मंगलवार, मई 25, 2010

विज्ञापनों का कौन माई-बाप है



सुबह-सुबह अखबार में छपे एक विज्ञापन पर नजर अटक गई। विज्ञापन था तो इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट का, मगर इसका प्रस्तुतिकरण दिलचस्प था। यह विज्ञापन खास शादियों के लिए बनाया गया था। वकालत यह की गई थी कि यह बेटी को दिया गया सबसे उम्दा तोहफा होगा। मतलब क्या है इसका। क्या यह अपने बाजार को और अधिक सम्रद्ध करते जाने की प्रक्रिया का अंग नहीं लगता। क्या यह विज्ञापन दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों को उत्साहित करने वाला नहीं है। क्या यह दिलचस्प नहीं है कि एक ही स्थान पर एक ओर दहेज और ऐसी अन्य कुरीतियों के खिलाफ जनसरोकारी होने का ठप्पा लगाते हुए तमाम खबरें और आलेख लिखे जाते हैं वहीं दूसरी तरफ ऐसे विज्ञापनों के जरिए बिना देखे-परखे इसके ठीक उलट सन्देश  दे दिए जाते हैं। अखबार के अर्थतंत्र को चलाने के लिए विज्ञापन की भूमिका से कतई इंकार नहीं किया जा सकता पर सवाल यह है कि जब अखबार घर-घर की जरूरत है, उसका सामाजिक सरोकार है जैसा कि अखबार खुद कहता है, तब विज्ञापनों का भी कोई माई-बाप होना चाहिए, जो मार्केटिंग की भाषा के इतर भी एक अखबार की व्याकता को भली-भांति समझता हो।
खबर बनने, छपने की अपनी प्रक्रिया है। मॉनीटरिंग है और छपने के बाद प्रतिक्रियाओं की व्यापक गुंजाइश  है। इसलिए खबरें हमेशा  कठघरे में होती हैं। हैरानी वाली बात यह है कि विज्ञापन अब तक इस प्रक्रिया से बचते आए हैं। तभी तो अब तक अखबारों के विज्ञापन अपनी सीमाओं को लांघ कभी का लांघ चुके हैं। अंडर गार्मेंट से लेकर, आपके जोश-जज्बे को बढ़ाने वाले, शरीर को नया आकार देने, कंडोम सहित बीसियों विज्ञापन हर रोज अखबार में खबरों के साथ ठसे दिखाई देते हैं।
इस विषय पर बहस की तमाम गुंजाईश है कि क्या विज्ञापन को भी निगेहबानी में लाया जाना चाहिए। तर्क यह भी दिया जा सकता है कि जब एक तय  स्थान के लिए भारी रकम अदा की जा रही हो तब लोगों को उसके बदले अपने तौर-तरीकों से अभिव्यक्ति की आजादी हो, निश्चित  ही, पर इस आजादी के मायने क्या हों। इस बहस को आकार दिए जाने की जरूरत आज मौजूं है। केवल कीमत अदा भर कर देने का मतलब यह नहीं है कि अपने फायदे के लिए कुछ भी परोस दिया जाए। इसलिए जब इलेक्ट्रानिक उत्पाद बनाने वाली कंपनियां शादी-विवाह और दहेज को अपने उत्पाद खपाने में हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं तब दिक्कत होती है, जब कोरा मुनाफा कमाने वाली सेलुलर कंपनी खुद विज्ञापनों के जरिए खुद को पर्यावरण हितैषी करार देती है तब दिक्कत होती है, जब कंडोम कंपनी नितांत निजी मुद्राओं को विज्ञापन के जरिए सार्वजनिक करने पर आमादा होती है, तब दिक्कत होती है।  इस पूरे परिदृष्य में लगता है कि कहीं न कहीं खबरों की तरह ही विज्ञापनों पर भी नकेल कसने की जरूरत है।

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