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Covid19 : आईये, हम मजदूरों के बारे में कुछ इस तरह से भी सोचें


राकेश कुमार मालवीय

आपके चरित्र का असली पता तब चलता है जब संकट की घड़ी में आप अपने आसपास के लोगों से कैसा व्यवहार करते हैं। यदि इनमें आपके घर से कचरा ले जाने वाले हों, सफाई वाले हों, आपके घर तक पानी पहुंचाने वाले हों, बिजली कर्मचारी हों, गेट पर खड़े होकर और रातरात भर घूमकर आपको चैन से सुलाने वाले कर्मचारी हों तब तो यह व्यवहार और भी कसौटी पर चढ़ जाता है। यदि वक्त असामान्य, भयावह और इतना डरावना हो, जिसमें हर व्यक्ति एकदूसरे को संदेह के नजरिए से देख रहा हो, कोई भी आंख में आंख डाल कर एकदूसरे से बात करने में डर रहा हो तब तो आपस का व्यवहार और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

मैं खुद को खुदकिस्मत मानता हूं कि मेरे आसपास ऐसे भले लोग हैं जो सोशल मीडिया ट्रोलिंग और तमाम राहों से आ रहे कई तरह के नफरती संवादों के बीच भी इंसानियत को बचाए हुए हैं। चाहें तो इसे आप नकल भी मान सकते हैं या दिखावा की संज्ञा भी दे लें, लेकिन यदि यह नकल या दिखावा भी है तो वह भी सुखद है। दरअसल हमारी सोसायटी के लोगों ने तय किया कि जिन लोगों की वजह से वास्तव में लॉकडाउन को हम सफलतापूर्वक कर पा रहे हैं, हमें जरुरत की सारी चीजें घर बैठे ही मिल पा रही हैं। केवल इसलिए कि साढ़े चार सौ परिवारों वाली कॉलोनी को कर्मचारियों ने ठीक वैसा ही संभाल कर रखा है, जैसा कि आम दिनों में होते रहा है।

सोसायटी इनका सम्मान न भी करती तो कोई फर्क नहीं पड़ता। पर सोसायटी ने तय किया कि क्यों न एक दिन अपनीअपनी बालकनी में खड़े होकर हम इन सभी साथियों के लिए ताली बजाएं। एक सुबह ज्यादातर रहवासी केवल व्हाटएप्प आधारित अपील पर अपनीअपनी बालकनी में खड़े हुए और कॉलोनी में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए लाइन में घूम रहे 17 कर्मचारियों के लिए तालियां बजाकर सम्मान किया।

इन कर्मियों के चेहरों पर एक अलग तरह का भाव था। यह उनके जीवन का ऐसा टुकड़ा था जिसे शायद ही वह उम्र में कभी भूलें। भले ही उनके काम के बदले उन्हें वेतन दिया जाता हो, पर केवल पैसा ही तो सब कुछ नहीं होता है। यदि वह अपने काम से मना कर देते तो हम सोच भी नहीं सकते कि लॉकडाउन का कैसे पालन कर पाते, कैसे अपने घरों में रह पाते।

 

एक शहर को देखने में भी हम यही गड़बड़ कर देते हैं। हम ऐसे लोगों की सेवा तो तुरतफुरत और पूरीपूरी चाहते हैं पर उनको अपना हिस्सा बनाए रखने में हम वैसी दरियादिली नहीं दिखाती।

हमारे एक वरिष्ठ साथी बारबार शहर को बनाने में इनके योगदान की चर्चा करते हुए कहते हैं कि यदि केवल एक दिन शहर के वे सारे लोग जो बेहद मामूली काम करते हैं, घरों में बर्तन साफ करते हैं, खाना बनाते हैं, झाड़ू लगाते हैं, गाड़ियां चलाते हैं और ऐसे तमाम काम, वह हड़ताल पर चले जाएं तो दफतर और बाजार ठप्प हो जाएंगे, घरों की व्यवस्थाएं बिगड़ जाएंगी, सब कुछ उलट पुलट जाएगा। यह बात अब और समझ में आती है।

बहरहाल विकास ने जब शहरों को सुंदर बनाने की कोशिश की तो सबसे पहले ऐसे ही लोगों को शहरों से खदेड़ा। उन्हें शहर से दूर एकएक कमरों के मकान में ले जाकर रख दिया गया, इससे उनकी जिंदगी में क्या फर्क आया इस ओर किसी का भी ध्यान नहीं गया। शहर की विकास दर बनाए रखने के बावजूद उनकी अपनी अर्थव्यवस्था मंदी का शिकार हो गईं उनके काम का ज्यादा हिस्सा आनेजाने में बीतने लगा, परिवहन का व्यय तो अलग ही। बच्चों के स्कूल भी दूर हो गए।

लॉकडाउन में शहर की यह क्रूरता हमारे सामने आकर खड़ी हो गई जब​ हजारों लोग अपने बच्चों के साथ, म​हिलाओं के साथ, लाचार लोगों के साथ सड़कों पर आ गए। तस्वीरों ने हिंदुस्तानपाकिस्तान के बंटवारे के वक्त के दृश्य याद दिला दिए। इन तस्वीरों ने मजदूरों की हालत ही नहीं उघाड़ी, शहर का ​चरित्र भी सामने ला दिया। उसने बता दिया कि वह अब भी एक क्रूरतम अवस्था में मौजूद है, जहां पर शोषण है, असुरक्षा है, अधिकारों का हनन है। 135 करोड़ की आबादी वाले भारत में 12 करोड़ की जनसंख्या तो उन अप्रवासी मजदूरों की ही मानी जा रही है। अब जब हम एक मई को विश्व मजदूर दिवस मना रहे होंगे तो क्या देश इनके बारे में सोचेगा ? क्या कोरोना के संकट से निपटने के बाद इन लोगों के श्रम को सम्मान और सुरक्षा मिल पाएगी ? क्या पलायन की त्रासदी को कम करने के बारे में सोचा जाएगा और इसके लिए मनरेगा जैसी योजनाओं जिसे असफलता का स्मारक भी कहा गया, उसे तवज्जो दी जाएगी ?

जिम्मेदारी केवल सरकार भर की नहीं है। यह समाज की बुनावट का भी मामला है। जो लोग एक शहर की धड़कन में शामिल होते हैं, उन्हें एक विश्वास भी चाहिए होगा कि किसी भी संकट में समाज उनके साथ खड़ा है। वह भिक्षु नहीं हैं, वह श्रमजीवी हैं, उनकी अपनी अस्मिता है, सम्मान है, उन्हें सम्मान से रोजगार दिया जाएगा और उसका वाजिब मूल्य भी मिलेगा।

आईये, हम कोरोना संकट में आए इस मजदूर दिवस को हम कुछ इस तरह से भी सोचें।  


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