टिकर

5/recent/ticker-posts

कृषि बिलः क्या मोदी सरकार चुनावी नजरिए से गलती कर बैठी?



बरुण सखाजी श्रीवास्तव

संपादक व राजनीतिक विश्लेषक
चुनावी लोकतंत्र में राजनीतिक सफलता और असफलता सिर्फ पॉपुलस मीटर पर ही नापी जाती हैं। ऐसे में संख्या सदा मुद्दे की गहराई और विस्तार से बड़ी होती है। हाल ही के कृषि सुधारों से जुड़े तीनों विधेयकों के जितने भी राजनीतिक विश्लेषण किए जा रहे हैं, वे इसी बात के इर्द-गिर्द हैं। इस बात पर कम लोगों की चिंता है कि किसानों का क्या होगा? मोदी सरकार की ये खासियत रही है कि उसने चुनावों को वीडियो गेम की तरह बना रखा है। एक निश्चित फॉर्मेट, एक निश्चित समय पर निश्चित निर्णय और सारी कठिनाइयां दूर। चुनाव हाथ में।
राजनीति तमाम तरह की समाजसेवाओं में सर्वोच्च और पवित्र कार्य है। लेकिन यह चुनावी चक्करों में फंसकर फकत एक खेल बनकर रह जाती है। किसानों की हालत भारत में ही नहीं अमरिका में भी कोई बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। फर्क सिर्फ इतना है कि अमरिकन किसान दया के पात्र नहीं होते, क्योंकि वे उन्नत किस्म की बड़ी लागत वाली खेती करते हैं और समाज में अप्रतिष्ठित नहीं माने जाते। किंतु भारत में किसान कर्ज से कुचला हुआ और खाने तक को मोहताज होता है। दया उत्कर्ष पर होती है। जबकि अमरिका का किसान खेती में 100 रुपए लगाकर 120 रुपए कमाने की कोशिश कर रहा होता है, वहीं भारत का किसान 50 रुपए लगाकर 200 रुपए कमाने की स्थिति में होता है। बस फर्क ये है कि अमरिकन किसान व्यापारियों की तरह कुशल, विज्ञ, तकनीकी संपन्न, अपना अच्छा-बुरा सोचने में सक्षम, किसान नेताओं के चंगुल से मुक्त, विषयों को समझने वाले एक अन्य अमरिकी नागरिक की तरह ही होते हैं। ऐसे में 100 रुपए लगाकर 120 रुपए कमाने के फॉर्मूले में अगर किसी वजह से वह फेल होता है तो उसको 100 रुपए का अधिकतम नुकसान है, जबकि फायदा अधिकतम भी है तो 20 रुपए का ही। इस तरह से फायदे का अनुपात नुकसान से बहुत कम है। जबकि भारत में किसान 50 रुपए लगाकर 200 रुपए कमाने की स्थिति में है। ऐसे में वह 50 रुपए की रिस्क में है और अगर फायदे में गया तो 150 रुपए के फायदे में जा सकता है।
दरअसल बात सुधारों की है। बात किसान की माली हालत को एड्रेस करने की है। इन विधेयकों में राजनीतिक विरोध के लायक पर्याप्त बारूद है। समर्थन के लिए बमुश्किल खोज-खोजकर निकालने के प्वांट्स हैं। ऐसे में विधेयक की मंशा महत्वपूर्ण है।
किसान की समस्या सिर्फ कृषि उत्पादों का विपणन नहीं है बल्कि उसकी निर्भरता है। मौसम पर निर्भरता, मैन पावर पर निर्भरता, कीट नाशक, खाद, पानी, बिजली, मिट्टी, बीज इत्यादि पर निर्भरता। और सबसे बड़ी खेती दोयम दर्जे का अनुत्पादक, निम्न काम जैसा सामाजिक माहौल है। इन निर्भरताओं से मुक्त करके किसान को अगर हम मुख्यधारा में उत्पादक बना पाए तो सारी समस्याओं का समाधान हो सकता है।
भारत में मौसम की स्थिति हमारे कंट्रोल में नहीं है। लेकिन मौसम की सही जानकारी और मौसम की सांख्यिकी और खेती में बीज चयन के बीच तो कम से कम समन्वय बिठाया जा सकता है।
मजदूरों की अनुपलब्धता में भी कोई सरकारी दखल नहीं है। वही लेबर रेत खनन करता है, वही बोरे ढोता है, वही ईंटे बनाता है, वही सरकारी पंचायती काम में संलग्न होता है। किसानों की निर्भरता में इस बिंदु पर ज्यादा सोचा नहीं जा रहा है, किंतु यह बहुत अहम है। इन्हें लेकर एक बार गंभीरता से कुशलता का विभाजन किया जाना आवश्यक है। जिससे हर सेक्टर में श्रमशक्ति मिल सके।
कीटनाशक या खाद के वक्त जिस तरह की मारामारी होती है उसे मुक्त करने की जरूरत है। इस संबंध में डीबीटीएल के जरिए सब्सिडी वाया सोसाइटी न देकर सीधे खाते में दी जाए और ओपन मार्केट को कुछ जरूरी केपिंग के साथ खोल दिया जाए तो यह समस्या हल हो सकती है। संभवतः इस पर केंद्र काम कर भी रहा है।
पानी को लेकर अभी कोई भी नियमावली नहीं है। किसानों से ज्यादा बोर तो शहरों में होते हैं। हर 20-30 फीट की दूरी पर बोर करने दिए जा रहे हैं। हमारी ग्रामीण और शहरी पंचायत अथवा निकाय इकाइयां पानी की पूर्ति ही नहीं कर पा रहीं। नतीजतन किसानों के बोर येन गर्मियों में सूख जा रहे हैँ। नदियों का पानी खत्म हो जाता है। रेत खनन इन्हें बेजार बना देता है। भूजल का बड़ा संकट होता है। ऐसे में बोर, नहर, सार्वजनिक सिंचाई परियोजनाओं में सेवा को सर्वोच्च बनाकर इस समस्या से निपटा जा सकता है।
बिजली को लेकर तो अधिकतम राज्यों में नियंत्रण आया है। हालांकि अभी यह फिर भी पर्याप्त नहीं है। काम किया जा रहा है और आने वाले दिनों में परमाणु बिजली आने के बाद तो फिर बिजली कोई बड़ी समस्या रहेगी ही नहीं।
मिट्टी और बीज को लेकर किसान की निर्भरता सबसे ज्यादा है। चूंकि उसे पारंपरिक ज्ञान से खेतों के आकार के अनुसार बीज की समझ तो है, लेकिन मिट्टी की गुणवत्ता के लिए कोई वैज्ञानिक आधोसंरचना नहीं है। यानी सोइल टेस्ट के लिए कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं। जबकि यह कार्य राजस्व व्यवस्था के हवाले करके कराया जाना चाहिए। हर दो वर्ष में पटवारियों को लक्ष्य दिए जाएं। वे स्वयं सैंपल लें और रिपोर्ट बनवाएं और उसे किसानों तक पहुंचाएं। बीज में भी यह ऊहोपोह है। समय पर बीज नहीं मिल पाते। जहां मिलते हैं वहां हाईब्रिड के नाम पर इतनी बेजा कीमत होती है कि आम किसान ले नहीं पाता। बीज के पारंपरिक सिस्टम को संधारित करने की जरूरत है। बजाए हाईब्रिड के नाम पर बीमारी वाला बीज देने के।
सबसे अहम किसानी सामाजिक रूप से हेय व्यवसाय जैसा प्रचार है। एक व्यक्ति चतुर्थ श्रेणी सरकारी मुलाजिम हो तो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर कहाएगा, लेकिन किसान 10 एकड़ का मालिक भी हो तो परतंत्र। यह परसेप्शन सरकारी बिलों से नहीं खत्म हो सकता है, लेकिन सरकारी सब्सिडी, कर्जमाफी आदि की दया खत्म करके जरूर इसे फेसलिफ्ट किया जा सकता है।
अंत में मोदी सरकार के ये बिल आलोचना के पात्र हैं, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन फिर खेती सुधार के लिए आप बताएं कि क्या किया जा सकता है। व्यवहारिक धरातल पर सोच, समझकर देखें तो ही कोई व्यवस्था जन्म ले सकती है। चुनाववाद के शिकार इस देश में धीरे-धीरे कठोर प्रशासनिकता, अनुशासनात्मकता, निर्णयक्षमता प्रभावित होकर विलोपित न हो जाए। ऐसे में कल्याण सर्वथा समाप्त माना जाएगा।
मोदी सरकार के इन विधेयकों का समर्थन करने की वजह यह है कि एक उपाय करने की कोशिश की गई है। किसानों के कुछ बिंदुओं को एड्रेस करते हुए दृढ़ता दिखाई गई है। लाचारी का प्रमाण पत्र नहीं बांटा गया, बल्कि किसानों को बाजार में स्पर्धी बनाने की छिपी हुई कोशिशें दिखती हैं। ऐसे में जो चुनाववाद के भय से भयभीत नहीं हों और दीर्घकालिक बदलावों को सोचते हों वे जरूर समर्थन करें लेकिन तात्कालिक तौर पर तो यह विरोध के योग्य ही हैं।

ये लेखक के विचार हैं, और मैं भी इनसे सहमत हूं।
राकेश मालवीय

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ