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10वां दिन: रिजल्ट आ गया, अब बड़े स्कूल में दाखिला

 

पिछले दिनों में हमारा राजपुर का आखिरी दौरा कुछ लंबा रहा। पूरे दिन मेल मुलाकात चलती रही और कई मसलों पर लोगों से बात हुई। गांव के बस स्टैंड पर पहुंचे तो शेखर जी वहीं मिल गए। वे अपनी फाइनैंसियल कंपनी के किसी लोन के सिलसिले में जिला मुख्यालय जाने वाले थे। बातचीत में पता चला कि सान्या के लिए जिले में अच्छे स्कूल का पता लगाने की भी चिंता है। वे इसके लिए कुछ स्कूलों में जाने वाले थे और दाखिले के फार्म आदि लाने की कोशिश भी करेंगे। जब हमने आनलाइन फार्म की बात की तो बोले कि वहां भी देख लेंगे लेकिन बच्ची के भविष्य का सवाल है, कोई कमी नहीं रखना चाहते। एक पिता की चिंता बाजिव थी।

तब तक बस गई। हम लोग गांव में दाखिल हुए। आज शेखर जी घर पर सीमा जी भी आई हुई थीं और उनके दोनों बच्चे भी थे। बात वहीं स्कूल और आगे की पढ़ाई की चल रही थी। कोचिंग, ट्यूशन से लेकर किताबों तक पर बात हो रही थी।

सीमा जी ने बताया कि तन्मय को वे जिले के एक स्कूल में ही हॉस्टल में पढ़ने भेज रहे हैं। हालांकि दादादादी इस बात से नाखुश हैं और उनका कहना है कि बच्चे को एक दो साल और घर में रहकर ही पढ़ने दिया जाए। कॉलेज और उसके बाद तो बाहर रहना ही है।

माधुरी जी बोलींयह बड़ी समस्या है। गांवों में बच्चों के लिए कोई कामकाज नहीं है, और हम लोग शहरों में सहजता से नहीं रह पाते हैं, तो बच्चों तभी तक साथ हैं जब तक वे 12वीं तक की पढ़ाई कर रहे हैं।

तन्यम इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता। वह बोलाजरूरी तो नहीं कि हम कालेज के बाद कामकाज के लिए बाहर ही रहें। गांव में आकर भी तो बहुत कुछ किया जा सकता है।

उसकी भावनाओं से सबके चेहरे पर खुशी दौड़ गई। सीमा जी बोलींजैसे गांव में क्या कर सकते हैं।

तन्मय: मैं तो यूट्यूब पर ही काम कर रहा हूं। बतौर यूट्यूबर मैं गांव से भी काम कर सकता हूं। और आगे अगर प्रोग्रामिंग का काम करूंगा तो वो भी कहीं से भी किया जा सकता है।

बात तो तन्यम की सही थी। लेकिन अभी भारत में डिजिटल मिशन उस स्तर तक नहीं पहुंचा था, जहां से उसकी सोच को परवाज मिल सकती, लेकिन फिर भी अगले आठदस साल में इसकी उम्मीद तो की ही जा सकती है।

बहरहाल, हमने तन्मय को बुलाया और कहा कि तुमने बताया था कि गांव के बुजुर्गों के किसानी के वीडियो बनाकर नेट पर डालोगे और उसमें तुम्हारे कुछ दोस्त भी साथ देने वाले थे। उसका क्या हुआ!

तन्मय ने बताया कि वह अभी तक करीब 200 वीडियो यूट्यूब पर डाल चुका है, जिसमें खेती के तरीकों से लेकर फसल बदलने के चक्र और कम पानी या ज्यादा पानी की संभावनाओं को पता लगाने के तरीकों पर भी खासे वीडियो हैं।

हमने उसके दोस्तों से मिलने की इच्छा जाहिर की तो उसने तुरंत अपने दोस्तों के व्हाट्सएप ग्रुप में बताया। करीब 20 मिनिट में गांव के किशोर और युवाओं का एक समूह एकत्रित हो गया।

हमने जानना चाहा कि क्या वीडियो बनाने, अपलोड करने, उन्हें प्रसारित करने, तकनीकी टैगिंग, सबक्रिप्शन बढ़ाने आदि अन्य कामों के लिए अलग अलग टीम बना रखी हैं, या कोई भी यह काम कर लेता है।

एक किशोर ने बताया कि शुरुआत में तो सभी मिलकर काम करते थे, लेकिन बाद में जिसकी जैसे रुचि रही तो वह वही काम करने लगा। जैसे मैं खुद वीडियो को प्रसारित करने में ही मदद करता हूं। बाकी लोग अन्य काम करते हैं।

आप कैसे प्रसारित करते हैं।

हम संबंधित वीडियो की लिंक को व्हाट्सग्रुप के साथ साथ फेसबुक और मैसेज के जरिये भी भेजते हैं। पहले जो लोग वीडियो देख चुके हैं, या कमेंट करते रहे हैं, उन्हें भी अलग से वीडियो भेज देते हैं।

और ब्सक्रिप्शन बढ़ाने के लिए क्या करते हैं।

वीडियो के शुरूआत में अपील तो है ही। समय समय पर सोशल साइट्स पर इसके लिए छोटे छोटे वीडियो विज्ञापन भी खुद ही बनाकर उन्हें भेजते हैं।

तो इसकी स्टेटिक्स में कुछ खास बात दिखाई दी क्या!

यह काम विपिन देखता है उससे पूछिये

विपिन ने बताया कि सुबह के वक्त जो वीडियो डाले गए हैं, उन्हें ज्यादा हिट्स मिले हैं और जिन वीडियो को खुले में खेतों या पेड़ों के बैकग्राउंड में शूट किया गया है, उनके हिट्स भी अच्छे हैं।

तो क्या समय के साथ वीडियो पर हिट्स की संख्या बढ़ रही है।

हां, बिल्कुल शुरुआती वीडियो में हिट्स 25—30 तक ही थे, लेकिन अब इनकी संख्या 5 से 6 हजार तक पहुंच गई है। दो महीने में ही इस स्तर तक आना अच्छा संकेत है।

और सब्सक्रिप्शन कितना पहुंच गया है।

अभी हम लोग 14 हजार के सबक्रिप्शन पर पहुंच गए हैं और अब एड भी मिलने लगा है।

अरे वाह यह तो बड़ी अच्छी बात है, यानी जानकारी के साथ कुछ कुछ कमाई भी हो जाएगी।

हां, उम्मीद तो यही है। देखते हैं आगे क्या होता है।

बिल्कुल उम्मीद और मेहनत का मेल आपको अच्छे परिणाम देगा ही। वैसे साइबर सुरक्षा को लेकर आप किस हद तक आशंकिंत और सुरक्षित हो।

आशंकाएं तो बहुत हैं अंकल लेकिन इनसे निपटना भी होगा। आजकल वीपीएन चैंज करके लोकेशन बदल बदल कर हैकर्स अटैक करते हैं, तो पकड़ना मुश्किल हुआ है, लेकिन हमारे बीच से ही राकेश और साहिल इस काम को देख रहे हैं। वे हैकर्स पर नजर रखते हैं और डीपवेब, डार्क नेट पर भी नजर रखते हैं। एम2एमलर्निंग को भी हम समझ रहे हैं, तो इन हालात में हम बेहतर ढंग से काम कर पाएंगे इसकी उम्मीद तो है।

बच्चों की बात सुनकर हमें सुखद लगा। बातचीत से इतना तो समझ ही गया था कि आने वाली चुनौतियों के लिए नई पीढ़ी तैयार है और तकनीक को जीवन को सहज बनाने में इस्तेमाल करने के लिए तैयार भी है।

सबसे शुक्रिया कहकर हम गांव के अन्य लोगों सेमिलने के लिए बढ़ गए।

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