राकेश कुमार मालवीय
कोरोना काल में ‘राष्ट्रीय पंचायत
राज दिवस 2020’ और ज्यादा महत्वपूर्ण संदेश लेकर आया है। देश
के पंचायत प्रमुखों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह कहा भी
कि कोविड 19 का सबक यही है
कि हमें आत्मनिर्भर बनना है। इसके लिए उन्होंने ई—स्वराज्य और पंचायतों में स्वामित्व विवाद की
परिस्थितियों को लेकर जो रास्ता दिखाया वह निश्चित ही मील का पत्थर साबित हो सकता
है, लेकिन देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए हमें
कुछ और भी बातें प्रधानमंत्री के संबोधन में सुननी थी, जो बाकी रह गई।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी ठीक सौ बरस पहले 1920 में स्वराज शब्द
के जरिए आत्मनिर्भर होने की बात कही थी। पर बीते सौ बरसों में ऐसा नहीं हो सका। अब
देश के प्रधानमंत्री को वही बात एक महामारी के संदर्भ में फिर तीन बार दोहरा कर
कहनी पड़ी, आत्मनिर्भर, आत्मनिर्भर, आत्मनिर्भर।
जिस बेहद जरूरी
आत्मनिर्भरता की ओर हम जाना चाहते हैं उसका रास्ता गांवों को प्राथमिकता देने से
ही हो सकता है। गांव और शहर की गैरबराबरी को खत्म करके ही हो सकता है। इसमें कुछ
बातें महत्वपूर्ण लगती हैं।
पहली बात विकास के उस सवाल को लेकर है जो पिछले कई दशकों
में केवल शहर केन्द्रित होकर रह गया है। दूसरी बात स्थानीय स्तर पर या गांवों में
ही रोजगार की है और इससे उपजी पलायन की भयावह पीड़ा है। तीसरी बात गांवों में
आधारभूत इंतजाम की है जिसमें मुख्यत: स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी और बिजली जैसी बुनियादी जरुरतें हैं और आखिरी बात देश
में कृषि को तवज्जो देने की है, जिसने हर बुरे वक्त में भारत की अर्थव्यवस्था को संभाला है, मुश्किलों के
बावजूद अपने बुलंद हौसलों से हमेशा ही भूखे भारत का पेट भरा है। ई स्वराज की बात
तभी हो सकती है जबकि विकास के मानकों पर ग्राम पंचायतें इन सभी मामलों में
आत्मनिर्भर बन जाएं।
ऐतिहासिक नजरिए से वास्तव में भारत गांवों का देश है, और इसका पूरा
ताना—बाना ग्राम्य
आधारित व्यवस्था ही रही है। इसे कृषि प्रधान जरूर कहा जाता है, पर वास्तव में
भारत की ग्रामीण व्यवस्था भी उदयोग प्रधान रही है, यह जरूर है कि वह उदयोग गांवों की जरूरत पर
आधारित रहे, उनका स्वरूप छोटा—छोटा रहा, इसी में विविधता
रही, और विविधता में
मजबूती भी रही।
लेकिन आजादी के बाद हम कहते तो रहे कि गांव का विकास ही
असली विकास है, पर वास्तव में
वैसा होता नहीं रहा। हमारा पूरा जोर शहर बनाने पर ही रहा, गांव को हमने उस
लायक भी नहीं बनाया जहां लोग अपनी जरुरतों को पूरा कर सकें। जहां शहर बराबर बिजली, पानी, शिक्षा और
स्वास्थ्य मिल सके। विकास के हर पैमाने पर गांव से दोयम दर्जे का व्यवहार
गांववालों को शहर की तरफ ज्यादा आकर्षित करते रहा। अच्छी पढ़ाई का मतलब शहर, अच्छे घर का मतलब
शहर, ज्यादा समय बिजली
का मतलब शहर, आर्थिक व्यवहार
का मतलब शहर, अच्छे इलाज का
मतलब शहर, रोजगार का मतलब
शहर, बताईये यदि भारत
इन चंद चीजों को गांव में ही उपलब्ध करवा रहा होता तो क्या इतनी बड़ी आबादी आज शहर
में आई होती। कतई नहीं, लेकिन जानबूझकर
उसे ऐसा बनाए रखा क्योंकि शहरों को सस्ता श्रम चाहिए था, और गांव मजबूत हो
गए होते तो यह मिलना भारी मुश्किल भरा काम होता।
शहर का आगे बढ़ पाना मुश्किल नहीं होता, पर सवाल यह है कि
यदि गांवों के लोगों ने शहरों को बनाने के लिए अपना इतना योगदान दिया तो क्यों वे
कठिन वक्त में इन्हीं लोगों के काम नहीं आए जिन्होंने उन्हें खड़ा किया। गांव की
खुली हवा से शहरों की झुग्गियों और ऐसी ही सुविधाहीन इलाकों में रहने वाले लाखों
मजबूर जब भारत—पाक विभाजन की
तरह से घरों से बाहर निकले तब इसी बेरहम शहर का एक ऐसा रूप सामने आया जिसकी हमने
कल्पना भी नहीं की थी। हजारों लोग सड़कों पर थे, और सैकड़ों लोग अब भी सड़कों पर ही हैं, वे घर नहीं पहुंच
पाए हैं।
पर लोग अपने गांवों से बाहर निकलते ही क्यों हैं ? युवा काम के लिए
जाते हैं, बच्चे पढ़ाई के
लिए जाते हैं, बीमार इलाज कराने
जाते हैं। कुछ अपनी मर्जी से जाते हैं, और बहुत से कारणों में मजबूरी ज्यादा होती है। यदि यह
बुनियादी जरूरतें गांव में ही पूरी होने लगें तो भला कोई शहर क्यों जाएगा। पर हमने
ऐसा भारत नहीं बनाया। शिक्षा की जो व्यवस्था बनाई गई थी, जो उम्दा सरकारी
स्कूल थे, निजीकरण के बाद
उनके ढांचे को लगातार कमजोर किया जाता रहा, अब हालात यह हैं कि सरकारी स्कूल में मजबूर लोगों के बच्चे
पढ़ाई कर रहे हैं, सक्षम व्यक्ति का
बच्चा गैर सरकारी स्कूलों में हैं, गांवों में भी गैरसरकारी स्कूल भारी संख्या में खुलते जा
रहे हैं। ठीक यही मामला स्वास्थ्य सेवाओं के साथ भी है। गैरबराबरी केवल आर्थिक रुप
से नहीं है, सुविधाओं की
गैरबराबरी ने भी संकट को और बढ़ा दिया है। जब कोविड-19 के संदर्भ में
हम इन परिस्थितियों को देखते हैं क्या तब हमें दिखाई देता है कि इस गैरबराबरी को
कम किया जाना कितना जरुरी है ?
अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री ने देश के पंचायत
प्रतिनिधियों से सीधा संवाद किया। पंचायत प्रतिनिधियों ने बताया कि कोविड19 की लड़ाई में वह
अपने—अपने स्तर पर
बहुत बेहतर तरीके से इस लड़ाई को लड़ रहे हैं। यह वाकई सुखद है। गांवों ने इस
मामले में वाकई शहरों से ज्यादा समझदारी दिखाई है।
इस महामारी से उबरने के बाद इस बात को बारीकी से सोचना होगा
कि वास्तव में क्या हम ग्राम स्वराज आधारित व्यवस्था का भारत बनाना चाहते हैं या
कोविड से उबरने के बाद हम फिर से उसी तरह के विकास में लग जाएंगे। यह बात भी समझनी
होगी कि भारत की कृषि आधारित व्यवस्था देश की रीढ़ है, और जब तक कृषि और
किसान को मजबूत नहीं करेंगे, उन तक बेहतर तकनीक, बेहतर सुविधा और सम्मान नहीं पहुंचाएंगे तब तक देश में
विकास की यह गैरबराबरी भी बनी रहेगी।
देश को वास्तव में मजबूत करना है तो इस पंचायत दिवस पर यह
प्रण करना होगा कि ग्राम स्वराज की वास्तविक व्यवस्था बनाई जा सके। पंचायतों को
ज्यादा जिम्मेदारी और अधिकार दें। ज्यादा से ज्यादा स्वास्थ्य केन्द्र बनाए जाएं
सारी सुविधाएं ठीक शहरों की तरह ही दें। यदि ऐसा कर दिया गया तो निश्चित रूप से
कोविड-19 जैसी कोई भी
बीमारी भारत में इतना भय पैदा नहीं कर पाएगी जितना कि इस बार हुआ।
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