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News18: विज्ञान की किताब और मक्खी के अंडों की पहचान करवाने वाले शिक्षक


शिक्षक दिवस पर ज्यादातर शिक्षकों की बात होती है, पर मैं इस मौके पर एक किताब की बात करना चाहता हूं. ऐसा इसलिए क्योंकि शिक्षक और छात्रछात्राओं के बीच की अहम कड़ी वह किताब ही होती है. पाठयपुस्तकें जितनी दिलचस्प होंगी यह रिश्ता भी उतना ही मजबूत और सुंदर बना जाएगा. हम लोगों के जेहन में बचपन की कविताएं पढ़कर चेहरों पर जो मुस्कान आती है, उसकी वजह वह किताबें, उनके शब्द, उनके चित्र ही हैं. जितनी बार वह सबक याद आते हैं, उनको समझाने वाले वे चेहरे भी सामने जाते हैं. चाहे उठो लाल अब आंखें खोलो हो, ‘चल रे मटके टम्बक टूं’,  महात्मा गांधी पर केन्द्रित वह सहायक वाचन जिसे पढ़कर पहली बार महात्मा गांधी के जीवन को करीब से जान पाए, गणित के डरावने पाठ भी। कोई कठिन विषय सरल इसलिए भी लग पड़ता, क्योंकि उसे पढ़ाने वाले शिक्षक हमें उसे सरल ढंग से समझा देते थे और कई टीचर्स का तो स्टाइल ही मारपीट से भरपूर था।  उनके डर ने पाठों को रटवा दिया.

इन सबमें हमें जो एक दिलचस्प किताब मिली वह हमारी होशंगाबाद विज्ञान की किताब थी. यह किताब मध्यप्रदेश के सोलह जिलों में कई सालों तक प्रायोगिक रूप से विज्ञान के विकल्प के रूप में पढ़ाई जाती रही. अब यह पाठयक्रम में शामिल नहीं है, लेकिन जब भी प्रायोगिक विज्ञान की या शिक्षकों की बात होती है या हम अपने आसपास के बच्चों को विभिन्न प्रयोग करते हुए, मॉडल बनाते हुए देखते हैं तो हमें अपनी वह किताब जरूर याद आती है.

आजकल ज्यादातर अभिभावकों के साथ ऐसा होता है कि उनको मॉडल बनाने के लिए सामान की लंबी सूची मिलती है, जिन्हें दुकान से लाना होता है, हमें याद नहीं कि हमें सामान लाने के लिए कभी दुकान पर जाना पड़ा हो. घर में या अपने आसपास बहुत आसानी से उपलब्ध सामान से इतने सुंदर काम हो जाया करते कि हमें अब उनपर आश्चर्य होता है. यही उस अदभुत किताब की खासियत थी, और जब ​वे शिक्षक इन प्रयोगों को करवा रहे होते या पढ़ा रहे होते तब हमें वह अपने से लगते. उसमें वैसा डर नहीं होता जैसे गणित को समझते हुए, या इतिहास को रटते हुए हुआ करता.




अपने आसपास से हमें यह कुछ यूं जोड़ती कि हम मक्खी का जीवनचक्र समझने के लिए गाय के गोबर पर मक्खी के सफेद लंबे से अंडों की पहचान करते, उसे मिटटी के दिए में भरकर रखते, उस पर एक सफेद कागज लपेटकर रख देते और हर दिन उसका अवलोकन करते हुए मक्खी का जीवनचक्र उतार देते. मेंढ़क के अंडों को खोजने के लिए आसपास की तलैयों में जाने का मौका हमें औपचारिक परमिशन के साथ मिला. वहां से मटकी में वही अंडे पानी सहित भरकर लाना और फिर उसका टेडपोल से लेकर मेंढक बनने तक के जीवन को अपनी आंखो से अवलोकन करना.

अपने आसपास के लगभग पचास से साठ तरह के पेड़पौधों की पत्तियों को पुरानी कॉपी में चिपकाकर हरबेरियम बनाना. किताब में संयोग और संभाविता समझने का एक ऐसा भी पाठ था जिसे हमारे शिक्षक क्लासरूम में नहीं बकायदा मैदान पर खिलवाते थे. यह पाठ आठवीं कक्षा में था, लेकिन जब होता तो अन्य क्लास के बच्चे भी मैदान के आसपास जमा हो जाते और उसे वक्त से पहले ही समझ भी लेते. बादल कैसे बनते हैं इसके लिए जब हमारी छोटी सी लैब का स्टोव नहीं जल पाता तो हमें घर से ही स्टोव, गंजी आदि की व्यवस्था करना पड़ता. सोचिए कि मिडिल क्लास की कक्षाओं में इन सब प्रयोगों को करते हुए उनको पढ़ाने वाले शिक्षकों के साथ हमारा कैसा रिश्ता बनता होगा ?

विज्ञान के वे शिक्षक हमें उन पाठों को रटवाते नहीं थे, करके दिखाते थे, समझाते थे, इसलिए हमें मजा भी आता था. किताब में लिखा भी होता था मैंने सुना- भूल गया, मैंने देखा-याद रहा, मैंने करके देखा- समझ गया. उन पाठों के माध्यम से हम अपने आसपास से भी जुड़ पाए.

इसलिए शिक्षा में शिक्षकों का जितना महत्व माना जाता है उतना ही शैक्षणिक किताबों का भी माना जाना चाहिए. उन पर काम किया जाना चाहिए. अभी हम देखते हैं कि बस्ते में किताबों की संख्या तो इतनी ज्यादा बढ़ी हुई है कि वह नन्हें बच्चों की पीठ पर बोझ बना चुकी हैं, लेकिन उनका कंटेंट ऐसा नहीं है जो सालोंसाल आपको एक मजेदार याद की तरह बना रहे. प्रोजेक्ट तो खूब आते हैं, लेकिन उनका सामान अपने पर्यावरण से नहीं आता, वह दुकानों से आता है, हमने ऐसा मान ही लिया है. इसलिए जानेमाने शिक्षा शास्त्री प्रोफेसर यशपाल कहते भी थे कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली बच्चों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति पर ताला लगाती है.


गुजरात में गिजुभाई ने भी शैक्षणिक प्रयोगों के माध्यम से मजेदार पठन
पाठन के लिए बेहतरीन किताबें लिखी हैं, पर वह वर्तमान शिक्षा प्रणाली का हिस्सा नहीं बन पाई हैं, वह केवल प्रयोग ही साबित हुई हैं. महात्मा गांधी ने भी बुनियादी तालीम के माध्यम से अपनी सोच रखी थी. सेवाग्राम के गांधी आश्रम में उन्होंने इसे करके देखा भी. गांधी ने केवल बुनियादी तालीम को अपना मौलिक अविष्कार बताया है. पर वर्तमान शिक्षा प्रणाली बुनियादी तालीम के बुनियादी तत्वों को भी अपने में साकार नहीं कर पाई. 

हमें शिक्षक दिवस के मौके पर ऐसे प्रयोगों, ऐसे शिक्षकों, ऐसी किताबों के बारे में सोचना चाहिए, तभी शिक्षक दिवस की सार्थकता हो सकती है.

 

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