राकेश कुमार मालवीय
‘कोविड-19’ की लड़ाई में अगले दस—बारह दिनों में एक और नयी चुनौती जुड़ जाएगी और वह है ‘जलसंकट’। बार—बार हाथ धोने— खुद को, अपने परिवेश को
सेनेटाइज करने के लिए जिस पानी की अनिवार्य जरुरत होती है, उसके संकट की आहट मिलना शुरू हो गई है।
देश के अधिकांश हिस्से में भरपूर बारिश होने के बावजूद पानी का कुप्रबंधन हर
साल देश में पानी का भयानक संकट पैदा करता है, और इसका सबसे बड़ा शिकार होते हैं वह लोग जो घनी आबादी वाले
इलाकों में गुजर करते हैं। हालांकि पिछले साल अच्छे मानसून के चलते काफी बारिश हुई
थी, नदी—तालाबों में हर साल की अपेक्षा ज्यादा देर तक
पानी ठहरा है, जो जलसंकट फरवरी और मार्च के महीने में दिखाई
देने लग जाता था, वह अब तक उस भयंकर रूप में सामने नहीं आया है, लेकिन स्थिति ऐसी भी नहीं है कि तसल्ली से बैठ लिया जाए।
मुंबई की धारावी बस्ती में जिस आग की तरह वायरस फैल रहा है वह दिखाता है कि
सबसे ज्यादा ऐहतियात हमें इन्हीं जैसी घनी आबादी वाले इलाकों में करना है, और सबसे चुनौतीपूर्ण स्थिति यह है कि हर शहर
में इन्हीं जैसे इलाकों में लोगों को अपनी जरूरत के पानी के लिए संघर्ष करना पड़ता
है, मानसून चाहे जैसा भी हो।
यदि वक्त रहते इस चुनौती को समझा नहीं गया तो यह तय है कि पानी के लिए ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ की धज्जियां
उड़ाई जानी शुरू होंगी, और पानी जो कि
सबसे अनिवार्य जरूरत है, उसके लिए व्यक्ति
किसी भी जोखिम में जाने को तैयार होगा !
नीति आयोग ने में ‘संयुक्त जल
प्रबंधन सूचकांक’ शीर्षक से एक रिपोर्ट
जारी की थी। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि ‘भारत अपने इतिहास
में सबसे बुरे जल संकट के दौर से गुजर रहा है।‘ इस रिपोर्ट में
यह भी बताया गया कि देश के कई शहरों में साल 2020 तक के भूजल समाप्त होने की स्थिति में हो जाएगा।
पानी राज्य का विषय है, इसलिए सीधी—सीधी जिम्मेदारी राज्यों की है, केन्द्र इसमें वित्तीय और तकनीकी सहायता
उपलब्ध करवाता है। केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय ने देश में ऐसे 256 जिलों का चयन किया है जहां पानी का घनघोर संकट
है। इन जिलों में जल शक्ति अभियान चलाया गया, जिससे जल
संरक्षण और जल सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
पिछले साल जून में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संबंधित पंचायतों की सरपंचों को पत्र लिखकर जल संरक्षण की दिशा में काम करने के लिए आव्हान भी किया था, इतना करने के बावजूद भी जमीन पर ऐसी परिस्थिति नहीं आ पाई है जिसमें कहा जा सके कि हम लोगों को उनके घरों तक पर्याप्त साफ पानी उपलब्ध करवाने की स्थिति में हैं। इस पर अभी बहुत काम किया जाना बाकी है कि दुनिया के इतिहास में एक और बीमारी ने दस्तक दे दी, और इस बीमारी से लड़ने के लिए साफ—सफाई का भारी महत्व हो गया है, बिना पानी के साफ—सफाई नहीं हो सकती हैं
नीति आयोग ने दो साल पहले जिस बुरे दौर की बात की थी, वह अभी चल ही रहा है और जिन शहरों के लिए उसने चिंता जताई
थी उनमें वह शहर भी शामिल हैं जहां कोरोना वायरस तेजी से मार कर रहा है। इसमें
दिल्ली शामिल है, इसमें इंदौर
शामिल है, इसमें तमिलनाडु के
चैन्न्ई और वैल्लोर शामिल हैं, इसमें बैंगलोर और
हैदराबाद जैसे शहर भी शामिल हैं।
मोटे तौर पर भी देखें तो भारत दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी का भार उठाता है, लेकिन जहां फ्रेश वाटरसोर्स की बात आती है तो उसके हिस्से
में दुनिया के केवल 4 प्रतिशत
जलसंसाधन उपलब्ध हैं। जाहिर है जनसंख्या के अनुपात में यह कमी एक सुप्रबंधन की बात
करती है। देश में पानी की उपलब्धता से ज्यादा कुशल प्रबंधन का अभाव है।
वल्र्ड रिसोर्स इंस्टीटयूट की एक रिपोर्ट की मानें तो भारत में हर साल दो लाख
लोग जल अनुपलब्धता और स्वच्छता संबंधी उचित व्यवहार न होने की वजह से मर जाते हैं,
जहां ऐसी परिस्थितियां पहले से ही मौजूद हों
वहां पर एक और हायजीन और सेनीटेशन को अनिवार्य बताने वाली बीमारी का संकट बढ़ती हुई
गर्मी में और भयानक रूप लेगा।
बात केवल सेनीटेशन भर की भी नहीं है, भारत में जिस सोशल डिस्टेंसिंग को कोरोना वायरस से लड़ाई का सबसे बड़ा हथियार बनाया गया है, यदि उस पर गौर नहीं किया तो लोग पानी के लिए जुटना शुरू हो जाएंगे, लोग भीड़ में तब्दील हो जाएंगे, इसके लिए स्थानीय निकायों की सबसे अहम भूमिका अब शुरू हो जाती है, कि वह किस मुश्तैदी और सुरक्षा से उन जलसंकट वाले इलाकों में पानी का प्रबंधन करते हैं। मुश्किल गांवों में भी है, लेकिन गांव में भीड़ का दबाव नहीं है, जिससे सोशल डिस्टेंसिंग फिर भी बनी रहेगी, पर कस्बों और बड़े शहरों की बस्तियां इस संकट में एक और संकट को झेलने के लिए मजबूर होंगी।
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