(सचिन कुमार जैन)
इस वक्त को याद रखियेगा. भूलियेगा मत. जब हम क्या पूछ रहे हैं, क्या जांच रहे हैं, क्या चाह रहे हैं? हम पूछ रहे हैं कि बताओ आक्सीजन का स्तर क्या है? सांस सचमुच जिन्दगी का सबसे बुनियादी सूचक है, किन्तु हमने माना नहीं. इस महामारी ने हमें जड़ों की तरफ धकेल दिया और हम अपनी साँसों को गिन रहे हैं. पूरी संपदा लगा कर आक्सीजन की तलाश कर रहे हैं.
इस रेलमपेल में युसूफ भाई हमें छोड़ कर चले गए. इस आदमी के चले जाने से बहुत फर्क पड़ गया है. सिर्फ इस कारण से कि यह एक ऐसा इंसान था, जो प्रेम को जीता था. उसकी रगों में प्रेम और विश्वास ही दौड़ता था. ऐसे युसूफ भाई के चले जाने से फर्क पड़ता है. हम किसी एक परिवार में जन्म लेते हैं और उससे ही हमारे रिश्ते तय हो जाते हैं. वो हमारे बनाए-कमाए-उगाये हुए रिश्ते नहीं होते हैं. मैनें तो एक रिश्ता खुद बनाया-कमाया-उगाया था युसूफ भाई के साथ.
जानते हैं यह आदमी अपने संवाद की शुरुआत किस शब्द से करता था – यह आदमी कहता था : जिंदाबाद! पारिवारिक रूप से उनके यहाँ खदानों का काम होता रहा किन्तु युसूफ भाई ने खदान का व्यापार नहीं, खदान मजदूरों की जिन्दगी को संरक्षित करने का काम हाथ में लिया. अगर चाहते तो वो भी कारोबारी बन सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया. एक पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण आख्रिरी दिन तक पन्ना में उन्हें ठेकेदार कहा जाता रहा, किन्तु प्रेम से; जबकि उनका कोई ऐसा पेशा नहीं था. उन्होंने बस प्रेम और मानव अधिकारों का ही काम किया.
मार्च २०२० में जब कोविड१९ का प्रकोप सामने आया, लाकडाउन लग गया, फिर भी युसूफ बेग और उनकी टीम तालाबंदी में नहीं गयी.
पन्ना वह जिला है, जहाँ से बड़ी संख्या में मजदूर पलायन करके गुजरात, दमन, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र जाते हैं. पिछले साल जब ये मजदूर वापस पन्ना लौटने लगे तब प्रशासन की जिम्मेदारी थी कि वापस जाने वाले मजदूरों की जांच करे और जांच के बाद उन्हें स्वस्थ पाए जाने पर गाँव-घर जाने दे. प्रशासन को यह अंदाज़ा ही नहीं था कि इन मजदूरों का प्रबंध कैसे किया जाएगा, तब युसूफ बेग ने अपने साथियों के साथ इस व्यवस्था को बनाने में अग्रणी भूमिका ली.
शायद आप जानते होंगे कि पन्ना वह जिला है, जहाँ सबसे अच्छी गुणवत्ता के हीरों की खदानें हैं, किन्तु ये खदानें हज़ारों मजदूरों की कब्रगाह भी हैं. यहाँ दो जून की रोटी कमाने वाले मजदूर सिलिकोसिस सरीखी लाइलाज बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं, युसूफ बेग ने इन मजदूरों की इस बीमारी को उजागर किया. सरकारें इस बीमारी को नकारती रहीं किन्तु युसूफ बेग प्रमाण सामने लाते रहे. सरकारें और प्रशासन को उनका यह काम पसंद नहीं रहा. क्योंकि इससे उनके “विकास” में बाधा उत्पन्न होती थी. पूरे जिले में वे लगभग हर उस मजदूर तक पहुँच चुके थे, मिलते थे, उन्हें नाम से पुकारते थे, जो सिलिका के कणों को अपने सीने में जमाते जा रहे थी यानी सिलिकोसिस से ग्रस्त होते जा रहे थे. आज दुनिया को पता चल रहा है कि जब फेफेड़ों के महीन पर्दों में किसी कण के फँस जाने से क्या महसूस होता है? सांस रुकने का मतलब क्या होता है? खून में आक्सीजन का स्तर घटने से क्या होता है? लेकिन मिर्ज़ा युसूफ बेग इसे २५ सालों से जानते थे. पता नहीं उस आदमी में क्या बात थी कि वह जरूरतमंद मजदूर तक पहुँच ही जाता था. युसूफ बेग जिसने ३० साल समाज के लिए काम किया और कोई संपत्ति नहीं जुटाई पर समीना भाभी, फैज़ल और आफरीन को शायद अभी यह अंदाजा भी नहीं होगा कि यूसुफ़ भाई का परिवार कितना बड़ा है!
पिछले दस सालों से हम उनके साथ कुपोषण और खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर काम कर रहे थे. “थे” कहूँ या “हैं” कहूँ, पता नहीं! वो अच्छे से जानते थे कि मजदूरों की मूल समस्या तो भुखमरी ही है और शोषण उसका मुख्य कारण है. गाँव-गाँव जाकर बच्चों में कुपोषण की पहचान करना, गंभीर कुपोषित बच्चों को अपनी गोद में उठा लेना और मन ही मन उनके जीवन को बचा लेने का संकल्प कर लेना, यही युसूफ भाई की जिन्दगी का मूल मन्त्र था. वे इस मन्त्र को हमेशा जपते रहते थे. एक तरफ वे मानवीय नीतियों के लिए संघर्ष कर रहे थे, वहीँ दूसरी तरफ कृषि, पानी, जंगल और पर्यावरण के रचनात्मक काम भी कर रहे थे. युसूफ भाई जानते थे कि वन्य प्राणी अभ्यारण्य के विस्तार के नाम पर आदिवासियों के साथ धोखा हो रहा है, वही थे, जिन्होंने इस धोखे को उजागर किया था और लगातार लोगों के साथ खड़े हो रहे थे.
समाज और समाज में भी सबसे वंचित व्यक्ति के पास जाना और उसके पास बैठ जाना, उससे बातें करने लगना, उससे रिश्ता बना लेना और उसके दुःख को दूर करने के लक्ष्य को अपने साथ जोड़ लेना. बस यही थे युसूफ भाई.
१४ अप्रैल को उनका फोन आया कि सर, तीन दिन से तबियत ठीक नहीं लगा रही है. मैनें तत्काल जांच करवाने और जांच के हिसाब से उपचार की बात कही. उन्होंने जो बातें कहीं, वह पूरे प्रदेश का मौजूदा हाल है. उन्होंने कहा था कि यहाँ के अस्पताल में सैंकड़ों लोग खड़े होते हैं. जांच की कोई सुचारू व्यवस्था की नहीं है. वहां जाने में ही डर लग रहा है.
वे कोविड की मौजूदगी को नकारना चाह रहे थे. उन्होंने कहा कि मुझे पता है, यहाँ तो इलाज़ होगा नहीं. मुझे सागर रेफर किया जाएगा और हम देख रहे हैं कि जो भी सागर जा रहा है, वहां से लौट कर नहीं आ रहा है.
लकिन जब स्थिति बिगड़ी तो उन्हें पन्ना के कोविड सेंटर में जाना पडा. तब उनका आक्सीजन स्तर ६७% था. जहाँ वे २० घंटे रहे और इन २० घंटों में उन्हें किसी डाक्टर ने नहीं देखा. सबकुछ नर्सिंग स्टाफ के भरोसे चल रहा था.
१५ अप्रैल को उनके खांसी बहुत बढ़ गयी थी. यूँ कहें कि अब सांस उखड़ने लगी थी. उन्हें १६ अप्रैल को सागर रेफर किये जाने की बात होने लगे, लेकिन वे सागर जाने को तैयार नहीं थे. हम सब दोस्त पता कर रहे थे कि उन्हें कहाँ आईसीयू बिस्तर मिल सकता है. सागर, सतना, जबलपुर सब जगह से यही कहा गया कि यहाँ मत भेजिए, कोई जगह और व्यवस्था नहीं है. अजीब से हालात थे. ऐसा लग रहा था कि हमारे बस में कुछ भी नहीं है. तब तय हुआ कि सतना ले जाया जाए. वहां कुछ व्यवस्था करेंगे. चार अस्पताल घूमने के बाद आखिर में श्रीजी कान्हा अस्पताल पहुंचे. जहाँ उनका आक्सीजन स्तर मापा गया – यह आया ४० प्रतिशत.
कोविड ने हम सबके आक्सीजन का मतलब समझा दिया है और यह भी सिखा दिया है कि इसका स्तर कम से कम कितना होना चाहिए? ज़रा सोचिये कि ४०% आक्सीजन स्तर के साथ उनका जीवन कैसे चल रहा था?
अस्पताल ने सहयोग किया, जिम्मेदारी दिखाई और इंसानियत भी. उन्हें भर्ती किया गया. इस बार युसूफ भाई ने हम सबके लिए चुनौती खड़ी कर दी; वे वेंटिलेटर पर जाने के लिए तैयार नहीं हुए. मैनें उन्हें फोन पर लगभग डांटा भी, लेकिन उनके मन में एक और बात जमी थी कि जो वेंटिलेटर पर जाता है, वह जीवित नहीं बचता है. उन्होंने थोड़ी देर वेंटिलेटर का सहारा लिया फिर उसे हटवा दिया. संदीप भाई और आरती लगातार संवाद में थे.
रेम्डेसीविर इंजेक्शन की जरूरत सामने आई. भोपाल से लेकर सतना में जितने भी प्रभावशाली मित्र थे, उनसे मदद मांगी और इसे भी हासिल कर लिया. इंजेक्शन लग भी गया.
उनका आक्सीजन स्तर एक समय पर ७०% से ऊपर चला गया था और उम्मीद पनपने लगी थी कि अब स्थिति सुधर जायेगी.
हर घंटे और कभी कभी घंटे भर में २-३ बार हम लोग सतना में वसीम, फैज़ल, आफरीन और भाभी से बात कर रहे थे. उनकी स्थिति कोई महसूस नहीं कर सकता. उस पक्त समझ आया कि जब शहर में सबकुछ लाकडाउन हो जाता है, तब बातचीत करना कितना जरूरी है. बातचीत कितनी ताकत देती है. इसी दौरान खबर मिली कि समीना भाभी की अम्मी, जिन्हें कोविड के कारण सागर भेजा गया था, उनकी मृत्यु हो गयी. उन्हें पन्ना जाना पडा.
१७ अप्रैल को रात सवा बारह बजे तक हम सतना बात करते रहे. हर बार मैं पहले फोन कर लेना चाहता था, क्योंकि जब वहां से फोन आता तब मैं घबरा जाता था.
इस दौरान हमने अपने परिवार में भी बहुत दुआएं कीं. ऐसे वक्त के लिए जो मन्त्र बताये गए थे, वो भी जपे. इसी रात ३.२८ बजे फोन की घंटी बजी. वह वसीम का फोन था. उसने बस एक वाक्य कहा कि सर, युसूफ बेग नहीं रहे. बहुत कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुई. कुछ मित्रों को वाह्ट्स एप पर सूचना दी बस.
इसके बाद आँखों को सुबह सच का अहसास हुआ. मैं मानना ही नहीं चाहता था कि युसूफ भाई नहीं रहे. जब सुबह अपना व्हाट्सएप खोला और बहुत सारे सन्देश पढ़े, तब आँखों ने बाँध खोल दिए.
अब तक बच्चों और भाभी से बात करने की हिम्मत नहीं हुई है. किसी से बात करने की हिम्मत नहीं हुई.
यह सोच-सोच कर दिल घबरा रहा था कि प्यार करने वाले युसूफ भाई चले गए.
प्रेम को अभिव्यक्त कैसे किया जाता है, यह मैनें उनसे ही सीखा. जब भी मैं पन्ना गया, तब वे मुझे लेने सतना या खजुराहो स्टेशन तक आये और छोड़ने भी. बहुत मना करने की बावजूद. होटल में रुकने के बाद भी नाश्ता वे घर से ही लाये. अपने दफ्तर में हमेशा अपनी कुर्सी पर बिठाया. मना करने के बावजूद.
पिछले ५-६ सालों ने हम पोषण के मुद्दे पर एक प्रोजेक्ट में साथ काम कर रहे थे, जिस शिद्दत के साथ उन्होंने अपनी भूमिका निभाई, उसे मैं भूल नहीं सकता हूँ.
युसूफ भाई केवल मेरे साथ ही ऐसे नहीं थे. उनका परिवार बहुत विस्तार लिए हुए है. हो सकता है कि हमें सामाजिक रिश्ता न मिला हो, किन्तु हमने मानवीय रिश्ता बनाया है.
इस घटना ने तोड़ दिया है. इसलिए तोड़ दिया है क्योंकि युसूफ भाई के बिना मुझे अपने आप में कुछ बहुत अधूरा सा लग रहा है. मैं सोच कर भी डर जा रहा हूँ कि अब युसूफ भाई से बात नहीं होगी. अब हँसते रहने वाला एक प्रतिबद्ध और ईमानदार भाई पन्ना जाने पर नहीं मिलेगा. हर दिन मुझे एक नया काम सौपने वाला साथी नहीं मिलेगा.
वह आदमी कैसा होता होगा, जिसमें प्रतिस्पर्धा का भाव न हो, लोभ और परिग्रह न हो, टकराव का भाव न हो। वह यूसुफ बेग बन जाता है।
यूसुफ भाई के बारे में कोई यह नहीं कह सकता है कि हर एक आदमी में होते हैं, कई आदमी। यूसुफ भाई में केवल एक ही आदमी था।
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हम भले ही दुखी हों, किन्तु युसूफ भाई जरूर सुकून में होंगे. उन्होंने हमेशा प्यार और उम्मीद ही तो बांटी है, किसी से छीनी नहीं. हम ज्यादा दुखी हैं, क्योंकि हमारा तो खजाना चला गया.
आज की स्थिति को देखते हुए बस यह कहना चाहूंगा कि जितने भी रिश्ते उगाये-बनाए हैं, उनसे बातचीत कर लीजिये तत्काल. मुझे लगता है कि मुझसे भी कई दोस्त/साथी नाराज़ होंगे, शायद मेरे कहे-सुने के कारण, मैं बस यही कहना चाहता हूँ कि मैं आपसे कुछ कहा पाया क्योंकि मैं आपसे प्रेम करता हूँ. आपको खोना नहीं चाहता हूँ. मैं आपसे अपने सपने-अपना लक्ष्य साझा करता हूँ. मैं यह निष्कर्ष नहीं निकलना चाहता को दोस्ती या रिश्तों में प्रेम नहीं रखना चाहिए क्योंकि जब रिश्ता टूटता है या युसूफ भाई चले जाते हैं, तब मैं भी दरक जाता हूँ. मैं उस टूटे हुए हिस्से को फिर से प्रेम से ही जोड़ना चाहूंगा. मैं दुश्मनी कर पाने में नाकाम व्यक्ति हूँ. मैं दुश्मनी को खारिज करता हूँ. अपने भीतर बस उन टुकड़ों को समेटे रखता हूँ, जो दोस्तों के जाने के कारण से इकठ्ठा हो गए हैं. पर कोई सद्भावना के साथ. सबसे यही कहना कहता हूँ कि एक बार यह जांच लेना कि आँखों से आंसू बह रहे हैं या नहीं? दिन में कितनी बार बह रहे हैं? यदि बह रहे हैं, बार-बार बह रहे हैं, तो यह प्रमाण है कि आप ज़िंदा हैं. वरना नहीं! यह वक्त झंझावात से भरा हुआ है. बेतरतीब हवाएं चल रही हैं. इससे पहले कि ये हवाएं मेरी तरफ मुड़ें, यह बयान दे देना चाहता हूँ.
यह ऐसा वक्त है, जब उन लोगों की तरफ देखना चाहिए, जो निजी रिश्ते या परिवार के न हों. जिन्हें हम जानते न हों, उनके साथ जुड़ना चाहिए. ऐसा करेंगे, तब कोविड१९ के प्रभावित या इससे मृत्यु को प्राप्त होने वाले लोग हमारे लिए केवल संख्या नहीं रह जायेंगे.
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