राकेश कुमार मालवीय
कोरोना वायरस से बचने के लिए लोग घरों में सुरक्षित महसूस
कर रहे हैं, लेकिन उन लोगों का क्या जिनके घर ही नहीं हैं। यह संख्या
छोटी—मोटी नहीं है। 2011 की जनगणना के
मुताबिक देश में तकरीबन 17.72 लाख लोगों के पास अपना घर नहीं था। आवासन एवं
शहरी कार्य मंत्रालय ने 2016 में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत देश के
शहरी इलाकों में ही एक करोड़ बारह लाख घरों की जरूरत बताते हुए काम शुरू किया था।
यदि बीते आठ—नौ साल में चार
से पांच लाख लोगों के और रहने का इंतजाम कर भी दिया गया हो तो भी तकरीबन दस से
बारह लाख लोगों के पास अपना घर नहीं है। भयंकर सर्दी, भयंकर गर्मी और
बारिश से बचने का जतन करने वाले यह बेघरबार अब इस कोरोना वायरस की त्रासदी से कैसे
बचेंगे यह कोई नहीं जानता। सबसे ज्यादा जरूरी है कि फौरन ही इसके लिए इंतजाम की
दिशा में सोचा जाए। यह बहुत कठिन काम हो सकता है, लेकिन यदि इसे
नहीं किया गया तो सोचिए कि क्या हाल होने वाला है।
यह हद दर्जें की नाकामयाबी है कि आजादी के सत्तर साल में अब
भी देश की एक बड़ी आबादी के पास अपना घर नहीं है। बारहवीं पंचवर्षीय योजना के तहत
शहरी आवासों के लिए गठित तकनीकी समूह के मुताबिक इस योजना (वर्ष 2012 से 2017) की शुरुआत में
भारत में बुनियादी जरूरतों के साथ 1.88 करोड़ घरों की
कमी थी। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में यह कमी 2.47 करोड़ थी।
घरों की गुणवत्ता के नजरिए से देखा जाए तो हालात और भी खराब
है। देश में अब भी साढ़े छह करोड़ से ज्यादा लोग स्लम्स में रह रहे हैं और जनगणना
में आंकड़े लेते समय ऐसे लोगों को भी बेघरों की श्रेणी से बाहर कर दिया जाता है
जिनके घर प्लास्टिक की पन्नियों, अथवा ऐसी ही सामग्री से बने हुए हैं। बेघरों की
श्रेणी से ऐसे घर भी गायब हैं जो छोटी कॉलोनियों में एक कमरे में बसर करते हैं, और वहां स्वच्छता
की बात भी दूर की कौड़ी होती है। क्योंकि न वहां हाथ और शरीर धोने के लिए पर्याप्त
पानी होता है और बने हुए शौचालयों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है।
आवास बनाने की योजनाएं हर सरकार में चलती रहीं, लेकिन सबसे महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री नरेन्द्र
मोदी ने शुरू की। उन्होंने न केवल की बल्कि उसका जबर्दस्त प्रचार हुआ और ऐसा माना
भी गया कि जब मोदी सरकार दूसरी बार आई तो उसमें एक फैक्टर प्रधानमंत्री आवास का भी
रहा। मोदी सरकार ने कहा कि वह 2022 तक वह सब के लिए आवास का
बंदोबस्त कर देगी, लेकिन अभी मंजिल दूर है। नवम्बर 2019 तक के सरकारी
आंकड़े के मुताबिक भारत के शहरी क्षेत्रों में जिन 93 लाख आवासों को
स्वीकृत किया गया है, उनमें से तकरीबन 28 लाख मकानों को
ही पूर्ण करके सौंपा गया है, जबकि 55 लाख मकान अब भी
निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं यानी उनका काम अभी अधूरा है।
देश में छतविहीन लोगों की स्थिति का लेखाजोखा जनगणना 2011 के आंकड़ों में
किया गया है। इसके मुताबिक वर्ष 2001 में देश में बेघर लोगों
की जनसँख्या 19.43 लाख थी, जो वर्ष 2011 में कम होकर 17.72 लाख रह गयी
है। इस दौर में देश में खूब शहरीकरण हुआ, और उस अव्यवस्थित
शहरीकरण के परिणामस्वरुप शहरों में बेघर लोगों की संख्या में बढोत्तरी हुई है। 2001 में शहरी इलाकों
में 7.78 लाख बेघर लोग थे, यह संख्या दस साल
बाद बढ़ कर 9.38 लाख हो गयी। ग्रामीण क्षेत्रों में बेघर लोगों की संख्या
में कमी आई और ये 11.6 लाख से कम होकर 8.34 लाख रह गई।
सर्वोच्च न्यायालय वर्ष 2010 से बेघर लोगों
को आश्रय देने के लिए निर्देश दे रहा है. 20 जनवरी 2010 को पीयूसीएल
बनाम भारत सरकार और अन्य के मामले में न्यायालय ने निर्देश दिए थे कि हर एक लाख की
जनसँख्या पर एक ऐसा आश्रय घर होना चाहिए जिसमें सभी बुनियादी सुविधाएं, जैसे साफ़ बिस्तर, साफ़ शौचालय और
स्नानघर, कम्बल, प्राथमिक उपचार, पीने का पानी
हों। अक्सर शिकायत की जाती है कि लोग नशे का सेवन करते हैं और बीमार होते है, इस मामले में
निर्देश कहता है कि वहां नशा मुक्ति की व्यवस्था होना चाहिए । सुरक्षा और सम्मान
के नज़रिए से 30 फीसदी आश्रय घर महिलाओं, वृद्धों के लिए
होना चाहिए। आवास का यह मामला केवल विपरीत मौसम से ही नहीं जुड़ा है, अब जबकि कोरोना
नामक वायरस तेजी से फैल रहा है और उसके संक्रमण चक्र को तोड़ने का घर ही एक बेहतर
रास्ता है ऐसे में घरों की जरूरत को महसूस किया ही जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के बार—बार निर्देशों के
बावजूद बेघरबारों के लिए जो अस्थायी व्यवस्थाएं (आश्रय गृह) आदि की व्यवस्थाएं भी
ठीक—ठाक नहीं हो पाई हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक हर एक शहर में एक
लाख की आबादी पर एक रैन बसेरा होना चाहिए। इसी आधार पर देश के सभी राज्यों में 2402 आश्रय घर बनाये
जाने की जरूरत है, किन्तु 27 नवंबर 2015 की स्थिति में 1340 आश्रय घर ही
मौजूद हैं।
सर्वोच्च न्यायालय में 27 नवंबर 2015 को केन्द्रीय
आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय द्वारा दाखिल हलफनामों से पता चलता है कि
महाराष्ट्र में 409, उत्तरप्रदेश में 250, मध्यप्रदेश में 122, राजस्थान में 118 और दिल्ली में
कुल 141 आश्रय घरों की स्थापना जरूरत है। इस बात की तस्दीक की जानी
चाहिए कि 2015 के बाद सर्वोच्च न्यायालय का कहा मानते हुए सरकार ने कितने
और आश्रय गृहों का निर्माण और परिचालन सुनिश्चित किया है।
कोरोना के खतरे ने आवास की बुनियादी जरूरत के प्रति आगाह
किया है। इस बात को बहुत प्राथमिकता के साथ सोचा और किया जाना चाहिए कि 2022 के बाद हम यह
घोषणा करें कि देश में कोई भी आवासहीन या बेघरबार लोग नहीं हैं, क्या ऐसा हो
पाएगा ?
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