टिकर

5/recent/ticker-posts

Real Story : कैसे मौत के मुंह से बच्चे को निकाल लाया आनंद गोंड

 मेरा नाम आनंद कुमार गोंड है। मैं पन्ना जिले के विक्रमपुर पंचायत के ददोलपुरा गांव में रहता हूं। अभी मैंने बारहवी कक्षा की परीक्षा दी है। पढ़ाई के साथसाथ मैं एक ई वालंटियर के रूप में अपने आसपास की समस्याओं को हल करने की और लोगों को जागरुक करने की कोशिश करता हूं। मैं आपको पिछले दिनों मेरे परिवार में घटित हुई एक घटना के बारे में बताने जा रहा हूं। इससे आपको पता चलेगा कि हम दूर के पिछड़े हुए इलाकों में रहने वाले लोग कैसे अपने जीवन और मृत्यु का संघर्ष करते हैं।

मेरा घर एक आदिवासी टोले में है जहां कि 24 में से 21 घर आदिवासी परिवारों के हैं। यहां मैं अपने परिवार के साथ रहता हूं। मेरे भाई के यहां 15 अगस्त 2020 को एक लड़की का जन्म हुआ। कुछ समय बच्चा ठीक रही, लेकिन बच्चे का पेट फूल रहा था। इस बात पर जब गौर किया तो देखा कि बच्चे की शौच का रास्ता बंद है, इस वजह से वह शौच क्रिया नहीं कर पा रहा है।

जब मुझे इस बात का पता चला तो मैंने 108 नंबर पर कॉल करके एम्बुलेंस को फोन लगा दिया। उसी एम्बुलेंस से हम जिला अस्पताल पन्ना गए। वहां पर चेकअप पर पता चला कि इसका यहां पर इलाज संभव नहीं है। इसके लिए बच्चे को मेडिकल कॉलेज जबलपुर जाना होगा। वहा उसका ऑपरेशन किया जाएगा। यह सब सुनकर मेरे घरवाले हिम्मत हार चुके थे। उन्होंने सोच लिया था कि बच्चे का मरना तय है। घर-परिवार वालों ने बहुत रोकने की कोशिश की। यहां तक कि यह भी कहने लगे,बच्चे को नहीं बचना है, तू क्यों ये कर रहा है, शहर में जाना खतरे से खाली नहीं है।

एक वजह यह भी थी कि भैया (अजय आदिवासी) के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे कि वह शहर जाकर इलाज करा लेते। लेकिन मैंने कहा तुमको टेंशन लेने की जरुरत नहीं है, मैं साथ चलूंगा। बस एक उम्मीद में कि शायद जिंदगी बच जाए। बच्चा को पन्ना जिला अस्पताल से जबलपुर मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया।

अब शहर जाने की चुनौती थी। मैंने दोबारा एम्बुलेंस के लिए फोन लगाया। एंबुलेंस के वाहन चालक ने इसके लिए पैसे मांगे क्योंकि जबलपुर दूर था। मैंने कहा भैया एंबुलेंस तो निशुल्क है, हम पैसे नहीं देंगे,तो मैनेजर ने आकर कहा खर्चा पानी दे देना, फिर वह बहुत तेज आवाज मे बोलने लगा कि खर्चा -पानी तो लगता है। ड्राइवर से पूछा कि कितना पैसा लगेगा उसके कहा पांच सौ रुपए। इसके बाद मैंने बेझिझक 108 हेल्पलाइन पर कॉल कर दिया,तो वहां से जवाब मिला कि निशुल्क सेवा है। मैंने रुपए नहीं दिए।

 हम बच्चे को लेकर निकल तो गए, उधर मेरे गांव से परिजनों के फोन आने शुरू हो गए। वो मेरे ऊपर गुस्सा कर रहे थे कि अपनी मर्जी चलाता है, किसी की सुनता नहीं।

मेडिकल कॉलेज मे पहुंच कर रेफर किए गए कागज को दिखाना और और जल्द से जल्द बच्चे को एडमिट करा के इलाज शुरु करवाना। बच्चे का सोनोग्राफी करवाना। अगले दिन पता चला कि बच्चे की बच्चे की मां की समग्र आइडी की जरुरत है, हमारे पास केवल आधार कार्ड था।

मैंने अपने मोबाइल से समग्र पोर्टल वेबसाइट से ही समग्र आईडी खोजना शुरू कर दिया,और आधार कार्ड के द्वारा समग्र आइडी डाउनलोड की और दुकान मे जाकर प्रिंट निकलवा लिया। इससे अस्पताल से आयुष्मान कार्ड बन गया एवं फ्री इलाज के लिए पात्रता मिल गई। यह सब इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि मैं पिछले तीन सालों से विकास संवाद और पृथ्वी ट्रस्ट की ओर से चलाई जा रही डिजिटल डेमोक्रेसी परियोजना का हिस्सा रहा हूं।

इस प्रोजेक्ट में ई दस्तक केन्द्र के माध्यम से मुझे सिखाया गया कि अपने मोबाइल फोन से ही हम सरकार सुविधाओं और योजनाओं का कैसे लाभ उठा सकते हैं। सोशल मीडिया का कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की कैसे मदद ले सकते हैं। यह सब सीख आज मेरे व्यक्तिगत जीवन में काम आ रही थी। 

बच्चे का दिनांक 18 अगस्त को आपरेशन हो गया। यह आपरेशन सफल हुआ। बच्चा की जिंदगी बच गई। दिनांक 20 अगस्त को हमें जबलपुर मेडिकल कॉलेज से छुटटी दे दी गई।

अब सवाल था कि घर वापस कैसे जाएं। घर तक जाने के लिए पैसे नहीं थे। प्राइवेट एंबुलेंस का किराया 5500 से लेकर 6500 माँगा जा रहा था। इसके बाद एक बार फिर मैंने 108 हेल्पलाइन पर कॉल करके पूछा तो पता चला कि ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।

इस बात पर मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है। व्यवस्था तो होनी चाहिए, तो मैंने पृथ्वी ट्रस्ट पन्ना के कार्यकर्ता से बात की।

उन्होंने कहा आप राकेशजी से बात कर लो। शायद वह मदद कर दे। राकेश कुमार मालवीय भोपाल में विकास संवाद से जुड़े हैं और वह वरिष्ठ पत्रकार भी हैं। मैंने बात की तो उन्होंने मेरी कहानी मांगी जिस आधार पर मदद मिल सकती है। चूंकि मेरा लिखने का थोड़ा अभ्यास है तो मैंने अपनी पूरी व्यथा लिखकर भेज दी।

मुझे 2 ढाई घंटे के बाद कॉल आया कि आपके लिए जबलपुर से पन्ना जाने के लिए गाड़ी का बंदोबस्त कर दिया है,आप कोई पैसे नही देना,और आराम से जाना। तो मुझे 108 हेल्पलाइन नम्बर से कॉल आया और हमारे लिए एंबुलेंस हो गई।

मेरे फोन पर एक मैसेज भी आया, जिसमें लिखा था -

महोदय/महोदया आपके द्वारा दी गयी जानकारी अनुसार 108 एम्बुलेंस Id - 3MA31710000320080121, वाहन क्रमांक MP20BA7279, JSSK- MEDICAL COLLEGE JABALPUR-1, JABALPUR,MDC  TO   PANNA  200KM     भेज दी गयी है। वाहन चालक /सहायक का मोबाइल नम्बर 7909335849 है। उक्त सेवा नि:शुल्क है। डाक्टरी सलाह , काउंसलिंग , शिकायत अन्य जानकारी के लिए डायल करे 104। सेवा का लाभ उठाने के लिए धन्यवाद।

राकेश जी से बात हुई तो उन्होंने बताया कि एक दूसरे पत्रकार साथी सिदार्थ यादव ने यह मदद करवाई है। सिदार्थ यादव ने हमारे गांव पर कुछ दिन पहले एक खबर की थी, जिसके लिए मेरी उनसे बात भी हुई थी। उनको शुक्रिया उन्होंने कठिन वक्त में मेरी मदद की।

डिजिटल डेमोक्रेसी प्रोजेक्ट से जुड़ने से यह फायदा हुआ कि मैं जागरुक नागरिक महसूस करने लगा हूं। किसी भी हेल्पलाइन नम्बरों का प्रयोग बिना झिझक करने लगा हूं। सरकारी वेबसाइटों का प्रयोग कर रहा हूं, जैसे समग्र आइडी देखना,मैप के जरिये जगहों का पता लगाना,जैसे अस्पताल कितनी दूर है,समस्याओं की पहचान करना और निराकरण करने का प्रयास करना, समस्याओं को डिजिटल के माध्यम से अन्य अधिकारियो,मुख्यमंत्री तक पहुंचाना आदि।

मुझे यह भी समझ आया कि सरकार की योजनाएं तो अच्छी हैं, लेकिन इनका लाभ लेने में हम पिछड़ जाते हैं क्योंकि सही जानकारी नहीं मिलती। अब हमारे हाथ में मोबाइल भी है और इंटरनेट भी, हमें जानकारी प्राप्त करके इनका लाभ उठाना चाहिए।

भले ही डिजिटल डेमोक्रेसी प्रोजेक्ट बंद हो गया, लेकिन मेरी सफलता की असली कहानी तो प्रोजेक्ट बंद होने के बाद ही बनी। आज मेरी भतीजी स्वस्थ्य है, इस वजह से मैं उसकी जान बचाने में सफल रहा। मेरे घरवाले भी आज खुश हैं।

स्वतंत्रता दिवस के दिन पैदा होने और संघर्ष से जिंदगी पाने के कारण हमने बच्चे का नाम आजाद सिंह गोंड रखा है।

- आनंद कुमार गोंड,  वालंटियर, ग्राम ददोलपुरा, पंचायत विक्रमपुर, जिला पन्ना मप्र,                                 Contact 9752960613

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ