भारत जैसे बड़े आकार और जनसंख्या वाले भारत में सौ करोड़ टीके का लक्ष्य मात्र
नौ महीने में प्राप्त कर लेना एक उपलब्धि है. निश्चित रूप से यह पूरे देश की जीत
है, इसका पूरा श्रेय टीका बनाने, लगाने और लगवाने वालों को
दिया जाना चाहिए. यह दो कारणों से और भी मौजूं है, पहला यह कि कोविड19 संकट
का भरोसेमंद हल केवल टीकाकरण में ही छिपा है और इसका दूसरा पक्ष यह कि टीकाकरण के
इस आंकड़े ने देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को नए सिरे से रेखांकित कर दिया
है, उस दौर में जबकि यह क्षेत्र अपनी प्रासंगिकता के संकट से
जूझ रहा है और निजीकरण को उसके हल के रूप में सामने लाया जा रहा हो.
टीकाकरण ही हल है :
दुनिया में अब तक आई महामारियों का केवल एक ही इलाज रहा है और वह है टीकाकरण,
चाहे चिकन पॉक्स का मामला हो, मीजल्स का हो या टीबी का. जब कोविड 19 देश में अपना कहर बरपा रही थी, तब हर किसी को
केवल टीके से ही एक उम्मीद थी, क्योंकि इलाज तो कोई था नहीं, कोई कारगर दवा भी
नहीं बन पाई, हाँ, इसको नियंत्रित करने के लिए जो कुछ भी चिकित्सा विज्ञान ने किया,
वह बहुत महत्वपूर्ण था. समानांतर रूप से वैक्सीन पर भी काम चल ही रहा था, पहली
जरूरत तो थी कि कारगर वैक्सीन बन पाती, वैक्सीन बनी, पर उससे बड़ी चुनौती यह भी थी,
कि भारत जैसे बड़े देश में हर नागरिक के लिए बन पाती. यानी जल्दी से जल्दी इसका बड़ी
मात्रा में उत्पादन होता. अदम्य इच्छाशक्ति से उसे भी पूरा कर लिया गया.
..लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह थी
लेकिन इससे भी कहाँ बात बनने वाली थी,`वैक्सीन के साथ जो सबसे बड़ी चुनौती आई,
वह थी अफवाहें. हमारे जैसे समाज में कदम-कदम पर अफवाहें तैरने लगती हैं, और उसी
आधार पर लोगों की धारणाएं बन जाती हैं. वह कोविड वैक्सीन के साथ भी बनीं. वैक्सीन
लगने से नपुंसक होने से लेकर टीके में मांस होने तक न जाने कितनी अफवाहें थीं.
हालात यह थे कि स्वास्थ्यकर्मी वैक्सीन लगाने घर जाते और लोग उन पर पत्थर और डंडो
से हमला करते.
इसकी एक वजह यह भी थी कि टीके के लेकर हमारे समाज का एक हिस्सा पहले से ही
जागरूक नहीं है. सरकार सालों-साल से कोशिश करती रही है, लेकिन बच्चों का भी पूर्ण
टीकाकरण अब तक नहीं हो पाया है. 12 से 23 महीने वाले बच्चों को बीसीजी, मीजल्स, डीपीटी और पोलियो की तीन खुराकों का प्रतिशत 62 तक पहुँच
पाया, 19 प्रतिशत बच्चे मीजल्स टीके की खुराक
से वंचित रहे. (NFHS-4). ऐसे कई और व्यवहार हैं, जिनमें भारतीय समाज बहुत पीछे है, और इसीलिए स्वास्थ्य मानक भी अपेक्षित गति से ठीक नहीं हो
पाते.
सब आगे न आते तो कैसे संभव होता ?
लेकिन सौ करोड़ डोज का राहत भरा आंकड़ा जब आया तो इसमें उन तमाम लोगों की जीत है,
जिन्होंने जागरूकता का काम किया, अफवाहों को दूर किया, सकारात्मक वातावरण बनाया.
पाॅलिटिकल- सोशल-कल्चरल
लीडरशिप ने इसमें भूमिका निभाई. संचार माध्यमों का महत्व स्थापित हुआ. देश के
कोने-कोने में काम कर रहे उन हजारों सामाजिक-नागरिक संस्थाओं (NGO) ने भी संकट से निपटने में और टीकाकरण में
अपना योगदान दिया.
असल हीरो तो हैं फ्रंट लाइन वर्कर्स
टीकाकरण में जो सबसे आगे खड़े थे, देश के वे लाखों स्वास्थ्य कार्यकर्ता जो घर-घर पहुंचे, संकटों के बावजूद. उनका संघर्ष कुछ कम नहीं है. रविवार को
देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे मान की बात कार्यक्रम में सबसे पहले
रेखांकित भी किया. एएनएम जोकि देर
रात तक भी अपने टारगेट को पूरा करने में लगी रहीं. कई महिलाओं ने 12 घंटे में 1300 डोज लगाने का
रिकार्ड बना दिया. कई स्वास्थ्यकार्यकर्ता नदी पार करते हुए दिखीं, कई नाव में बैठकर दूसरे गांव में टीका लगाने
पहुंची. कई बार भोजन भी नहीं मिला, और कई बार परिवार
और बच्चों की नाराजगी को भी झेला. भारत जैसे देश में जहां पर ग्रामीण भारत इतनी
दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों में बसा है कि पहुंचना ही मुश्किल है, वहां पर टीके को पहुंचाना कितना साहस का काम है
यह वही समझ सकता है जिसने इन इलाकों को देखा है, खुशी की बात यह है कि टीका वहां पर भी पहुंचा.
पर क्या केवल धन्यवाद से ही काम चल जाएगा ?
लेकिन संक्रमण के खिलाफ इस लड़ाई के इन लाखों योदधाओं को क्या केवल धन्यवाद से
काम चल जाएगा. उन लाखों स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने अपने नियमित काम के अलावा यह
काम किया है, क्या वह किसी तरह के
पारितोषिक के हकदार नहीं होते हैं. जब सरकार वैक्सीन निर्माताओं को करोड़ों रुपए
दे सकती है, तब कुछ करोड़ रुपए इनके
हिस्से में रखने से उन्हें ही अच्छा काम करने की प्रेरणा मिलती रहेगी. इस बात को
समझना चाहिए कि टीकाकरण का यह काम केवल आठ घंटे की नौकरी से ही नहीं हो गया, इसके लिए उन्होंने अपनी क्षमता से अधिक समय और
श्रम लगाया है, इनका असली सम्मान तभी
होगा, जब इस श्रम का सम्मान उन्हें धन्यवाद के अलावा
भी दिया जाएगा.
सार्वजानिक सेवाओं को संरक्षित करने का बीड़ा उठाया जाएगा ?
वहीं एक बार फिर इस बात पर भी सोचने की जरूरत होगी कि सरकार स्वास्थ्य और
शिक्षा जैसे सेक्टर को ज्यादा से ज्यादा अपने हाथ में रखे ताकि वास्तव में सबका
साथ सबका विकास हो सके और ऐसी आपात स्थितियों में उसके पास अपनी खुद की एक बड़ी
ताकत हो. थोड़ा सोच कर देखिए यदि देश में स्वास्थ्य सेवाओं का पूरी तरह से निजीकरण
हो गया होता, तो ग्रामीण और गरीब भारत
में हम इस लक्ष्य को कैसे प्राप्त कर पाते. इसलिए जरूरत इस बात की है कि
क्रियान्वयन की खामियों को दूर किया जाए, घाटे को दूर किया
जाए, न कि घाटे के नाम पर सार्वजनिक सेक्टर को निजी
हाथों में सौंप दिया जाए. हमारे देश के अधिसंख्यक समाज की क्षमता भारी कीमत चुकाकर
निजी सेक्टर की सेवाएं लेने की नहीं हो पाई है.
क्योंकि मंजिल अभी दूर है
लेकिन पूर्ण टीकाकरण की मंजिल अभी दूर है. 130 करोड़ की आबादी वाले भारत
में 260 करोड़ डोज लगाए जाने है. हम उम्मीद करते हैं कि बच्चों के
लिए भी जल्द ही वैक्सीन उपलब्ध हो जाएगी. ऐसे में सौ करोड़ डोज का आंकड़ा एक
आश्वस्ति जरूर है, लेकिन मंजिल अभी बहुत दूर है. इस परिस्थिति में
हमें टीकाकरण पर हर वर्ग के इसी तरह के प्रोत्साहन की जरूरत होगी और जाहिर सी बात
है कि देश में नियमित रूप से बच्चों, किशोर—किशोरियों और
महिलाओं का जो पहले से टीकाकरण होता रहा है, (और वह भी एक बड़ा काम है) उसे भी जारी रखा जाएगा. इस नजरिए से सरकार को
देखना होगा कि यह उत्साह अभी और कैसे बना रहे.
राकेश कुमार मालवीय
0 टिप्पणियाँ