यह कहानी एक गांव की है, जो धीरे-धीरे कस्बे में तब्दील हो रहा है। गांव का नाम है राजपुर। राजपुर में हमारी जानकारी के दो परिवार रहते हैं। इनके बीच हम पिछले करीब चार महीने में 10 दिन के लिए गए। एक दिन जाते, फिर लौट आते। यह 10 दिन कई मायनों में बेहद अलग थे। हम सबकी आज की जिंदगी के बहुत करीब दिन हैं यह। इन 10 दिनों में जब भी हम इन परिवारों के पास गए इनके सामने हर रोज एक नई चुनौती थी, एक नई चिंता थी। हम जिन परिवारों की बात कर रहे हैं उनमें से दोनों की ही चिंताओं से जूझने और मुश्किलों को हल करने की रणनीति अलग—अलग थी। इसमें अच्छा या बुरा कुछ भी नहीं था। वह जो जैसा है, वैसा था। हर हल की अपनी खूबियां होती हैं, तो खामियां भी। ऐसा ही इन 10 दिन में हमें दिखाई दिया।
तो चलिये पहले आपको मिलवाते हैं इन दोनों परिवारों से।
पहला परिवार है शेखर जी का। शेखर जी परिवार के मुखिया है और एक फाइनैंसियल कंपनी में काम करते हैं। उनकी पत्नी माधुरी घरेलू महिला हैं। पढ़ी—लिखी हैं। दो बच्चे हैं बड़ी लड़की सान्या इस बार 10वीं की परीक्षा दे रही है और छोटा बेटा सामू अभी करीब पांच साल का है और गांव की आंगनबाड़ी में जाता है। शेखर जी के माता—पिता राजमनोहर जी और जानकी जी भी परिवार में साथ ही रहते हैं।
शेखर जी का परिवार इंटरनेट का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करता। घर में स्मार्टफोन तो है,
लेकिन ज्यादातर उसका इस्तेमाल बेटी ही करती है। वह भी व्हाट्सएप और फेसबुक और अन्य सोशल एप के लिए। कभी कभार चाची, मामी, मौसी के घर पर वीडियो कॉलिंग होती है,
लेकिन शेखर जी इससे नाखुश रहते हैं। वे आमने सामने की बातचीत में ज्यादा सहज रहते हैं। यहां तक कि कई बार दोस्तों ने कहा है कि स्मार्टफोन से बिजली बिल से लेकर बैंक लोन तक के काम हो जाते हैं, लेकिन वे इसके लिए अपने पुराने तरीकों को ही ज्यादा व्यवस्थित, सुरक्षित और सरल मानते हैं।
दूसरा परिवार है विमल जी का। विमल जी का मूल काम खेती का है, लेकिन वे अन्य सामाजिक कामों में भी जुड़े रहते हैं। यूं तो बाहर से देखने पर विमल जी का परिवार भी शेखर जी के परिवार की ही तरह है। घर में विमल जी के माता—पिता दयाल जी और इला जी हैं। पत्नी सीमा हैं और बड़ा बेटा तन्मय है और छोटी बेटी ओस है। लेकिन परिवार के सदस्यों और संख्या के अलावा बहुत कुछ अलग है। विमल जी का परिवार इंटरनेट और सूचना तकनीक का भरपूर लाभ लेता है। विमल जी, सीमा जी और तन्मय तो इंटरनेट और स्मार्टफोन चलाने में पारंगत हैं ही। दयाल साहब भी इंटरनेट के फायदे जानते हैं और अपनी अन्य शहरों में रहने वाली दोनों बेटियों से बात करने के लिए तन्यम के जरिये वीडियो कॉलिंग करवाने से लेकर टीवी पर कब कौन सा प्रोग्राम आना है, उसका अलार्म तक मोबाइल में लगवा लेते हैं।
ये दोनों ही परिवार आमने सामने रहते हैं और एक दूसरे के अच्छे पड़ोसी की तरह मिल जुलकर रहते हैं। इनके घरों के करीब ही एक खेल का मैदान है, जहां आसपास के अन्य परिवार की महिलाएं आमतौर पर शाम में गुट बनाकर बैठती हैं और गप्पें लड़ाती हैं। माधुरी जी और सीमा जी भी यहां अपने बच्चों के साथ पहुंचती हैं। बच्चे खेलते हैं और महिलाएं बातचीत में रम जाती हैं।
तो आइये जानते हैं इन परिवारों के बीच गुजरे 10 दिनों की दास्तान।
Content by: Sachin Srivastava
Illustration : Pooja Malviya
इस सीरीज की पहली कहानी पढ़िए कल...
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