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Blog: क्या कोविड19 के बाद और बढ़ जाएगी बाल मजदूरी



राकेश कुमार मालवीय

हमारे देश में ही नहीं दुनिया में बालमजदूरी की स्थिति बेहद खराब है। तमाम नियमों- कायदे- कानून के बावजूद बाल मजदूरी चोरी छिपे चलती रहती है, कहीं इस रूप में कि वह हमें दिखाई ही नहीं देती और कहीं कारखानों में गुपचुप भी। बच्चे चूंकि सस्ता श्रम हैं और कई मामलों में तो वह बेहतर श्रमिक साबित होते हैं, इसलिए उन्हें काम में झोंक दिया जाता है। कोविड 19 से उपजी परिस्थितियों में जबकि गरीबी और बढ़ जाने की आशंकाएं जताई जा रही हैं, तब यह सवाल भी सामने आ जाता है कि आने वाले वक्त में बाल मजदूरों के आंकड़ों पर इस गरीबी और बदहाली का क्या असर होने वाला है ? जिन भयंकर स्थितियों को सालों की मेहतन के बाद सुधारा गया था, क्या वह परिस्थितियां फिर से वैसी ही हो जाने वाली हैं ?

हाल ही में इंटरनेशल लेबर आर्गनाइजेशन और यूनीसेफ ने अपनी रिपोर्ट में दुनिया में बाल मजदूरी का जो चेहरा पेश किया है उस पर सोचने की जरूरत है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया का हर दसवां बच्चा किसी न किसी तरह की मजदूरी करने पर मजबूर है। यदि आंकड़ों में इसे देखें तो दुनिया में 16 करोड़ बच्चे मजदूर हैं। इनमें तकरीबन 6 करोड़ लड़कियां और दस करोड़ लड़के शामिल हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि 2020 में बाल मजदूरी के मामलों में दुनिया में तकरीबन 84 लाख बालमजदूरों की बढ़ोत्तरी हो गई है। कई सालों की गिरावट के बाद यह आंकड़ा एक बार फिर आश्चर्यजनक रूप से बढ़ने लगा है। इससे पहले बालमजदूरी के आंकड़े लगातार कम हो रहे थे, जोकि सुखद था। 2000 में करीब 24.6 करोड़ बच्चे बाल मजदूर थे, 2004 में इसमें तकरीबन 2 करोड़ कम होकर 22 करोड़ बच्चे बाल मजदूर रह गए, 2008 में 21 करोड़, 2012 में 16 करोड़ और 2015 में 15.2 करोड़ बच्चे बालमजदूरी कर रहे थे, 2020 में यह वापस 16 करोड़ पर जा पहुंचे हैं।

भारत में भी स्थिति और ज्यादा खराब कही जा सकती है, हालांकि भारत में बाल मजदूरों के आंकड़ों में लगातार गलत आंकड़े दिए जाते रहे हैं। हमने देखा है कि कोविड19 से मौतेां के आंकड़ों और वास्तविक आंकड़ों में भारी अंतर देखा गया है। इससे व्यवस्था खुद के चेहरे को तो छिपा लेती है, लेकिन खतरों की एक गहरी खाई बनी रहती है, और उसमें किसी भी पल औंधे मुंह गिरने की संभावनाएं भी बरकरार रहती हैं। बाल मजदूरी के मामले में तो यह प्रवृत्ति कई दशकों से रही है, यहां तक कि बाल मजदूरों का कोई देशव्यापी सर्वेक्षण भी नहीं है, जो ठीक—ठाक तरीके से यह बता सके कि देश में बाल मजदूरों की वास्तविक संख्या है क्या ? यदि आप इसका जवाब सूचना के अधिकार से मांगना चाहेंगे तो इसके जवाब में ऐसे आंकड़े मिलेंगे जिन पर यकीन करना मुश्किल होगा ! यहां तक कि लोकसभा—विधानसभा में दिए गए जवाबों पर भी भरोसा नहीं होता कि बालमजदूरी के यह आंकड़े किस देश के हैं ? यदि वाकई स्थिति पहले से बेहतर है तो बहुत अच्छा है, लेकिन जब हम बालश्रम को जनगणना के आईने में देखते हैं, तो स्थिति और भयावह नजर आती है. भारत में 5 से 14 साल के बच्चों की कुल संख्या 25.96 करोड़ है. इनमें से 1.01 करोड़ बच्चे श्रम करते हैं, यानी कामगार की भूमिका में हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि 5 से 9 साल की उम्र के 25.33 लाख बच्चे काम करते हैं. 10 से 14 वर्ष की उम्र के 75.95 लाख बच्चे कामगार हैं। 1.01 करोड़ बच्चों में से 43.53 लाख बच्चे मुख्य कामगार के रूप में, 19 लाख बच्चे तीन माह के कामगार के रूप में और 38.75 लाख बच्चे 3 से 6 माह के लिए कामगार के रूप में काम करते हैं। राज्यवार देखें तो उत्तरप्रदेश (21.76 लाख), बिहार (10.88 लाख ), राजस्थान (8.48 लाख), महाराष्ट्र (7.28 लाख) और मध्यप्रदेश (7 लाख) समेत पांच प्रमुख राज्यों में 55.41 लाख बच्चे श्रम में लगे हुए हैं। यह आंकड़े खुद भारत सरकार के हैं।

इसलिए यह समस्या कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। समाज में इसको छिपाने की प्रवृत्ति बहुत घातक है, यह हमारा भविष्य तहस—नहस करने पर आमादा है। हमें यह तक करना होगा कि भविष्य के भारत को दुनिया का निर्माता बनाना है, या दुनिया के लिए मजदूरों की भीड़ तैयार करना है, यदि हमारी प्राथमिकता रचियता बनने की है तो हमें सुखद भविष्य गढ़ने के लिए अपने ​बच्चों पर भारी निवेश करने की जरुरत है। यह तभी हो सकता है ​जबकि बालश्रम जैसे नासूर को समाज से दूर किया जाए। यह रिपोर्ट हमें चेतावनी देती है, कि आज ध्यान नहीं दिया गया तो तो कोविड-19 का यह 2022 तक दुनिया में 89 लाख बच्चों को और बालमजदूरी के जाल में फंसा देगा ! यह आशंका व्यक्त की गई है कि कि 2022 तक दुनिया में बाल मजदूरों की संख्या बढ़कर 20.6 करोड़ तक हो सकती है।

भारत जैसी कृषि प्रधान देश जिसकी आबादी कृषि क्षेत्र पर ज्यादा निर्भर है, वहां तय करना होगा कि बच्चों को बाल अधिकार कैसे मिलें ? इसके लिए जरूरी होगा कि आर्थिक रूप से गैरबराबरी को मिटाया जाए, क्योंकि इसका सीधा असर बालमजदूरी पर भी पड़ता है। रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले करीब 13.9 फीसदी बच्चे बाल मजदूरी कर रहे हैं वहीं शहरी क्षेत्र के 4.7 फीसदी बच्चे कामगार हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह कृषि क्षेत्र में बड़ी संख्या में काम करते हैं, और मॉनीटरिंग का कोई सक्रिय तंत्र नहीं होने की वजह से वह बदस्तूर जारी रहती है। करीब 72.1 फीसदी बच्चे अपने पारिवारिक काम-धंधों में मदद कर रहे हैं, निश्चित तौर पर उनका विकास भी प्रभावित तो होता ही है।  हालांकि इस तरह के कामधंधों पर ​एक विवाद भी है और एक पक्ष इसे ठीक मानता है, लेकिन उसमें बच्चों की आवाज कभी नहीं सुनी जाती कि क्या इससे उनका बचपन कोई छीन तो नहीं रहा है। क्या भविष्य की चाह में वर्तमान से अन्याय उचित है ? क्योंकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि 5 से 11 वर्ष की आयु के एक चौथाई से अधिक बच्चे और 12 से 14 वर्ष की आयु के एक तिहाई से अधिक बच्चे जो बाल मजदूरी करने को मजबूर हैं, वो स्कूल नहीं जाते हैं, इससे उनकी शिक्षा प्रभावित होती है।

कोविड19 के मोर्चे पर लड़ने के लिए इतने सारे मोर्चे खुले हुए हैं कि इसको मिलकर ही हराया जा सकता है। यह समाज के पुनर्निर्माण का वक्त होगा। इसको कई तरफ से देखने की जरूरत होगी।

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