सोमवार, दिसंबर 12, 2011

टी बी . बीमारी है या सामाजिक अभिशाप


राकेश कुमार मालवीय 
मध्यप्रदेश के सतना जिले के मैहर विकासखंड की निवासी विमला (परिवर्तित नाम) अपने ससुराल न जाकर अंदर ही अंदर घुट रही थी क्योंकि उसे डर था कि यदि उसकी टी.बी. की बीमारी की बात ससुराल में पता चली, तो उसे कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा। इसी दौरान उसका संपर्क टी.बी. के मुद्दे पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता संजीव से हुआ। चर्चा के दौरान संजीव को पता चला कि विमला को शादी के बाद टी.बी. हुई है। यह पूछने पर कि क्या पति को भी ऐसी ही कुछ बीमारी है तो विमला ने कहा हां, खांसी तो उसे भी उठती है। यह बात सामने आने पर विमला को सलाह दी गई कि वह ससुराल जाने के बाद सर्वप्रथम किसी तरह पति की जांच कराए। विमला ने ऐसा ही किया। जब रिपोर्ट आई तो शक सही साबित हुआ। उसके पति को भी टी.बी. थी। इसके बाद उसने अपनी जांच भी कराई। अब उसे ससुराल वालों का भय नहीं था। एक उचित सलाह से विमला का डर भी दूर हुआ, उसका परिवार टूटने से भी बच गया। अब दोनों नियमित डाॅट्स (दवाएं) लेकर ठीक होने की तरफ बढ़ रहे हैं। अजीब सी लगने वाली यह कहानी टी.बी. होने के सामाजिक अभिशाप को बयां करने के लिए काफी है।
भारत में पूरी दुनिया के 21 प्रतिशत टी.बी. मरीज रहते हैं। इसके बावजूद भारतीय सामाजिक ताने-बाने में टी.बी. के संक्रमण में आकर बीमार हो जाना एक त्रासदी के समान है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने टी.बी. को ग्लोबल इमरजेंसी घोषित किया है। यह सभी जानते हैं कि टी.बी. एक संक्रामक बीमारी है, जिसके शरीर की प्रतिरक्षण क्षमता कमजोर है या वह एक ऐसे दायरे में रह रहा है जहां कि टी.बी. से संक्रमित होने का खतरा हो सकता है वहां पर टी.बी. हो जाने के बाद वह एक बहिष्कृत यंत्रणा के दौर से गुजरता है। महिलाओं के साथ तो दोहरी चुनौती है। विमला का मामला बताता है कि यदि एक पुरुष को टी.बी. हो जाए तो कोई बात नहीं, लेकिन यदि महिला को टी.बी. हो जाती है तो वह एक प्रश्न बन जाता है। यह केवल एक बीमारी के रूप में नहीं बल्कि हमारी सामाजिक व्यवस्था में अंदर तक घुसा शर्म और घुटन का यह एक ऐसा विषय है जहां कि टी.बी. से लड़ने की चुनौती और भी बड़ी हो जाती है।
मध्यप्रदेश में टी.बी. की हालत तो और भी खराब है। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में उप संचालक क्षय ने बताया कि       मध्यप्रदेश में 2005 से 2008 तक की अवधि में टी.बी. के मरीजों की कुल संख्या 11 लाख 419 थी। इन्हीं सालों में टी.बी. के कारण मध्यप्रदेश में 4707 मौतें सरकारी रिकाॅर्ड में दर्ज हैं। यह संख्या उस ताने-बाने में है जहां कि टी.बी. को एक शर्म का विषय मानकर छुपाया जा रहा हो। निश्चित ही सरकार द्वारा प्रस्तुत किए गए यह आंकड़े वास्तविकता से कहीं कम आंके गए हैं।
अब जबकि टी.बी. के लिए तीन मिनट में जांच कर रिपोर्ट देने सुविधा और ज्यादा सुरक्षित डाॅट्स दवाएं देने की बात की जा रही हो वहां पर टी.बी. मरीजों की वास्तविक संख्या पता लगाना एक बड़ी चुनौती है। लेकिन रास्ता भी यहीं से होकर गुजरता है। टी.बी. से संघर्ष मंे सबसे बड़ी चुनौती इसे सामाजिक अभिशाप और शर्म के विषय की श्रेणी से बाहर लाने की है। दुनिया में हर साल 15 करोड़ बच्चे टी.बी. से संक्रमित होते हैं, और इनमें से एक लाख तीस हजार बच्चों की जान नहीं बच पाती है। टी.बी. को जड़ से मिटा देने की बुनियादी जरूरत के रूप में बीसीजी के टीके को देखा जाता है। बच्चे के जन्म के तुरंत बाद इस टीके के द्वारा बच्चों को टी.बी. के संक्रमण से सुरक्षित रखा जाता है। यह इसलिए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है क्योंकि पांच साल से कम उम्र के बच्चों में टी.बी. के खिलाफ प्रतिरक्षण तंत्र पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाता है।
यूनीसेफ द्वारा कराए गए कवरेज इवेल्यूशन सर्वेक्षण में मध्यप्रदेश में तमाम प्रयासों के बावजूद कुल टीकाकरण 42 प्रतिशत तक ही हो पाया है। जिस प्रदेश में साठ प्रतिशत बच्चों के कुपोषण को साबित किया जाता रहा है वहां यह बात अलग से साबित करने की जरूरत नहीं है कि जिन बच्चों में कुपोषण होता है उनमें रोगों से लड़ने की क्षमता भी कमजोर होती है और वे किसी भी तरह के संक्रमण का जल्दी शिकार होते हैं। बच्चों में टी.बी. के बढ़ते मामले भी यही दर्शा रहे हैं तथा मध्यप्रदेश में उच्च शिशु मृत्यु दर का कारण भी यही है और वह देश में शिशु मृत्यु दर के मामले में दूसरे नंबर पर है।
मध्यप्रदेश में बच्चों की मौत और कुपोषण के मामले में बदनाम शिवपुरी जिले के नहरगड़ा गांव में वर्ष 2010 में 9 बच्चों की मौत हुई थी। इन मौतों के बाद मीडिया ने इन मुद्दों को खासा उठाया। गांव में एक स्वतंत्र जांच दल भी पहंुचा। जांच दल की रिपोर्ट के बाद राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग भी गांव पहुंचा। अनुशंसाएं हुईं। लेकिन इसी गांव में जब सितम्बर 2011 में दौरा किया तब भी अधिकतर बच्चे टीकाकरण से वंचित थे। मतलब साफ है कि जिस  एक गांव में बच्चों का स्वास्थ्य सुधारने के लिए इतनी कोशिशें की गईं जब वहां ऐसे हालात हैं तब दूसरे गांवों की स्थिति का तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
नहरगड़ा गांव का हीरा सहरिया पिछले दस सालों से टी.बी. से पीडि़त होकर घर की खटिया पर पड़े-पड़े अपनी मौत की राह देख रहा है। वह कुछ दिन डाॅट्स की दवाएं खाता है लेकिन फिर छोड़ देता है। उसे दवा तो मिल गई, लेकिन उचित सलाह नहीं। अब उसे अपने ठीक होने की कोई राह दिखाई नहीं देती। टी.बी. से लड़ाई में उचित सलाह, परामर्श भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी की दवा। इस बात को सतना जिले के दुरैहा गांव की आशा कार्यकर्ता मिथलेश तिवारी के काम से समझा जा सकता है। मिथलेश तिवारी पिछले छह सालों से गांव में टी.बी. के खिलाफ लड़ रही हैं। इस गांव के आदिवासी टोले में एक साल में पचपन लोग असमय मौत का शिकार बने हैं, लेकिन दूसरी ओर इसी गांव में ऐसे लोग भी हैं जो नियमित रूप से डाॅट्स खाकर टी.बी. के प्रकोप से बच गए हैं।
किसी भी मरीज की टी.बी. रिपोर्ट पाॅजीटिव आने के बाद सलाह दी जाती है कि वह आराम करे। शारीरिक कष्ट झेल रहे मरीज के लिए यह मानसिक और सामाजिक तौर पर भी बेहद संवेदनशील समय होता है। यह समय गरीबी में जी रहे व्यक्ति के लिए और भी भारी पड़ने वाला होता है क्योंकि वह शारीरिक कार्य करने में अक्षम होता है, इसीलिए सबसे पहला संकट उसकी आजीविका के रूप में सामने आता है। ऐसे लोगों की खाद्य सुरक्षा भी संकट में पड़ जाती है। सतना में टी.बी. के खिलाफ संघर्षरत सामाजिक कार्यकर्ता संजीव मिश्र मानते हैं कि टी.बी. से लड़ाई में दवा के साथ भोजन एक महत्वपूर्ण अवयव है। लेकिन टी.बी. का मरीज यदि घर का मुखिया है या घर की आजीविका में उसकी मुख्य भूमिका है ऐसी स्थिति में उसकी व उसके परिवार की खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो जाती है। उनका कहना है कि यदि टी.बी. के मरीज को बीमारी पता होने के बाद फौरी तौर पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मिलने वाले खाद्यान्न में विशेष रियायत मिले, या कोटे से ज्यादा अनाज का प्रावधान हो तो उसे मानसिक और आर्थिक संबल भी मिल सकता है।
देखा जाए तो टी.बी. मात्र शरीर की बीमारी न होकर उससे कुछ ज्यादा है क्योंकि भारतीय समाज में उसे लेकर शर्म, बहिष्कार व मानसिक प्रताड़ना विद्यमान है। यह केवल शरीर में ही पनपने वाली बीमारी न होकर समाज की भी बीमारी है, जो सामान्य बीमारी से कहीं ज्यादा संघर्ष मांगती है।

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