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सांस्कृतिक विश्व विरासत भीमबैठका उपेक्षित क्यों ?

  

                                                                                             Photo : Rakesh Kumar Malviya 

भीमबैठका सुन्दरता की आदत है,

भीमबैठका की आदिवासी चट्टानों में अथाह मौन,

मौन का महात्म्य है,

भीमबैठका रहवास का उजाला है,

सर्जन-विश्वास का भी !

— प्रेमशंकर शुक्ल

कोरोना काल में विश्व विरासत भीमबैठका एक बार फिर चर्चा में आ गई। इसकी वजह थी एक ऐसा जीवाश्म जिसके बारे में बताया गया कि यह तकरीबन 550 मिलियन साल पुराना है। यह जीवाश्म विश्व धरोहर भीमबैठका के आडिटोरियम नुमा शेल्टर में मिला। पत्तियों के आकार जैसे लगभग 17 इंच लंबे डिकिनसोनिया नाम से पहचाने जा रहे इस जीवाश्म ने दुनिया में एक बार फिर भीमबैठका को चर्चा में ला दिया। 

इस जीवाश्म को खोजे जाने की कहानी भी बड़ी विचित्र है। भूगर्भशा​स्त्रियों की एक इंटरनेशनल कान्फ्रेंस मध्यप्रदेश में होने जा रही थी। इसमें देश—विदेश के कई भूगर्भशास्त्री हिस्सा पहुँच चुके थे, इस बीच यह कान्फ्रेंस कोविड 19 के कारण रदद हो गई। इसके बाद भूगर्भशास्त्रियों का एक समूह यूँ ही  भीमबैठका पहुंचा। यूनिवर्सिटी आफ आरेगन के गेग्रोरी रेटालेक भी उनमें से एक थे। वह डिकिनसोनिया पर पिछले कई सालों से काम कर रहे हैं। यूँ तो हजारों लोग यहाँ से गुजरते हैं पर उनकी नजर इस विचित्र से जीव पर जाकर अटक गई। इसके फोटोग्राफ लिए पूरी तहकीकात करने पर पता चला कि यह विचित्र आकृति डिकिनसोनिया है। इस पर गोंडवाना शोधपत्र में रिसर्च पेपर प्रकाशित हुआ है। ऐसी आ​कृतियां दक्षिण आस्ट्रेलिया में पाई गई हैं। विश्व विरासत भीमबैठका का यह एक नया आयाम था। इसने विश्व विरासत में नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं।

भीमबैठका मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में विंध्याचल पर्वतमाला के तकरीबन आखिरी हिस्से पर स्थित है। सड़क और रेलमार्ग से इसे दूर से देखा जा सकता है। कोई सात दशक पहले डॉ विष्णु वाकड़कर ने रेल से गुजरते हुए इस समूह को देखा और उनकी आंखें वहीं ठहर गईं। वह अपना दल—बल लेकर आए और इतिहास के इस पन्ने को दुनिया के सामने लाने में सफलता हासिल की। 1989 में इसे पुरातत्व सर्वेक्षण ने राष्ट्रीय महत्व की जगह निरुपित किया। 2003 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर का दर्जा दिया। 

 

भीमबैठका तक पहुंचने के लिए भोपाल—होशंगाबाद रोड से लगभग दो किमी अंदर जाना पड़ता है। यह भोपाल से लगभग 45 किमी की दूरी पर है। भोपाल से इतनी ही दूरी पर विपरीत दिशा में एक और विश्व विरासत है सांची। ऐतिहासिक स्थल भोजपुर का प्रसिदध शिव मंदिर इस इलाके को समृदध बनाता है। राजधानी भोपाल के आसपास के पचास किलोमीटर के दायरे में यह स्थान अपने—आप में एक अदभुत सर्किट का निर्माण करते हैं। यहां पर इतिहास को जानने—समझने, उसे सीधे देखने, करीब से महसूस करने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। इसके बावजूद आखिर यह सर्किट उस तरह से ख्याति क्यों प्राप्त नहीं कर पाता। यह बड़ा सवाल है।

हालात यह हैं कि यदि आप भीमबैठका जाकर उसको देखना—समझना चाहें तो वहां पर आपको पत्थर पर लिखी जानकारियों के अलावा कुछ और मिलता ही नहीं है। सांची में तो फिर भी आपको गाइड मिल जाते हैं, लेकिन भीमबैठका में गाइड भी बहुत खोजने के बाद मिल जाए तो अपना भाग्य समझिए। सालों—साल के इंतजार के बाद अब जाकर भोपाल से यहां पहुंचने के लिए एक ठीक—ठाक सड़क का निर्माण हो सका है। हालांकि मुख्य मार्ग से भीमबैठका तक पहुंचने का मार्ग अब भी वैसा नहीं है जैसा विश्व विरासत का होना चाहिए। आपको यहां न कोई संदर्भ सामग्री मिलती है। ठीक से प्रचार—प्रसार का तो सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि ऐसे कामों से वोट साधने का कोई काम नहीं हो सकता है। इसलिए इनका विकास किसी पार्टी के चुनावी एजेंडे में कभी शामिल नहीं हो पाता है।

यही कारण है कि अलग—अलग श्रेणियों में दर्ज 38 साइटस में भीमबैठका सबसे उपेक्षित है। यदि कोरोना19 वाले साल में देखा जाए तो यहां पर मात्र 36 हजार लोगों की आवाजाही हुई, जबकि इसी साल ताजमहल देखने दस लाख लोग पहुंचे। सामान्य स्थिति वाले सालों में भी अनुपात लगभग यही होता है। ताजमहल का अनुपम सौंदर्य लोगों को खींचता है, लेकिन भीमबैठका में संभावना होने पर भी वह रोमांच क्यों नहीं। हो भी कैसे?  उसके लिए संसाधनों की जरुरत होती है। पर सरकार यहां पर खर्च भी नहीं करना चाहती। साल 2020—21 में यहां के रखरखाव और विकास पर मात्र 14 लाख रुपए का बजट था, जबकि ताजमहल जैसी दूसरी साइट पर यह बजट करोड़ों में जा पहुंचता है।

हालांकि कई पुरातत्वप्रेमियों  का यह भी मानना है कि ऐसी विरासत में जितनी आवाजाही कम होगी उतना ही अच्छा है, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि उसे इतना भी उपेक्षित न कर दिया जाए कि वह विश्व विरासत जैसा लगे ही नहीं। उसकी खोजों को प्राथमिकता ही न दी जाए। यहां पर तमाम इंतजाम भी किए जा सकते हैं और धरोहर सुरक्षित रहे, यह भी सुनिश्चित किया जा सकता है। एक टूरिज्म सर्किट के रूप में सांची, भीमबैठका, भोजपुर और खजुराहो को भी शामिल करके नए सिरे से प्रमोट किया जा सकता है। यहां पर और ऐसी खोजों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है, न जाने ​इस विरासत ने अपने में और क्या—क्या रहस्य छिपा रखे हों ?

और अंत में फिर प्रेमशंकर शुक्ल के ही शब्दों में

भीमबैठका में कविता का एकान्त है

और पृथ्वी की किताब में

भीमबैठका एकान्त की कविता है.

राकेश कुमार मालवीय

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