राकेश कुमार मालवीय
क्या चार सदस्यों वाले किसी परिवार में पांच रुपए रोज में किसी परिवार का
गुजारा हो सकता है ? यदि इस बात को सुनकर
आपके शरीर में सिहरन हो रही है तब आपको मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले की एक मजदूर महिला
अनारी बाई की यह कहानी पढ़कर हौसला हासिल करना चाहिए।
कोविड जैसे गंभीर संकट में उसके परिवार के हालात राहत योजनाओं से सवाल पूछते हैं कि वह कहां हैं, किसके लिए हैं और उनके हिस्से में वह कब तक आएंगे ? यह परिस्थिति समाज से पूछती है कि गरीबों की जिंदगी का मोल कितना बड़ा है, और क्या इसकी कीमत आज भी पांच रुपए प्रतिदिन से ज्यादा नहीं है।
अनारी आदिवासी शिवपुरी जिले में पोहरी ब्लॉक के एक गांव मचाखुर्द की निवासी
है। पति ब्रजेश भूमिहीन है। मजदूरी से घर चलता है। 26 साल की अनारी का एक तीन साल का बेटा है बादल। इस साल 24 फरवरी को उनके घर एक और बेटे का जन्म पोहरी के
अस्पताल में हुआ। पिछले सालों में संस्थागत प्रसव को काफी बढ़ावा दिया गया है।
इसका नतीजा यह है कि अब नब्बे प्रतिशत से ज्यादा प्रसव अस्पताल में हो रहे हैं।
अनारी का प्रसव अस्पताल में ठीक से हो गया।
बच्चे का वजन भी सामान्य था, उसका एक कारण वह सपोर्ट सिस्टम है, जिसके कारण अब स्थितियां पहले से बेहतर हुई हैं, जैसे कि आंगनवाड़ी से पोषण आहार और आयरन फोलिक एसिड की गोलियां का मिल जाना।
पर असली चिंता तो आजीविका की है। अनारी छोटे शिशु के कारण सुपाड़ नहीं जा पाई, उसका पति भी नहीं जा सका। यहां सुपाड़ जाने का मतलब है चार
महीने के भोजन का इंतजाम। यह राजस्थान सीमा से सटा वह इलाका है जहां मजदूर रवी फसल
की कटाई के लिए जाते हैं, और बदले में खाने
के लिए पांच—छह क्विंटल गेहूं
लेकर लौटते हैं। जब बारिश में कहीं काम नहीं चलता तो यही गेहूं उनका सहारा होता
है।
इस बार कोविड संकट में लॉकडाउन के चलते इस इलाके के ज्यादातर मजदूर सुपाड़ नहीं जा पाए, जो गए थे उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। अब ज्यादातर लोगों को यही चिंता है कि बरसात के चार महीने कैसे कटेंगे ? अनारी भी उनमें से एक है।
बाकी दुनिया की तरह कोविड ने अनारी और उसके परिवार को भी बुरी तरह प्रभावित किया। अनारी ने बताया कि बेटा बादल कुछ दिन पहले बीमार हो गया था तो गांव में ही एक झोलाछाप डॉक्टर आया। उसे दिखाया, उसने 50 रुपए लिए। मेरे पास 200 रुपए मजदूरी में से बचाकर जमा कर रखे थे, मेरे पास केवल डेढ़ सौ रुपए थे।
एक दिन घर में बिलकुल आटा नहीं था तो पड़ोसन सुमित्रा के यहां से 2 किलो आटा भर उधार लिया तब खाना बना। इस महीने
मैंने अपनी सास से 10 किलो गेहूं लिया
और 10 किलो सरकार से मिल गया,
लेकिन यह अनाज भी पंचायत ने कोविड कोटे से बिना
किसी कूपन के दिया गया।
परिवार के पास कई साल से गरीबी रेखा का कार्ड तो है, लेकिन राशन के लिए मिलने वाला कूपन यानी पात्रता पर्ची नहीं
बनने के कारण इन्हें लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली का राशन नहीं मिल पाता है।
अनारी हिसाब लगातार बताती हैं कि उन्होंने एक महीने में तकरीबन 22 किलो अनाज लगता है, लेकिन यह केवल अनाज है, जो पेट भरता है, पोषण की सभी जरुरत पूरी नहीं करता।
कायदे से स्तनपान कराने वाली महिला को भरपूर पोषण मिलना चाहिए, क्योंकि तभी वह बच्चे का भी ठीक से पोषण करा सकती है, लेकिन जिस परिवार में पांच रुपए दिन का बजट हो, वहां क्या मिल सकता है? अनारी का कहना है कि जब से कोरोना चला है तब से बहुत दिक्कत आ रही है। गांव में कभी—कभी फेरी वाले चुपके से सामान बेचने आ जाते। बादल उन्हें देखकर रोता था कि मुझे चाहिए। पर पैसे कहां से आएं? ऐसे में बड़ा मुश्किल हुआ।
लॉकडाउन में मेरे पास कुल 200 रुपए थे,
50 इलाज में चले गए। 150 रुपए में पूरा महीना निकाला। इसमें आटा पिसाई, नमक—मिर्च और बच्चे का खर्च चलाया है। हालांकि अब आसपास के खेतों में कुछ काम खुल
रहा है और मजदूरी मिलने लगी है,
पर मनरेगा के तहत अनारी
के पति को अब भी रोजगार नहीं मिल सका है।
अब जबकि कोविड के कारण दुनिया में गरीबी बढ़ने की कई तरह की रिपोर्ट हमें भयभीत किए हुए हैं। ऐसा माना जा रहा है कि कोविड संकट के कारण देश में तकरीबन 30 से 35 करोड़ लोग और गरीबी रेखा के नीचे चले जाएंगे और भारी में कुल गरीबों की आबादी साठ करोड़ के आंकड़े को भी पार कर जाएगी। तब हमें इस तरह कहानियों को पढ़कर यह सीख—समझ लेना चाहिए कि देश में गरीबी के हालात किस हद तक खराब हैं और उनको ठीक करने के लिए किस तरह की कोशिशों की जरुरत है ?
दिक्कत यह है कि इसी समाज में ऐसी खबरें भी झकझोर देती हैं जहां पर पांच रुपए का पर्चा नहीं बन पाने के कारण किसी आदमी को इलाज नहीं मिल पता है और वह अस्पताल की दहलीज पर होते हुए भी दम तोड़ देता है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि सरकार खुद के जनकल्याणकारी होने को तमगे को एक बार फिर चमकाकार अपने माथे पर सजा ले, और हर वह काम करे, जो उसे वास्तव में जनकल्याणकारी बनाता है, राशन को खैरात समझ लेने की अवधारणा को तोड़ देना होगा, सरकारी अस्पतालों स्कूलों में निजीकरण और उसकी बुराईयों को आने से रोकना होगा, क्योंकि कोविड के दौर में समाज को बुरी खबरों से बचाने का यही तो एक रास्ता होगा।
भारत में भूमिहीन परिवारों की आजीविका सुरक्षा का बोझ भी सरकार के कांधों पर
आने वाला है। यह जिम्मेदररी मनरेगा जैसी योजनाओं के जरिए बहुत आसानी से पूरी भी की
जा सकती है, क्योंकि यह
श्रमिकों के श्रम की गरिमा को भी बनाए रखती है, समुदाय में जरूरी संरचनाओं का सृजन भी करती है और उसके बदले
में कई तरह की सुरक्षाएं भी प्रदान करती है। अनारी और ब्रजेश जैसे परिवारों देश के
हजारों परिवारों को इस वक्त मनरेगा में काम मिलने, समय पर उसका भुगतान मिलने ओर उनकी आजीविका को पूरा करने का
भरोसा दिलाए जाने की जरूरत है।
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