सोमवार, जनवरी 17, 2011

ट्रेक्टर ही नहीं है विकास का प्रतीक


एक खबरिया चैनल पर ऐशकार्ट्स  समूह के सीईओ का बयान गौर करने वाला है। देश  में बढ़ती महंगाई के सवाल पर उनका जवाब था देश में हर दिन कितने ट्रेक्टर बिक रहे हैं। यह बताता है लोगों की क्रय शक्ति  कितनी बढ़ गई है और देश  तेजी से तरक्की कर रहा है। उसी चर्चा में शामिल सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने उनकी बात काटते हुए कहा कि हमें यह भी गौर करना चाहिए कि हर दिन ट्रेक्टर बिक रहे हैं तो उनमें से बैंकों के द्वारा कितने ट्रेक्टर खींचे जा रहे है। इस चर्चा के दो दिन बाद ही मध्यप्रदेश  में किसान आत्महत्याओं की खबर भी सुर्खियों में थी। सरकार पिछले दिनों किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं को कर्ज के दबाव में की नहीं की गई आत्महत्या साबित करके बैठी ही थी कि सीहोर जिले के किसान द्वारा आत्महत्या ने खेती-किसानी और तथाकथित विकास की पोल खोल कर रख थी। शरबती गेहूं की पैदावार में पूरे देश में ख्यात सीहोर जिले में इस आत्महत्या ने पूरे प्रशासनिक   ढर्रे को हिलाकर रख दिया और इस पर लीपापोती का खेल फिर शुरू हो गया। बहरहाल विदर्भ की राह पर चल रहे मध्यप्रदेश में इस   दौर में लगातार मौतों ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि खेती-किसानी के जिन तरीकों  को अपनाया और प्रोत्साहित किया जा रहा है वे कितने टिकाऊ और बहुसंख्यक किसानों के पक्ष  में है।

पिछले दिनों में होशंगाबाद  जिले की पिपरिया तहसील, रायसेन और अब सीहोर जिलों में किसान आत्महत्या के मामले सामने आए हैं। यह सब वह जिले हैं जहां कि हरित क्रांति  अपने समृध्द रूप में नजर आती है और यहां की किसानी को एक आदर्श  माना गया है। यह सब वह जिले हैं जहां कि किसानों ने परंपरागत खेती-किसानी के तरीकों को छोड़कर आधुनिक खेती की ओर कदम बढ़ाए हैं और पंजाब को अपना आदर्श  मानते हुए उन्नति की इबारत लिखी है। यह दिलचस्प बात है कि पंजाब की खेती अपने मौजूदा स्वरूप मे कहां तक सफल है। पिछले दिनों खेती-किसानी के मुद्दों पर भोपाल आई किसान स्वराज यात्रा में शामिल पंजाब के एक किसान हरविंदर सिंह ने साफ कहा था कि पंजाब की खेती अब एक बुरे दौर से गुजर रही है। यहां जरूरत से अधिक ट्रेक्टर हैं। बहुत ज्यादा उर्वरकों का इस्तेमाल करके ज्यादा उत्पादन लेकर जमीन को एकदम बंजर बना दिया गया है। इतना ज्यादा बंजर की अब बिना खाद का इस्तेमाल किए यहां कुछ भी पैदा करना संभव नजर नहीं आता है। कमोबेश  जिस पंजाब को मध्यप्रदेश  के किसानों ने अपना आदर्श  माना उसी पंजाब के सैकड़ोें किसान पंजाब में अपनी खेती को बेचकर मध्यप्रदेश के कई जिलों में पलायन कर गए। लेकिन मध्यप्रदेश में ही खेती-किसानी के हालात नेशनल  क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट से समझा जा सकते हैं। 2009 की रिपोर्ट यह बताती है कि प्रदेश  में 2001 से 2009 तक बारह हजार चार सौ पचपन किसानों ने खुद मौत को गले लगा लिया। इनमें से 10 हजार 159 पुरूष और दो हजार 296 महिलाएं थीं।

मध्यप्रदेश में खेती-किसानी में हरित क्रांति के आने के बाद सोयाबीन और गेहूं-चना की फसल का रकबा और उत्पादन दोनों ही तेजी से बढ़ा है। सोयाबीन की पफसल में जब लगतार घाटा हुआ तो किसान अब धान की खेती की ओर बढ़ रहे हैं। उधर रबी फसल में भी लगातार उत्पादन औसत बढ़ाने के लिए किसान अब प्रति एकड़ एक या दो नहीं बल्कि चार-चार बोरी उर्वरक का इस्तेमाल कर रहे हैं। यहां इस बात को समझने की महती जरुरत  है कि खेती में भले ही उत्पादन जरूर बढ़ा हो, लेकिन उत्पादन लागत भी उसी तुलना में बढ़ी है। इससे खेती-किसानी में विकास का एक ऐसा झुनझुना दिखाई तो देता है लेकिन इसके अंदर कुछ नहीं है और बजता नहीं है। ख्यात कृषि वैज्ञानिक देवेन्द्र शर्मा बताते हैं कि खेती-किसानी की हालत आज इनती खराब हो चुकी है कि एक किसान का वेतन छठे वेतनमान के बाद चपरासी को मिल रहे वेतन के बराबर भी नहीं है। इसलिए आज की युवा पीढ़ी लगातार खेती से अलग होती जा रही है।

राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे की रिपोर्ट इस बात को और पुख्ता करती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक चालीस प्रतिशत  किसान खेती नहीं करना चाहते हैं। लगभग २७ प्रतिशत  किसानों ने इसे घाटे का सौदा कहा और आठ प्रतिशत किसानों ने इसे जोखिम का काम बताया है। कुल मिलाकर 75 प्रतिशत  किसान किन्हीं न किन्हीं कारणों से खेती नहीं करना चाहते हैं। यह स्थिति बताती है कि जिस खेती को हम देश की अर्थव्यवस्था का आधार बताते हैं वहीँ खेती को अंदर ही अंदर ऐसी बीमारी लगी है जो बाहर से दिखाई नहीं देती।

दिक्कत यह है कि सत्ता इस स्थिति को समझने की बजाय उसे दूसरी तरफ मोड़ने के संघर्ष में लगी दिखाई देती है। यह स्थिति तब और साफ समझ आती है जब नकली कीटनाशक  दवाईयों की एक भी कंपनी पर सरकार गंभीरता से कार्रवाई नहीं कर पाती। यह बात तब और भी समझ आती है जब किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त बिजली नहीं मिल पाती। यह बात तब और भी समझ आती है जब किसानों  को पर्याप्त रूप से खाद-बीज उपलब्ध करवा पाने में सरकारें  नाकाम साबित होती हैं। यह बात तब और भी समझ आती है जब किसानों को उनकी फसल का सहीं और समय पर मूल्य नहीं मिल पाता और वह अपना अनाज बेचने के लिए कई दिनों तक इंतजार करते हैं।

पिछले दिनों प्रदेश  की राजधानी भोपाल में किसान आंदोलनों को अगर राजनैतिक संदर्भों को छोड़कर देखा जाए तो स्थिति को समझा जा सकता है। इस आंदोलन के महीने भर गुजर जाने के बाद भी उनकी मांगों पर कार्रवाई के हश्र को देखा जा सकता है। इन सभी तथ्यों के मायने यही हैं कि केवल मध्यप्रदेश  में हीं नहीं पूरे देश  में खेती-किसानी का मुद्दा मुख्यधारा में नहीं माना जा रहा है। चमचमाते मॉल, सड़कों पर महंगी गाड़ियां और ट्रेक्टरों की बिक्री को विकास का आधार मानने वाले देश  को स्थायी और टिकाउ खेती की राह पर जाना होगा जहां वास्तव में इमारत की नींव खोखली न हो।



 

2 टिप्‍पणियां:

Deepa ने कहा…

aap ke likhe hue aalekh se mai sahmat hoon. Roz ham akhbaron me padhte hai ki kisano ne karz ke karan atmhatya kar rahe hai jisme madhya pradesh ka sthan sabse upar hai, par sarkaar koi thos kadam nahi utha rahi balki prashasan ka ek aur rup samne aaraha hai ki sarve ke liye gaye patwari kisano ka naam muavza suchi me jod he nahi rahe hai.

Deepa ने कहा…

aap ke likhe hue aalekh se mai sahmat hoon. Roz ham akhbaron me padhte hai ki kisano ne karz ke karan atmhatya kar rahe hai jisme madhya pradesh ka sthan sabse upar hai, par sarkaar koi thos kadam nahi utha rahi balki prashasan ka ek aur rup samne aaraha hai ki sarve ke liye gaye patwari kisano ka naam muavza suchi me jod he nahi rahe hai.