· चिन्मय मिश्र
“जब
कोई मरता है,
अपने
कृतज्ञ देश की बाहों में
संताप
समाप्त होता है, जेलों के बंधन चकनाचूर हो जाते हैं
अंततः मृत्यु से प्रारंभ होता है जीवन.
- फिदेल कास्त्रो
दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर पिछले करीब 2 महीनों से किसान बैठे हैं.
वे तीन कृषि कानूनों की मुखालफत करते
हुए उन्हें वापस लिए जाने की बात पर अड़े हैं. इसी दौरान 26 जनवरी को आयोजित ट्रैक्टर रैली के
दौरान हुई हिंसा की वजह से आंदोलन के स्वरूप व नीयत पर सवालिया निशान लगाया जा रहा
है. जाहिर है
सवाल तो उठेंगे ही. उनमें से कुछ वाजिब होंगे और कुछ गैर
वाजिब.
आरोप-प्रत्यारोप में यह होगा कि एक पक्ष आंदोलन के दौरान हुई हिंसा की आड़ लेकर
कृषि कानूनों के सत्यापन का प्रयास भी करेगा और आंदोलन के उस दिन अधिकांशत: शांत
रहने की बात को नजरअंदाज करेगा . यह बात मीडिया के अधिकांश वर्ग पर भी
लागू होती है. परंतु हमें यह याद रखना होगा कि वास्तविक व उद्देश्यपूर्ण आंदोलनों
की कभी हार नहीं होती. वे एक महायुद्ध लड़ रहे होते हैं, जिसमें कई बार विजेता छोटी लड़ाई
हार भी जाते हैं. आंदोलन ठिठक कर रुकते जरूर हैं, कई बार वे अपने को वापस भी ले लेते
हैं, परंतु अंततः वे एक शाश्वत इकाई की तरह समाज व आंदोलनकारियों के अवचेतन में
प्रतिष्ठित हो जाते हैं और किसी एक दिन पुनः अवतरित भी हो जाते हैं.
परंतु इसके बाद 20 वर्षों तक भारत की जनता के साथ लगातार संवाद करने के बाद 8 अगस्त 1942 को ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन की घोषणा हुई. 9 अगस्त से यह सारे भारत में शुरू हो गया था. परंतु अंग्रेजों ने 8 अगस्त 1942 की रात को ही सभी प्रमुख नेताओं व कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया था. गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया और सभी को स्वयं का सेनापति बनने की सलाह भी दी. बहरहाल यह आंदोलन करीब दो साल चला. इसमें कुल 940 लोग मारे गए. 1630 घायल हुए 18000 से ज्यादा नजरबंद हुए और और 60229 लोग गिरफ्तार हुए. तत्कालीन सरकारी आंकड़े बताते हैं इस दौरान 208 पुलिस थाने, 1275 सरकारी कार्यालय 382 रेलवे स्टेशन और 945 डाकघरों को जनता ने नष्ट किया था. सच-झूठ अपनी जगह है परंतु आंदोलन दबा नहीं. इन आंकड़ों को सामने लाने का अर्थ यह है कि एक अहिंसक आंदोलन को नेतृत्वविहीन करना हमेशा खतरनाक ही सिद्ध होता है.
गौरतलब है, 8 अगस्त को कांग्रेस अधिवेशन में प्रस्ताव पारित होने के बाद गांधी जी ने कहा था, ‘वास्तविक संघर्ष तुरंत ही प्रारंभ नहीं हो जाता आप लोगों ने कुछ अधिकार मुझे सौंपे हैं. मेरा पहला काम होगा वायसराय से मुलाकात करना और उनसे प्रार्थना करना कि कांग्रेस की मांग स्वीकार की जाए.’ परंतु वास्तव में जो हुआ वह पहले ही लिखा जा चुका है. 26 जनवरी 2021 की घटना के बाद यह आवश्यक हो जाता है कि हम महात्मा गांधी और तत्कालीन वायसराय के लिनलिथगो के संवादों पर गौर करें. ज्ञातव्य है महात्मा गांधी उस दौरान कारागार में थे. उन्होंने 31 दिसंबर 1942 को वायसराय लिखा था यह बिलकुल व्यक्तिगत पत्र है. मेरा ख्याल है हम आपस में मित्र हैं. मगर 9 अगस्त की घटनाओं से मुझे शंका हो गई है कि आप मुझे मित्र समझते हैं या नहीं. कड़ी कार्यवाही करने के पहले आपने मुझे बुलाया क्यों नहीं ? इसी पत्र में वे उपवास का अपना निश्चय भी बताते हैं. वायसराय अपने उत्तर में लिखते हैं
‘मुझे दुख है कि इस हिंसा और अपराध के लिए एक शब्द भी नहीं लिखा.’ गांधीजी जवाब देते हैं ‘9 अगस्त की घटनाओं के लिए मुझे खेद है है किंतु क्या इसके लिए भारत सरकार को दोषी ठहराया है ? इसके अलावा जिन घटनाओं पर न तो मेरा प्रभाव है और न ही काबू तथा जिनके बारे में मुझे केवल एकतरफा बयान मिला है, उन पर मैं कोई मत प्रकट नहीं कर सकता.
इस पर लिनलिथगो ने जवाब में कहा कि
‘ मेरे पास इसके सिवा और कोई विकल्प नहीं है’ और लूटमार के आंदोलन के लिए कांग्रेस और उसके अधिकृत प्रवक्ता आपको जिम्मेदार मानव
इसके जवाब में गांधी जी ने लिखा
‘सरकार ने ही जनता को उघाड़कर पागलपन की सीमा तक पहुंचा दिया है मैंने जीवन भर अहिंसा के लिए प्रयत्न किया है फिर भी आप मुझ पर हिंसा का आरोप लगाते हैं, इसलिए मेरे दर्द को जब तक मरहम नहीं मिलती मैं सत्याग्रही के नियम का पालन करूंगा अर्थात शक्ति के अनुरूप उपवास करूंगा या 9 फरवरी को शुरू होगा और 21 दिन बाद समाप्त होगा’.
इसके बाद भी दोनों के बीच विस्तृत संवाद हुआ था. इन संवादों की तारीख हटा दीजिए और मनन कीजिए क्या आज स्थितियों में ज्यादा परिवर्तन आया है ? हमें याद रखना होगा कि आंदोलन की कोई समयकाल सीमा नहीं होती. दलितों की अस्मिता का आंदोलन सहस्त्राब्दियों से अनवरत चल रहा है. इसमें अपनी उम्मीद जागी है.
आदिवासियों के आंदोलन भी शताब्दियों से चल रहे हैं, परंतु उम्मीद आज भी धूमिल है. नर्मदा बचाओ आंदोलन जैसे आंदोलन चार दशक के बाद अब जीत से ज्यादा स्वाभिमान की प्राप्ति के लिए संघर्षरत हैं. सारे राजनैतिक दल जो आज सत्ता में हैं और जो कल आ सकते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि आंदोलन न तो हारते हैं और न मरते हैं. सिर्फ उनकी जीत स्थगित रहती है. वस्तुतः वे अजर अमर रहते हैं. भारत के किसानों का आंदोलन भी ऐसा ही है. शाश्वतता के साथ वह आज नहीं तो कल अपना लक्ष्य प्राप्त कर ही लेगा. यह आन्दोलन आज अपनी विजय या जीत से ज्यादा की आकांशा लिए हुए है, जो अवश्य पूरी होगी. आंदोलन में गांधी की उपस्थिति इतनी व्यापक है कि वह अनुपस्थित सी हो गयी है. वह एक सुवास सी है जो दिखाई तो नहीं देती पर महसूस हमेशा होती है. अंत में गाँधी से अलग राह पकड़ उसी गंतव्य पर पहुँचने वाले कास्त्रो की ही कुछ पंक्तियाँ
‘ए
मृत शरीरों/ कल तक तुम अपनी मातृभूमि की आशा थे / अपनी हड्डियों की आग से मेरे
माथे पर तिलक लगा दो/ और मेरे हृदय को अपने ठन्डे हाथों से स्पर्श करो/ मेरे कानों
के पास आकर चीत्कार करो/ मेरी एक-एक आह/ एक और जालिम के कानों के परदे को फाड़
देगी/ मेरे आसपास जमा हो जाओ ताकि/ मैं
तुम्हारी आत्मा को आत्मसात कर सकूँ/ तुम
कब्रिस्तान की वीभत्सता मुझे दे डालो/ क्योंकि गुलामी में जीवन बिताने वाले को/
आंसू कभी भी पर्याप्त नहीं होते.’
इसीलिए आंदोलनों का सर्वाधिक प्रिय नारा है ‘लड़ेंगे जीतेंगे’ .
चिन्मय
मिश्र
9893278855
chinmay.saroj@gmail.com
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