पंद्रह जून के बाद देश में यदि कुछ चर्चा में रहा है तो वह है बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत. सुशांत सिंह राजपूत की मौत ‘आत्महत्या’ थी या हत्या, यह रहस्य अभी सुलझा नहीं है! लोगों की राय बंटी हुई है और सीबीआई इस मसले की जांच कर रही है. तमाम दावों के बीच एक बात स्थापित होती नजर आई है कि सुशांत सिंह राजपूत डिप्रेशन की दवाइयां ले रहे थे और हो सकता है कि उन्होंने इसी वजह से खुदकुशी कर ली हो. हालांकि, टीवी से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा इस बात की नहीं है कि देश में आत्महत्या एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है और उसकी रोकथाम के लिए उपाय करने चाहिए. चर्चा तो इसलिए है क्योंकि उसके सिरे मीडिया को टीआरपी देने वाले हैं, राजनीति को मुद्दे देने वाले हैं, निजी जीवन के निंदारस के नए किस्से गढ़ने वाले हैं. इस पूरे मामले में एक धड़ा सुशांत के पक्ष में खड़ा है, दूसरे पक्ष की रिया चक्रवर्ती के साथ हो रहे व्यवहार के प्रति संवेदना है, लेकिन कोई आत्महत्या के खिलाफ बात करता दिखाई नहीं देता है.
देश में रोज ही आत्महत्याएं होती हैं. 2019 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर चौथे मिनट में एक आत्महत्या होती है. वर्ष 2001 से 2015 के बीच भारत में कुल 1841062 लोगों ने खुदकुशी कर ली. इनमें कृषि क्षेत्र में आत्महत्याएं 234657 दर्ज हैं. 384768 मामलों में लोगों ने अपने स्वास्थ्य से परेशान होकर मौत को गले लगाया. स्टूडेंट्स के लिए भी यह वक्त चुनौतियों से भरा रहा. परीक्षा में नाकाम होने से 34525 आत्महत्याएं हुईं. परीक्षा के अलावा अन्य कारणों से 99591 विद्यार्थियों ने खुदकुशी कर ली. गरीबी और बेरोजगारी भी आत्महत्याओं की एक बड़ी वजह है. जब इन दोनों मोर्चों पर व्यक्ति खुद को लाचार पाता है तो खुद को खत्म करने के अलावा उसके पास और कोई विकल्प नजर नहीं आता है. इन पंद्रह सालों में 72333 लोग ऐसे थे जिन्होंने इन दो वजहों से आत्महत्या जैसे कदम उठा लिए.क्या आत्महत्याएं केवल भारत की समस्या हैं? नहीं. यदि दुनिया के स्तर पर देखें तो हर चालीसवें सेकंड पर कोई न कोई व्यक्ति दुनिया के किसी कोने में खुद को खत्म कर रहा होता है. हर साल यह संख्या तकरीबन आठ लाख तक पहुंच जाती है. इन आत्महत्या करने वालों में भी 75 प्रतिशत मामले उन गरीब या मध्यवर्गीय आयवर्ग वाले देशों से हैं. ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि जब कोई एक व्यक्ति आत्महत्या करता है तो उससे 135 लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते हैं, ऐसे लोगों की कुल संख्या हर साल तगरीब 108 मिलियन के आसपास होती है. यह तथ्य बताते हैं कि आत्महत्या केवल एक व्यक्ति का निजी मसला नहीं है, इसलिए इसकी रोकथाम पर एक बड़ा काम होना चाहिए, लेकिन जिस तरह से हमारी समाज रचना हो रही है, परिवार बिखर रहे हैं, सांस्कृतिक गरीबी बढ़ती ही जा रही है, उससे लगता नहीं कि यह समस्या इतनी जल्दी दूर हो पाएगी या दूर हो पाएगी भी कि नहीं. निसंदेह किसी सांस्कृतिक सिद्धांत या ग्रन्थ में आत्महत्या को स्वीकार्य गतिविधि या कर्म नहीं माना गया है. इसके उलट आत्महत्या एक किस्म का धार्मिक और सामाजिक अपराध ही है.कानून की किताब में आत्महत्या एक अपराध है. यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या करने की कोशिश करता है, लेकिन उसकी मृत्यु नहीं हो पाती, वह बच जाता है तो उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 309 में एक साल तक की सजा दिए जाने का प्रावधान है.
पर ऐसा कम ही होता है. यह सजा आत्महत्या रोकने में कोई खास उपाय नहीं कर पाई है, यही वजह है कि पिछले दशकों में यह लगातार बढ़ती ही गई है. सच तो यह है कि आत्महत्या की वजह में व्यक्ति नहीं बल्कि वह परिस्थितियां जिम्मेदार होती हैं, जहां उसे अपने जीवन के प्रति कोई आशा नजर नहीं आती हैं! इसकी वजह यही है कि हम सफलताओं को तो सिर पर चढ़ा लेते हैं, लेकिन असफलताओं में जीवन व्यवहार का पाठ कम ही पढ़ पाते हैं. हम खुद को इतना श्रेष्ठ बना लेना चाहते हैं जहां कि हमें अपने धरातल से ही डर लगने लगता है. हम केवल जीतने की दुआ करते हैं और यह भूल जाते हैं कि जीत के लिए दूसरे लोग भी परिश्रम करते हैं, हार भी उतना ही बड़ा सच है जितना कि जीत. फिर क्यों हम अपनी क्रिकेट टीम से हर बार जीतने की उम्मीद ही लगाते हैं.टीम की जीत पर उसे सिर आंखों पर ही बैठाते हैं, लेकिन उसकी पराजय में हम उसके साथ खड़े नहीं हो सकते, जबकि उस वक्त का हमारा साथ जीत के वक्त के साथ से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है. यह जीवन व्यवहार केवल क्रिकेट पर ही लागू नहीं होता, घर में अपने बच्चों के कम नंबर लाने, किन्हीं प्रतियोगिताओं में हार जाने, नौकरी चले जाने से लेकर हमारे हर रोज की गतिविधियों में यह शामिल होकर जीवन का स्थायी भाव बन गया है.चिंताजनक स्थिति बयां करते रहे हैं, अब यह और गंभीर होने वाले हैं. इसके लिए हमें मानसिक रूप से तैयार रहना होगा.इस परिस्थिति में आत्महत्या के विरुदध एक माहौल खड़ा करना होगा और यह विश्वास दिलाना होगा कि इस महामारी को पार कर हम फिर से रोगमुक्त समाज की रचना करेंगे. इससे घबराने की बिलकुल भी जरुरत नहीं है क्योंकि हमने पहले भी कई महामारियों को हराया है.
इसी मंच पर एक खूबसूरत हिस्सा जीवन संवाद है. यह मंच आइये जीना सीखें, की टैगलाइन से जीवन के उन खूबसूरत पहलुओं पर प्रकाश डालता है. यह पूरी पहल आत्महत्या के खिलाफ खड़े होकर उसे चुनौती देने की है. इस प्रकाश में कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं है जिसे हम असंभव कह सकें. यह हमारी सामाजिक चेतना के वे भुलाए और बिसराए हुए पक्ष हैं जिन्हें जीवन की आपाधापी में हम कहीं पीछे छोड़ आए हैं. हमें आज आत्महत्या के खिलाफ रोकथाम में जीवन संवाद के जरिए हर एक मुश्किल में पड़े जीवन के साथ खड़े होने की जरूरत है.
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