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भाग 3 - दांडी मार्च को देखकर दुनि‍या ने क्या माना था


बापू इस तरह से प्राप्त आजादी का भविष्य ठीक से देख पा रहे थे। इसके बाद उन्होंने भारत को आठ वर्ष दिए अपने अहिंसक तरीके से आजादी पाने की तैयारी करने के लिए और 12 मार्च 1930 को नमक कानून तोड़ने के लिए अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से दांडी मार्च शुरु किया।

इस मार्च या आंदोलन की तैयारी, भागीदारी व समर्पण को देखकर दुनिया के लोगों ने कमोवेश मान लिया था कि भारत अब आजाद हो गया है क्योंकि उसने अंग्रेजों के प्रति मानसिक दासता से मुक्ति प्राप्त कर ली है। दूसरी ओर जिन दिनों भारत अपनी आजादी की तैयारी में लगा था उन्हीं दिनों एक और पुरातन सभ्यता मिस्त्र भी ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्ति के लिए छटपटा रहा था।

इसी ध्येय को ध्यान में रखते हुए वहां सन् 1928 में ’’मुस्लिम ब्रदरहुड’’ का गठन हुआ जो कि सशस्त्र संघर्ष के जरिए ब्रिटिश उपनिवेशवाद से देश को छुटकारा दिलवाकर इसे शरियत पर आधारित राष्ट्र बनाना चाहता था। यहीं पर समझ में आ जाता है कि स्वतंत्रता जैसे महान उद्देश्य की प्राप्ति का रास्ता अगर हिंसा से गुजरता है तो इच्छित परिणाम मिल जाने के बावजूद अंततः देश, समाज या व्यक्ति पहुंचता कहां है।

गांधी द्वारा साध्य के लिए साधन की पवित्रता पर जोर देने की सार्थकता को भी समझ लेना आवश्यक हो जाता है। गौरतलब है यही वह समय है जब ब्रिटेन और पश्चिमी शक्तियों ने पृथक यहूदी राष्ट्र बनाने की तैयारियां शुरु कर दी थी और फिलिस्तीन जो कि ब्रिटिश साम्राज्य का ही हिस्सा था से मूल निवासियों की अप्रत्यक्ष बेदखली भी शुरु हो चुकी थी।

एक साजिश के तहत इस इलाके की सबसे उपजाऊ भूमि दुनियाभर के यहूदियों को हस्तांतरित की जा रही थी। दूसरे विश्वयुद्ध के पहले ही हिटलर की नाजी सरकार ने यहूदियों पर बर्बर अत्याचार प्रारंभ कर दिए थे और विश्वयुद्ध के दौरान उन पर जो अत्याचार हुए उनकी याद ही रोंगटे खड़े कर देती है। उतने ही भयानक, क्रूर व वीभत्स अत्याचार जापानियों ने चीन और कोरिया के नागरिकों पर करे।

यहूदियो को फिलिस्तीन में बसाने के विरोध में मुसलिम ब्रदरहुड ने हिटलर और नाजी जर्मनी का साथ किया और दो अतिवादियों का गठजोड़ हो गया। गौरतलब है इस दौरान भी महात्मा गांधी ने पृथक यहूदी राष्ट्र का यह कहते हुए विरोध किया था कि यहूदी जिस राष्ट्र में रह रहे हैं वहीं के बन कर रहें और फिलिस्तीन के निवासियों को उनके पैतृक निवास से बेदखल करना न्यायोचित नहीं है।

साथ ही बाइबिल के किसी उल्लेख को आधार बना कर उसे इच्छित भूमि बता देना भी उचित नहीं हैं। मगर पश्चिमी विश्व तो एक ऐसा मध्यपूर्व चाहता था जिसके अकूत तेल भंडारों पर उसका प्रत्यक्ष या परोक्ष कब्जा बना रहे। इसी भावना के तहत सन् 1948 में संयुक्त राष्ट्र संघ के एक प्रस्ताव के तहत इजरायल नामक देश स्थापित कर दिया गया। यह मानव सभ्यता के पूरे इतिहास की अनूठी घटना है जिसमें कि किसी राष्ट्र का इस प्रकार से गठन किया गया हो।

आप सन् 1928 में फिलिस्तीन का नक्शा देखिए और सन् 2014 का, आपको फर्क नजर आ जाएगा कि किस तरह साल दर साल उसका क्षेत्रफल सिकुड़ता जा रहा है और वह देश अपने अस्तित्व के लिए ही संघर्ष कर रहा है। इस अन्याय व अपमान को सहन कर पाना अरब विश्व के लिए नामुमकिन था।

इस अन्याय के खिलाफ यासेर अराफात ने फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) का गठन किया। इस बीच इजरायल की हिंसात्मक गतिविधियां दिन ब दिन बढ़ती गई और उसके प्रत्येक अनाचार को उचित सिद्ध करते हुए पश्चिम उस पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगाता रहा। काफी संघर्ष के बाद पृथक फिलिस्तीन राष्ट्र तो बन गया लेकिन वह अभी तक मूर्त रूप नहीं ले पाया है।

यासेर अराफात के नेतृत्व में फिलिस्तीन मुक्ति संगठन ने अपनी आक्रात्मकता और समझौते के मिश्रण से कुछ दूरी ही तय कर पाया। परंतु इस अन्याय और निराशा के वातावरण ने हमास जैसे अतिवादी संगठनों के लिए रास्ता खोल दिया। आज पूरे मध्य एशिया या यूं कहे कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान से लेकर अफ्रीका तक के मुस्लिम राष्ट्रो में फैली मिलिटेंसी, आक्रामकता या आतंकवाद की शुरुवात कमीवेश इन्हीं गलियारों से गुजरती हैं। आधुनिक संदर्भो में हम आगे इस पर और बात करेंगे।

जारी .....साभार चिन्मय मिश्र

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