नकारात्मक वृदिध दर और वैश्विक महामारी के परिदृश्य में इस बजट पर अच्छे होने का भारी दबाव था। जाहिर तौर पर स्वास्थ्य के मोर्चे पर एक बड़ा खर्च होना था और अर्थव्यवस्था को मजबूती का टॉनिक भी पिलाया जाना था, लेकिन इसमें यह भी देखना था कि बाकी दूसरे संकट जिनमें देश पिछले लंबे समय से लड़ रहा है, उनमें भी भारी कटौती न हो। तमाम लोग बजट का अपने—अपने नजरिए से विश्लेषण करते हैं, इनमें एक नजरिया यह भी है कि बच्चों के लिए बजट में क्या किया गया है। चूंकि बच्चे भी इस महामारी से उतने ही प्रभावित रहे हैं, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और अधिकारों पर भी वैश्विक महामारी और उसके साथ उपजे दुष्प्रभावों का गहरा असर हुआ है, इसलिए यह जरूरी था कि बच्चों के लिए भी कुछ बेहतर सोचा, समझा और किया जाता। दुर्भाग्य से इस बजट में वैसी कोई बात दिखाई नहीं पड़ती। पिछले साल की तुलना में इस साल बच्चों के बजट में भी भारी कटौती की गई है।
हक:सेंटर फॉर चाइल्ड राइटस ने बच्चों के बजट का एक त्वरित विश्लेषण किया है।
इसके मुताबिक पिछले वित्तीय वर्ष में देश के कुल बजट का 3.16 प्रतिशत हिस्सा बच्चों के लिए आवंटित किया गया था, जो कि इस साल घटकर 2.46 प्रतिशत तक आ गया है। देश के तकरीबन 52 करोड़ बच्चों के हिस्से में देश कोविड महामारी
जैसी परिस्थितियों के बावजूद मात्र ढाई
प्रतिशत भी खर्च नहीं कर रहा है। यह पिछले दस वित्तीय वर्षों में अब तक का सबसे कम
वित्तीय आवंटन है।
सोचिए हम आने वाली पीढ़ी पर अपना कितना और कैसा निवेश कर रहे हैं, जबकि हमारे यहां बाल अधिकारों के मानक अब भी
संतोषजनक नहीं हैं। हाल ही में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 5 में जिन 22 राज्यों के स्वास्थ्य मानक सामने आए हैं, वे चिंताजनक हैं। उनमें सुधार की गति मंद है,
कुपोषण, एनीमिया जैसी चुनौतियां सामने खड़ी हैं। बच्चों के साथ
अपराधों के मामलों में भी स्थिति गंभीर है। वर्ष 2019 में बच्चों के खिलाफ 1,48,185 अपराध दर्ज किए गए, जोकि पिछले साल की तुलना में 4.5 प्रतिशत अधिक हैं। 32235 मामलों में बच्चे
विधि विरुदध कार्यो में लिप्त पाए गए। 47,335 मामले यौन हिंसा से संबंधित दर्ज किए गए, यह भी पिछल साल की तुलना में 18.85 प्रतिशत अधिक है। बच्चों को प्रोटेक्शन देना
सरकार की बड़ी जिम्मेदारी है, देश में इस वक्त
तकरीबन 3 लाख 70 हजार से ज्यादा बच्चे हैं, जो देखरेख और संरक्षण से संबंधित संस्थाओं के
अंदर हैं। दूसरी तरफ तमाम खबरें देश भर से सामने आ रही हैं, जहां पर कि संरक्षण गृहों में ही बच्चे सुरक्षित नहीं हैं,
ऐसे में उनकी सुरक्षा और संरक्षा पर भी सरकार
को खर्च करना ही होगा, तभी वह सुरक्षित
हो सकते हैं।
लॉकडाउन और उसके बाद से लगातार बीमारी के भय से घरों में सिमटे बच्चे एक समग्र
विमर्श की मांग कर रहे हैं, ताकि उनके संकट तेजी से दूर हो सकें।
अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार समझौते का एक हस्ताक्षरकर्ता होने के नाते देश की यह एक
नैतिक जिम्मेदारी भी है कि वह किसी भी हाल में बच्चों के अधिकारों को अनदेखा नहीं
करेगा। इस साल का बजट बच्चों के लिए भारी निराशा वाला वाला है। हक की रिपोर्ट के
अनुसार यदि बच्चों के लिए बजट के प्रावधानों के अंदर की हिस्सेदारी को देखा जाए तो
स्वास्थ्य पर 0.11 प्रतिशत, विकास पर 0.57 प्रतिशत, प्रोटेक्शन पर 0.03 प्रतिशत और
शिक्षा पर 1.74 प्रतिशत हिस्सा खर्च हो जा रहा है। इसको अंदर
से देखने पर पता चलता है कि एक बड़ा हिस्सा तो शिक्षा पर ही खर्च हो रहा है, जबकि बाकी तीन अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। देश में नयी शिक्षा नीति के
लागू होने के बावजूद शिक्षा पर भी पिछले साल की अपेक्षा 0.44 प्रतिशत की कटौती की गई है। बच्चों के संरक्षण से संंबंधित योजनाओं का आवंटन
पिछले साल की तुलना में आधा कर दिया गया है।
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