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कोई भी बता देता है पपीते वाले खेत का पता

 


भोपाल से 22 किलोमीटर दूर बसे पिपरिया कदम गांव की अब एक अलग पहचान बन गई है। भोपाल से बैरसिया जाने वाली मुख्य सड़क से 2 किलोमीटर अंदर जाने वाली रोड पर यदि आपको पपीता वाले खेत का पता नहीं भी मालूम है, तो आप किसी से भी राह चलते पूछ लीजिए। 

आपको खेत का सही रास्ता मिल जाएगा। रोड से सटी पहाड़ी के पास तीन एकड़ के खेत की चर्चा आजकल लोगों की जुबान पर है। केवल आसपास के ही नहीं इसे देखने के लिए यहां दूसरे प्रदेशों से भी लोग आ रहे हैं। यह कमाल किया है ताईवानी पपीते ने। साल 2015 से शुरू किए गए इस प्रयोग ने लोधी दंपत्ति की जिंदगी बदल दी है।

यूं तो लोग गांव से शहर की ओर आते हैं, लेकिन शहर से गांव की ओर किसी की रुचि हो तो सही मायने में देश में गांवों की तकदीर को बदला जा सकता है। इसके लिए सबसे जरुरी है कि गांव में ही आजीविका के साधन उपलब्ध हों. यह गांव से पलायन रोकने का सबसे बेहतर रास्ता होगा,  वहीं शहरों पर बढ़ रहे आबादी के दबाव को भी कम करेगा। गांव में ही यदि आजीविका के संसाधन मिल जाएं, तो आसानी से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में रहने वाली गोमती देवी को जब ख्याल आया कि‍ गांव में ही खेती-कि‍सानी करके अच्‍छा काम कि‍या जा सकता है, तो उन्होंने इसकी चर्चा अपने पति विजय लोधी से की। विजय उनके ​इस विचार से सहमत हुए। उन्होंने इस संभावना का पता लगाना शुरू किया कि खेती-किसानी के क्षेत्र में क्या नया किया जा सकता है ? 

उन्‍हें कि‍सी परि‍चि‍त ने  उद्यानिकी वि‍भाग की योजनाओं के बारे में बताया जि‍नके जरि‍ए कई कि‍सानों ने बेहतर उत्‍पादन लेकर लाभ प्राप्‍त कि‍या था। प्रदेश में कि‍सानों की हालात सुधारने और खेती को लाभ का धंधा बनाने के लि‍ए इन योजनाओं पर सरकार सब्सिडी भी दे रही है।

भोपाल से बैरसिया रोड पर 22 किलोमीटर की दूरी पर लोधी दंपत्‍ति‍ का गांव है पिपरिया कदम। यहां की ज्यादातर आबादी कृषि पर ही निर्भर है। पिपरिया कदम में भी सामान्‍यत प्रदेश के दूसरे गांवों की तरह गेहूं और सोयाबीन की फसल ली जाती है। प्रायोगिक तौर पर खेती को अलग ढंग से करने की पहल यहां किसी ने नहीं की थी।

गोमती और विजय लोधी ने अपने तीन एकड़ के खेत पर कुछ अलग काम करने की योजना बनाई. इसके लिए उन्होंने अपनी पैतृक जमीन को ही चुनना सबसे ठीक समझा. सबसे पहले इसके चारों ओर फैंसिंग लगवाई। इसके बाद उन्होंने उद्यानिकी विभाग में संपर्क किया। उद्यानिकी विभाग भोपाल की उपसंचालक आशा उपवंशी से सलाह मिली कि वे अपने खेत में पपीता लगवा सकते हैं। इसके​ लिए उन्हें पूरा सहयोग-मार्गदर्शन और शासन की योजना अंतर्गत और वित्तीय मदद की भी जानकारी दी गई।

विजय लोधी ने अपने खेत में पपीते लगवाने का मन बनाया। उन्होंने ढाई एकड के खेत में पपीते के 2500 पौधे लगवाए। इन रेड लेडी (ताईवानी) पौधों को उद्यानिकी विभाग ने उन्हें उपलब्ध कराया। इसके साथ ही 27 हजार रूपए की लागत से ड्रिप सिंचाई पद्धति से सिंचाई की व्यवस्था की। इस सिंचाई व्यवस्था की सबसे खास बात यह है कि इसमें पानी व्यर्थ नहीं बहता। कम पानी में ही पूरी सिंचाई हो जाती है, साथ ही बारबार पानी को चलाने की व्यवस्था भी नहीं करनी पड़ती है। इस वैज्ञानिक पद्धति से कम पानी की स्थिति में भी भरपूर फसल होती है।

पौधों के बीच में मल्चिंग पद्धति का उपयोग किया गया। मल्चिंग पद्धति में पौधे के चारों तरफ पोलिथिन बिछा दी जाती है, इसकी खास बात यह है कि इसमें पौधों के आसपास खरपतवार नहीं उग पाती। जमीन की सारी ताकत पौधे को ही मिलती है, इससे उसकी अच्छी वृद्धि होती है. जो पानी दिया जाता है उसकी नमी लंबे समय तक बनी रहती है। इसको लगवाने में उन्हें  तकरीबन 18 हजार रुपए का खर्च आया।

गोमती देवी बताती हैं कि हमने पौधों को अपने बच्चों की तरह पाला। उनकी देखभाल की। वैज्ञानिकों से और खेती के जानकारों से समयसमय पर खेत का अवलोकन भी कराया। इसी का नतीजा है कि हमारे पूरे के पूरे ढाई हजार पौधे बढ़े हो गए, एक भी पौधा खराब नहीं हुआ। पौधों की बढ़त हो, और फल बेहतर आएं, इसके लिए जैविक खाद का उपयोग किया।

लोधी दम्पति के पौधे अब भरपूर फसल दे रहे हैं। पपीतों की गुणवत्ता इतनी अच्छी है कि लोग उनका माल घर से ही खरीदकर ले जा रहे हैं, उन्हें इसके लिए मार्केटिंग के अतिरिक्त प्रयास करने की जरूरत भी नहीं पड़ रही है। गांव के लोगों को वे पांच रूपये प्रति किलो कम दाम पर पपीता बेचते हैं, इससे यहां के लोगों का फलों के प्रति रुझान बढ़ रहा है। 

भोपाल नजदीक होने के कारण उनका बाकी का माल भी मंडी में चला जाता है। विजय लोधी का अनुमान है कि उन्हें पपीते की इस फसल में दो साल के दौरान कम से कम 15 लाख रुपए की आय जरुर होगी। इसकी लागत के बारे में उनका अनुमान है कि तकरीबन तीन लाख रुपए खर्च होंगे, इस तरह से दो साल में उनको बारह लाख रूपये का फायदा होने की उम्मीद है। 

वह शुक्रिया अदा करते हैं सरकार की योजना का, और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का जो खेती किसानी को लाभ का धंधा बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, खासकर उद्यानिकी विभाग का जिसके द्वारा उन्हें पौधों को खरीदने के लिए वित्तीय मदद भी मिली और उचित सलाह भी।

वह बताते हैं कि सचमुच हमने सोचा भी नहीं था कि यह फसल इतनी फायदेमंद हो सकती है, और सरकार की एक योजना से हमारी जीवन बदल सकता है। उनका कहना है कि केवल वित्तीय लाभ ही नहीं इस पूरे काम से खेतीकिसानी और गांव से जुड़ने का एक आध्यात्मिक आनंद प्राप्त होता है, उसका कोई मोल नहीं है। 

अब उद्यानिकी और उससे जुड़ी योजनाओं को प्राप्त करना भी आसान हो गया है। सब्सिडी सीधे हितग्राही के खाते में आती है, कुछ साल पहले तक जो दिक्कतें होती थीं,  वह भी कम हुई है।

गांव में और भी लोगों के खेत हैं, लेकिन उनमें परंपरागत रूप से सोयाबीन ही लगा है। इसका फायदा भी कम है। इस दौर में खेती को यदि करना है ​तो उसमें जितने प्रयोग हो सकते हैं और जितने प्रकार की खेती कर सकते हैं, करना चाहिए। यही कारण है कि उन्होंने अपने खेत में सफेद मूसली भी लगाई है। इसका एक क्विंटल लगभग तीन लाख रुपए में बिकता है। 

उन्हें उम्मीद है कि उनके आधा एकड़ के खेत में एक क्विंटल मूसली निकल ही आएगी। उनके इस काम को गांव के और लोग भी देख रहे हैं। एक दो लोगों ने उनसे सलाह लेकर इस नवाचार को करने का मन बनाया है। उनके खेत को देखने के लिए दूसरे प्रदेशों से भी लोग आने लगे हैं.

पिपलिया कदम गांव के करीब ही रतुआ पारदी गांव बसा है, इस गांव के रहने वाले में जेपी सक्सेना ने भी उद्यानिकी विभाग की मदद से पपीतों की खेत को अपनाया है. जी पी सक्सेना और उनकी पत्नी राम सक्सेना ने ताईवानी पपीते का बगीचा 1.75 हेक्टेयर जमीन पर तैयार किया है, उनका कहना है कि किसी भी हालत में उनकी फसल उन्हें लाभ देकर ही जायेगी, वह पूरी तरह से जैविक खेती को अपना रहे हैं और कोशिश कर रहे हैं कि इसमें कम से कम लागत में उनका काम हो जाये, उनकी फसल को अभी 6-7 माह ही हुए हैं और फल आने शुरू हुए हैं, उनकी आगे योजना है कि सरकार द्वारा पोली हाउस को बढावा दिया जा रहा है तो वह सरकार की योजना का लाभ लेते हुए पोली हाउस लगवाएंगे और उसी में फल-फूल और सब्जियों की खेती करेंगे.

 

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