एमपी में बीजेपी की सरकार है। राजस्थान में कांग्रेस का राज है और दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हुकूमत है। तीनों ही दल एक दूसरे के कड़े प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन लापता बच्चों के मामलों में तीनों ही सरकारों का प्रदर्शन एकदम खराब है, यहां तक कि कोरोना काल में जब सब जगह सख्त लॉकडाउन लगा था उस अवधि में भी बच्चों की गुमशुदगी के मामले लगातार जारी थे। बच्चों के प्रति लापरवाही के सालों साल से चल रहे इस ओलंपिक में मध्यप्रदेश गोल्ड मेडल, दिल्ली सिल्वर मेडल और राजस्थान ब्राउंज मेडल का विजेता है। कल जब हम दुनिया भर में ‘वर्ल्ड डे अगेन्स्ट ट्रैफिकिंग इन पर्सन्स’ (world day against trafficking in persons 2021) के जरिए इस विषय पर चिंता कर रहे होंगे तब चाइल्ड राइटस एंड यू (CRY) की कोशिशों से सामने आए इन आंकड़ों गौर करने की जरूरत है।
क्राय बाल अधिकारों के लिए समर्पित संस्था है, जो लंबे समय से दुनियाभर में बाल अधिकारों की आवाज बुलंद
करने का काम बड़े जतन से कर रही है। संस्था ने 1 जनवरी से 31 जुलाई 2020 के दौरान गुमशुदा हुए बच्चों की स्थिति सामने
वाली रिपोर्ट कोविड एंड मिसिंग चाइल्डहुड जारी की है। यह दुनिया के हालिया इतिहास
का सबसे कठिन दौर रहा, जब हर व्यक्ति
कोरोना वायरस से प्रभावित था। किसी को इससे लड़ाई करने का ठीक—ठीक तरीका नहीं
मालूम था, इस संघर्ष में ऐसी कहानियां
हमारी आंखों के सामने से गुजरी जिन्हें हम अब याद भी नहीं करना चाहते, लेकिन जैसे बहुत सारी कहानियों को आना बाकी है।
यह कहानी भी बच्चों की इस अंधेरी दुनिया से वाकिफ करवाती है, और हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर जब सब
जगह लॉकडाउन (LockDown) लगा था, कदम—कदम पर पुलिस का पहरा था, हर आदमी एक दूसरे की नजर में था क्या तब भी
बच्चों का व्यापार जारी था।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2020 के शुरुआती सात महीनों में उत्तरी भारत के
पांच राज्यों दिल्ली, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश से तकरीबन 9453 बच्चों के गुमशुदा होने की रिपोर्ट
दर्ज की गईं। इनमें 7065 यानी तकरीबन 74 प्रतिशत मामले लड़कियों के गुमशुदा होने
के हैं। क्या आप इस बात की ठीक—ठीक मतलब समझ सकते हैं। एक तो लॉकडाउन में भी बच्चे
गायब हो हुए, उस पर लड़कियों के गायब होने का प्रतिशत लड़कों
से लगभग तिगुना ज्यादा है, इसका मतलब आप खुद ही समझिए। इनमें सबसे टॉप पर
है मध्यप्रदेश (MadhyaPradesh)। देश में शायद
ही दूसरा कोई और राज्य हो जिसने बच्चों के लिए इतनी प्रतिबदधता दिखाई हो। बच्चों
के लिए समर्पित कोई ऐसा दूसरा मुख्यमंत्री भी देश में नहीं
है जो खुद को बच्चों के मामा के रूप में पेश करता हो। लेकिन कहने को करने में भी
दिखाना होगा, यदि शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh
Chouhan) खुद बच्चों की बेहतरी
चाहते हैं तो उन्हें अपने सिस्टम को भी इस बात को समझाना होगा।
कोरोनाकाल में मध्यप्रदेश में गायब होने वाले बच्चों की संख्या इन उत्तरी
राज्यों में सबसे अधिक है। यहां पर तकरीबन 5446 बच्चे गायब हुए, इनमें से 4371 लड़कियां थीं,
जबकि 1075 लड़के थे, इसके बाद दिल्ली से 1828 बच्चे लापता थे, राजस्थान से 1016 बच्चों
के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज की गईं, उत्तरप्रदेश से 804 बच्चे
गायब हुए जबकि हरियाणा से 359 बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की गईं। ये सभी
आंकड़े महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से प्राप्त हुए और उन्हें नेशनल क्राइम
रिकार्ड ब्यूरो से टैली करके भी देखा गया है। यानी यह विश्लेषण शुदध सरकारी
आंकड़ों पर आधारित है, जबकि एक परिस्थिति यह भी है कि बहुत सारी
रिपोर्ट पुलिस थानों तक पहुंचती ही नहीं हैं, या लोग रिपोर्ट करने
पहुंचते भी हैं तो उनकी प्राथमिकी दर्ज कर पाना आसान नहीं होता है।
मिसिंग होने के साथ ही बहुत महत्वपूर्ण बात यह है कि कितने
बच्चों को खोजकर वापस उनके घरों तक पहुंचा दिया जा रहा है। अब जबकि इंडिया डिजिटल
हो गया है और संचार क्रांति भी गांव—गांव पहुंच गई है, तमाम
मैसेंजर से एक पल में फोटो, वीडियो और जानकारियां एक कोने से
दूसरे कोने तक पहुंच ही जा रही हैं, तब मिसिंग चिल्ड्रन को खोजना, पाना, उन्हें
वापस घरों तक पहुंचाना आसान होना चाहिए, लेकिन मामला जब एक
गिरोह की तरह चलाया जा रहा हो तब यह पूरी साजिश इन्ही माध्यमों से बचकर की जाती
है। गुमशुदा बच्चों के मामलों और मानव तस्करी के बीच बहुत स्पष्ट संबंध हैं। एक
बच्चा जितना अधिक समय तक लापता रहता है, वह उतना
ही अधिक असुरक्षित हो जाता है, जिससे
मादक द्रव्यों के सेवन, यौन शोषण, मानव तस्करी और यहां तक कि मृत्यु के जोखिम जैसी उच्च जोखिम
वाली गतिविधियों का खतरा बढ़ जाता है।
यदि गुमशुदा बच्चों के पता करने और उन्हें घर तक पहुंचाने
की बात करें तो उत्तरप्रदेश इसमें सबसे फिसडडी है। योगी आदित्यनाथ की पुलिस और
प्रशासनिक महकमा 51 प्रतिशत बच्चों को खोज पाने में नाकाम साबित हुआ है, दिल्ली
और मध्यप्रदेश में लगभग चालीस प्रतिशत बच्चे हरियाणा 32 प्रतिशत
और राजस्थान तकरीबन तीस प्रतिशत बच्चों को वापस पहुंचाने में नाकाम साबित हुआ। क्या
प्रदेश की विधानसभाओं में कभी इन बातों पर बहस होगी कि आखिर ये बच्चे गए तो कहां
गए। यदि हमारा समाज और सरकार इस विषय पर ऐसे ही असंवेदनशील रहा तो यह आंकड़ा और
बढ़ता जाएगा। एनसीआरबी का ट्रेंड बताता है कि 2018 में जहां 184 बच्चे हर
दिन गायब हो रहे थे वहीं इसके अगले साल में यह बढ़कर दो सौ बच्चे प्रतिदिन हो गया।
क्राय की सोहा मोइत्रा बताती हैं कि हर रिपोर्ट के साथ हमें ऐसे तथ्य मिलते हैं जो हमें इस मुद्दे पर और अधिक सख्ती से काम करने के लिए मजबूर करते हैं। महामारी की वर्तमान स्थिति ने इसमें और चुनौतियां जोड़ी हैं। इस प्रकार, लापता बच्चों के मुद्दे से निपटने के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता है। यह मुद्दा तब और अधिक संवेदनशील हो जाता है जब विभिन्न राज्यों से कोविड-19 के कारण अपने माता-पिता को खोने वाले बच्चों के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसी स्थिति मे बच्चे अधिक असुरक्षित हो जाते हैं। इसके अलावा, समुदाय और पंचायत आधारित मॉडलों की व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता है।
Article has is written for News 18.
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