनता जनार्दन के सामने पांच साल पहले हमने जो कहा था, उसका विश्लेषण ही कर लें, पर बात ये भी है कि किसी ने कहा है आजकल राजनेता होने के लिए मोटी चमड़ी का होना बहुत जरूरी है।

वैसे प्रेम जैसे कोमल अंदाज से यह तुलना बिलकुल भी ठीक नहीं है, लेकिन राजनीति का पूरा कारोबार तो इसी प्रोमिस से चल रहा है। कोई एक प्रोमिस पूरा न कर पाने से इतिहास में कितनी ही कहानियां दर्ज होती चली गईं, या वादा पूरा कर पाने न कर पाने की चाह में कितनी ही जिंदगियों के उतार—चढ़ावों को हम अपनी तीखी नजरों से तौलते हैं,  हीर और रांझ, लैला और मजनूं, गलियों में भटकते देवदास और न जाने ऐसे कितने नाम,  पर यहां तो हजारों वायदों को पूरा न किए जाने का न कोई गिला है, न शिकवां ! क्या राजनीति के ऐसे वादा​गीरों पर अब किसी का भरोसा नहीं रहा ? या उन्हें अब किसी वायदे करने लायक ही नहीं समझा जा रहा ? अहसास उन्हें भी है क्योंकि अब वह घोषणा पत्र नहीं शपथ पत्र जारी कर रहे हैं ! पर इससे भी साख बनेगी, नहीं मालूम !

कुछ तो गड़बड़ है ! कुछ नहीं, बहुत ज्यादा गड़बड़ है। अब तक देश का पूरा जिम्मा तो इन्हीं पर छोड़ रखा है कि वे ऐसा देश बनाएंगे जहां पर हर आदमी की रोटी—कपड़ा मकान की बुनियादी जरुरतें पूरी हो सकेंगी, पढ़—लिख कर वह प्रेम से परिपूर्ण ऐसा समाज बनेगा जो इंसानियत को विस्तार देगा, सौहार्दपूर्ण वातावरण में आ रही हर खलल को रौंद दिया जाएगा, जरुरत होने पर दवा—दारू हो सकेगी और अपने जीवन की प्रगति के लिए रोजगार के तमाम अवसर भी होंगे, लेकिन ऐसा संभव कहां हो पा रहा है ?

राजनीति के खांचे प्रेम को बढ़ाने की बजाए कम कर रहे हैं। पहनावा, खान—पान, रीति रिवाज, मान्यताओं के दायरे इतने सीमित, इतने संकुचित कि चहुँओर घृणा ज्यादा पसरी है। भारत मां के बच्चों में आपस में यह टूटन कौन पैदा कर रहा है और किसलिए कर रहा है? क्या हमारा समाज ऐसा था या अपने मतलब से उसे ऐसा बना दिया जा रहा है,  बाधाओं को उन नरम मिजाज लोगों को जरूर समझना चाहिए ​जो नफरत मुक्त समाज बनाना चाहते हैं, और यदि मैं यह पूछूं कि कौन ऐसा समाज बनाना चाहता है ​जहां एक—दूसरे के लिए नफरत, घृणा, द्वेष भरा हो, शायद ही कोई अपना हाथ उठाकर कहेगा कि  ‘हां मैं’। यदि कोई नहीं तो फिर वह कौन है

 

आडंबरों की तरह दिखते पहनावों, पोंगापंथी रीति—रिवाज, पर वाजिब सवाल हो सकते हैं, जांचा जा सकता है कि वह प्रगतिपूर्ण विचारों से ओतप्रेत हैं या नहीं, एक सभ्य समाज बनाने की दिशा में वे कितने कारगर हैं, लेकिन किसी एक मजहबी चश्मे से आधे—अधूरे दृश्यों को देखना और उस पर बिना सोचे—समझे प्रतिक्रिया जाहिर करके कोई और एजेंडा सेट करना किसी भी बेहतर समाज का हिस्सा नहीं है। यदि हम प्रगतिशील विचारों की मशाल जलाना चाहते हैं तो अपने—अपने पालों के अंधेरे को भी दूर करने की कोशिश कर लेनी चाहिए ! कोई भी अँधेरे से मुक्त नहीं है और उजाला सभी को चाहिए।

हैरत है कि अंधेरे को दूर करने का कोई प्रामिस नहीं है, बल्कि पूरी कोशिश तो अंधेरे को बरकरार रखे जाने की है। अंधेरे में राजनीति का कारोबार खूब अच्छे से फलता—फूलता है। प्रामिस आता भी है ता लालच की तरह। मुफ्त बिजली, मुफ्त राशन, मुफ्त पानी, मुफ्त का सब कुछ। दिलचस्प है कि मुफ्त कुछ होता नहीं है। उसके लिए कोई न कोई कीमत कहीं न कहीं चुकानी ही होती है। जो लोग ऐसा कहते हैं वह मुफ्त के मैनेजर भर हैं। पर वह उसे पेश करने के फन में ऐसे माहिर हैं कि मुफ्त का मारा फिर पांच साल बस इंतजार ही करता रहता है।

आप चाहें तो पॉलिटिकल पार्टीज के उन घोषणा पत्रों को उल्टा—पल्टा कर देख लें। गरीबी हटाओ नारे को ही लो। जाने कितना पुराना प्रामिस है, फिर मिलेनियम डेवलपमेंट में हमने अनेक अनेक प्रामिस करके तस्वीर बदलने का वादा किया। नहीं हुआ तो 2030 तक के लिए तय कर लिया। अब गरीबी दूर करने का लक्ष्य हमसे आठ साल दूर है। पर वायदे पर ऐतबार करें तो कैसे ?

‘रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई’ वाली परम्परा से आने वाले हम हम भारत के लोग इन चौपाईयों को क्या केवल रामचरित मानस में लिखी पंक्तियां मान लें ? भीष्म पितामह को कैसे याद करें ? हर ग्रंथ में, हर पौराणिक आख्यान में हमें ऐसा कुछ जरूर मिल जाएगा जिसे हम एक बर्बर नहीं, सभ्य समाज बनाने का प्रामिस खुद से कर सकते हैं। आज वास्तव में हर जगह ऐसे लाखों—करोड़ों प्रामिस करने की जरुरत है जहां प्रेम और इंसानियत का विस्तार बिना किसी शर्त हो सके। 

- राकेश कुमार मालवीय


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