राकेश कुमार
मालवीय
वर्ल्ड यूनिवर्सिटी आफ डिजाइन ने हाल ही में एक
रिपोर्ट जारी कर भोपाल शहर को सबसे अच्छी जल रचना वाला शहर बताया है। इस रिपोर्ट
में कहा गया है कि यह एक ऐसा शहर है जहां कि शहर और नगर जल आपूर्ति का प्रबंधन
करते हैं और जल संरक्षण करते हैं। निश्चित रूप से इस रिपोर्ट पर खुश हुआ जा सकता
है, लेकिन इसी शहर में पानी को लेकर एक ऐसी त्रासदी भी है जो
दिनों—दिन गंभीर होती जा रही है। राजा भोज द्वारा बनाई गई झील और
सहित 18 ताल—तलैयों पर खुश जरूर हुआ जा सकता है, लेकिन भोपाल गैस त्रासदी के उस जहरीले कचरे पर बात किए बिना यह स्वच्छता अभियान
पूरा नहीं हो सकता।
कुछ माह पहले एक
विशेष अनुमति से मुझे उस खूनी कारखाने में अंदर जाने का मौका मिला जो दुनियाभर में
भोपाल गैस त्रासदी के लिए कुख्यात है। चालीस साल से इस कारखाने का सायरन खामोश है, पर कारखाने के गेट पर आज भी एक—दो पुलिसवाले मुस्तैद रहते हैं। इसमें प्रवेश
के लिए जिला कलेक्टर की विशेष अनुमति लेनी होती है, लेकिन जगह—जगह से टूट चुकी चारदीवारी से यूं भी घुस सकते हैं। 68 एकड़ में फैले कारखाने
को एक अकेला पुलिसवाला संभाले भी कैसे। अंदर जाकर ही पता चला कि जानवर, बच्चे और शरारती तत्व इसके अंदर बेखौफ जाते हैं। कारखाने के एक हिस्से को
बच्चों ने खेल का मैदान बना रखा है। घास—झाड़ियों और टूटी—फूटी इमारतों के बीच मेरी नजर उस टैंक को ही खोज रही थी, जो इस पूरे कांड के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार था। अपनी जिम्मेदारी से मुंह
टेढ़ा करके वैसा ही पड़ा है जैसे कि यूनियन कार्बाइड और इसके बाकी दोषियों ने
किया। मेरी तलाश में एक और चीज थी जिसके बारे में आज भी लोगों के मन में खौफ है।
वह 346 मीटिक टन रासायनिक कचरा जो आज भी लोगों के लिए मुसीबत खड़ी कर रहा है, जिसपर तमाम राजनीतिक दल और सियासी महकमा आज तक कुछ भी नहीं कर पाया।
वह कचरा परिसर
में अब भी मौजूद है, और धीरे—धीरे भूमिगत जल को अपने
प्रभाव में ले रहा है। कई अध्ययन यह बताते हैं कि अपने प्रभाव से जमीनी जल को
प्रभावित कर रहा है और अब इसका दायरा बढ़कर बयालीस कॉलोनियों में पहुंच चुका है।
इसके बावजूद इस पर सिवाय एक पाइप्ड वॉटर लाइन डालने के कुछ नहीं किया जा सका है और
गैस पीड़ित संगठनों का कहना है कि वह पाइप्ड वॉटर लाइन भी ठीक तरह से काम नहीं कर
रही है जिसकी वजह से कारखाने के आसपास के लोग अब भी भूमिगत जल का उपयोग कर रहे
हैं।
भोपाल की गैस
त्रासदी भले ही हवा में खत्म हो गई हो, लेकिन पीने के पानी पर आज
भी कई तरह के सवाल खड़े हैं, जिन पर कोई बात नहीं की जा रही है। मध्यप्रदेश
सरकार ने मध्यप्रदेश में पानी के अधिकार पर बात करना शुरू जरूर की थी, लेकिन इस पर कुछ खास नहीं हो सका और सरकार पर ही संकट आ गया।
भोपाल में गैस
पीड़ित कॉलोनियों के संबंध में सबसे आखिरी रिपोर्ट लखनऊ की भारतीय विष विज्ञान शोध
संस्थान ने 2013 में जारी की थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक तब तक 22 मोहल्लों का भूजल
कीटनाशक कारखाने के ज़हरीले कचरे की वजह से पीने लायक नहीं रह गया है। शायद यहां
के रहवासियों को इस बात का अंदाज ही नहीं था कि वह पानी के साथ एक धीमा जहर भी पी
रहे हैं जिसमें उनके गुर्दे, लीवर, फेफड़े और मस्तिष्क को
नुकसान पहुँचाने वाले रसायन और भारी धातु मौजूद हैं जिनसे कैंसर तथा जन्मजात
विकृतियाँ होती हैं। बताया जाता है कि इस त्रासदी की जद में आज 24 कॉलोनियों की
तकरीबन दस हजार लोग हैं।
हालांकि ऐसा नहीं
था कि इस बात का पता नहीं था, यूनियन कार्बाइड कारखाने के आसपास के भूजल के
खतरनाक रूप से प्रदूषित होने की बात 1991 में प्रदेश सरकार की लोक स्वास्थ्य
यांत्रिकी विभाग के श्यामला हिल्स स्थित राज्य शोध प्रयोगशाला की जाँच रिपोर्ट में
कही गयी थी, लेकिन इसके इसके बावजूद प्रदेश सरकार द्वारा
कार्बाइड कारखाने के आस-पास सार्वजनिक हैण्डपम्प लगाए जाते रहे। प्रदेश सरकार के
पास स्थानीय भूजल के ज़हरीले होने के प्रमाण होने के बावजूद कारखाने के पास आकर
बसने वाले लोगों को शासन की ओर से कोई जानकारी नहीं दी गई।
सर्वोच्च
न्यायालय के मई 2004 के आदेश के फलस्वरूप अगस्त 2014 में प्रदेश सरकार द्वारा
10,000 परिवारों को पीने के पानी के निःशुल्क कनेक्शन दिए गए। आज कई रहवासी पानी
गंदा, अपर्याप्त मात्रा में होने और समय पर न आने की शिकायत करते
हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद आज तक कई प्रदूषण प्रभावित मोहल्लों के
रहवासियों को बदबूदार पानी दिया जा रहा है। कई मोहल्लों के कई एक गलियों में पानी
का दबाव इतना कम रहता है कि लोगों को आपूर्ति न होने से ज़हरीला पानी ही पीना पड़ता
है। प्रदेश सरकार द्वारा संचालित पुनर्वास अध्ययन केंद्र की 2009 की रिपोर्ट के
अनुसार प्रदूषित भूजल पीड़ितों में अप्रदूषित आबादी की तुलना में श्वसन एवं पाचन
तंत्र तथा आँख व चमड़ी की बीमारियाँ ज़्यादा पाई गईं।
भोपाल गैस
त्रासदी के इस धीमे जहर पर अब तक 15 परीक्षण विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय
संस्थाओं द्वारा किए जा चुके हैं,
लगभग सारे अध्ययनों में
जल प्रदूषण की पुष्टि हुई है। बताया जाता है कि जो प्रदूषण पहले 250 मीटर में
मौजूद था अब वह फैलकर 4 किमी तक हो गया है।
अगर कैंसर और
किडनी रोग की बात की जाये तो मध्य प्रदेश शासन के उपक्रम ‘भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास विभाग’ के वार्षिक प्रशासकीय
प्रतिवेदन 2016-2017 में दर्ज आंकड़े तो इसी बात का इशारा करते हैं कि वास्तव में
भूजलीय प्रदूषण अपना असर दिखा रहा है। प्रतिवेदन में ‘मुआवज़ा संबंधी निर्णय’ नामक बिंदु में दर्शाया गया है कि मुआवज़ा राशि
में वृद्धि होने पर प्रस्तुत कुल 63,819 दावा प्रकरणों में कैंसर ग्रस्त गैस
पीड़ितों की संख्या 10,251 थी, 5,250 किडनी रोगी थे। वहीं 4,902 लोगों में
स्थायी विकलांगता पाई गई।
इस तरह कैंसर और
किडनी जैसे गंभीर रोगों से ग्रस्त रोगियों की संख्या कुल मामलों के 25 फीसदी के
बराबर रही। जिस शहर में इतने लोग ऐसे गंभीर रोग का शिकार हों वहां पर देखा जाना
चाहिए कि इस संकट को दूर कैसे किया जा सकता है। खासकर उस दौर में तो और भी जबकि
स्वच्छता के लिए शहरों की प्रतियोगिता चलाई जा रही हो, और शहर दूसरे नंबर पर आ भी जाता हो, लेकिन उस जहरीले कचरे पर
कोई बात नहीं होती है।
तमाम दबावों के
बाजजूद 2015 में केवल एक बार दस मीटिक टन कचरे को पीथमपुर में जलाने की कवायद की
गई थी, लेकिन उसके बाद यह फिर ठंडे बस्ते में चला गया। पूर्व
मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर जो इस शहर को पेरिस बनाना चाहते थे, वह इस कचरे पर कई बार संजीदा दिखाई दिए, लेकिन वह नहीं रहे। गैस
पीड़ितों की हक में आवाज उठाने वाले अब्दुल जब्बार भी यह संघर्ष करते—करते चले गए। इस संघर्ष से तकरीबन दस लाख लोगों को मुआवजा तो मिला, लेकिन लोगों की सेहत की सुरक्षा अब भी एक बड़े संघर्ष का इंतजार कर रही है। इस
संघर्ष का सबसे बड़ा बिंदु है पानी। झीलों के शहर का एक इलाका अब भी पीने के पानी
की सुरक्षा मांग रहा है। यूका से जहरीला कचरा हटाए बिना यह संभव नहीं है।
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