सोमवार, अप्रैल 26, 2010

कोनी कुरैली यानी कुपोषण और पलायन


कोनी करौली गांव तक पहुंच पाना किसी कमाल से कम नहीं है। शुक्र यह था कि नदी में रास्ता रोकने लायक पानी नहीं था और गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर एक साहसी ड्राइवर सवार था। रीवा से सतना जाने वाली इस सड़क पर दस-बीस किमी की दूरी के बाद ही इक्का-दुक्का वाहन नजर आए। पहले हम पहुचे जवा। जवा एक ब्लॉक मुख्यालय है, लेकिन इसकी हालत एक कस्बे से अधिक नहीं है। मुख्य बस स्टैंड, बाजार की तस्वीरें यहां के पिछड़ेपन की हालत सापफ कह रहे थे। जवा बस स्टैंड पर ही हमने स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं रमेष भाई, सियादुलारी, छोटेलाल के साथ नाष्ता किया। रीवा से जवा की दूरी कोई सत्तर किमी होगी। और यहां से हमें फिर कोनी करोली गांव के लिए निकलना था। रास्ते भर किस्से-कहानियों का दौर चलता रहा। रमेष भाई ने बताया कि कैसे उन्हें स्थानीय लोगों के हितों की बात करने के लिए सरकार विरोधी कहकर नक्सली करार देने की कोषिषें भी की गईं। यही स्थिति मझगवां में प्रतीक भाई और आनंद भाई के साथ भी है। वहां उनसे सरकार ने आने-जाने वाले लोगों की जानकारी मांगनी शुरू की तो उन्हें मजबूरी में विजिटर्स बुक खरीदकर उसमें एंट्री करवाना शुरू कर दिया। मुझे लगता है कि यह एक बड़ी समस्या है।
उबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए जब हम मुख्य सड़क से एक दूसरी पगडंडी नुमा सड़क को हुए तो मानो किसी बीहड़ का अहसास होने जैसा था। वह तो ड्राइवर की बहादुरी ही थी जो इन कठिन और अनजान रास्तों पर भी चालीस डिग्री तापमान के बीच कुषलता के साथ सफर को मंजिल तक ले जा रहा था। उम्मीद नहीं थी पर हम बिना गाड़ी से उतरे कोनी कुरैली गांव में खड़े थे। उम्मीद इसलिए नहीं थी क्योंकि एक साल पहले विकास संवाद के दूसरे साथी प्रषांत भाई ने लंबा रास्ता पैदल तय करके अपनी कलम चलाई थी। इस गांव तक पहुंचने में तमस नदी सबसे बड़ी बाधा है। तमस का मतलब होता है अंधेरा। सचमुच तमस के पार विकास की रोषनी पहुंचना आसान नहीं था।

कोनी कुरैली गांव में पेड़ की छांव तले जब मेरी नजर मोबाइल की स्क्रीन पर गई तो पाया कि यहां पर पूरे कवरेज सिग्नल मिल रहे थे। सचमुच पिछले एक दषक के बाद ही संचार क्रांति का असर दूरदराज तक दिखाई देने लगा है पर क्या कारण है कि पिछले छह दषकों के बाद भी विकास संबंधी योजनाएं ऐसे क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पाईं। ऐसे कई इलाकों में लोगों को मोबाइल कंपनियों के टैरिफ तो याद हो जाते हैं, लेकिन जनलाभकारी योजनाओं की, जागरूकता की बातें याद नहीं रहतीं। बहरहाल कोनी-कुरैली गांव में गरीबी का आलम साफ नजर आ रहा था। रोजगार के अभाव में 125 परिवार वालें इस गांव के अधिकतर घर वीरान थे। हालांकि दरवाजों पर ताले नहीं पड़े थे, पर शायद उनकी जरूरत भी नहीं थी। गांव के प्रायमरी स्कूल के मास्टर हीरालाल त्रिवेदी उस दिन गांव में मौजूद थे, हालांकि गांव वाले भी उनकी इस मौजूदगी पर आष्चर्य प्रकट कर रहे थे। मास्टरजी का कहना था वह सर्वे करने के लिए गांव में घूम रहे हैं और आज स्कूल नहीं लगाया है। गांव की आरती ने बताया कि न हमें मिट्टी का तेल मिलता है न राषन, हमारे पास राषन कार्ड ही नहीं है। उन्होंने बताया कि जॉब कार्ड भी उन्होंने दौ सौ रूपए देकर खरीदा। पिछले साल उन्हें वन विभाग की ओर से कुछ काम मिला था। उसका भुगतान अब तक नहीं हो पाया है। गांव के शंकर सिंह पिता सहदेव सिंह ने बताया कि पंचायत में नब्बे राषन कार्ड ही बनाए गए हैं जिसमें से दस कार्ड केवल इस गांव के बने हैं। उसमें भी सवर्णों के कार्ड ज्यादा बने हैं, आदिवासियों के नहीं। जिनके पास राषन कार्ड है केवल उनको ही अनाज मिल पाता है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता सियादुलारी ने बताया कि एक साल पहले कुछ अखबारों में राषन कार्ड नहीं बनने को लेकर खबर छपी, इसलिए इतने कार्ड भी बन गए, नहीं तो इन दूरदराज के इलाकों में तो कोई पूछने भी नहीं आता। बात सरकारी राषन की दुकान हो या आंगनवाड़ी की, इन सबके लिए कोनी गांव के लोगाेंं को एक नदी पार करके जाना पड़ता है। और तो और

इसी बीच एक-एक कर गांव के कई लोग पेड़ के नीचे जमा हो चुके थे। कुछ बच्चे भी आए, कुछ बुजुर्ग भी। महिलाएं भी। आषीष नाम के बच्चे की आंखों पर काजल की एक मोटी सी रेखा चढ़ी हुई थी। लेकिन सबसे दर्दनाक था आदिवासी महिला सुषीला के बेटे अमित की हालत। लगभग तीन साल की उम्र का यह बच्चा दक्षिण अफ्रीका के अतिकुपोषित बच्चों की तरह ही नजर आ रहा था। इसमें उसका कोई दोष नहीं। खुद सुषीला ने बताया कि एक साल बाद ही दूसरा बच्चा हो गया, इसलिए इस पर ध्यान नहीं दे पाए। न तो उसे पेट भर दूध मिला और न अनाज। बहरहाल भर गर्मी में उसकी हालत देखकर तरस ही आ रहा था। मजबूरी यह थी कि उसका पिता उसी दिन मजदूरी के लिए गांव से जाने वाला था। आंगनवाड़ी की तरपफ से भी उसे कुछ नसीब नहीं हुआ। हमने बाद में जवां लौटकर ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर को अमित की हालत से अवगत कराया। उन्हें उसकी फोटो भी दिखाई। यहां हमें पता चला कि स्वास्थ्य विभाग और महिला बाल विकास ने जिले के बारह हजार बच्चों का सर्वे किया है। दिलचस्प आंकड़े यह आ रहे थे कि कुपोषण की स्थिति इस सर्वे के बाद लगभग 14 प्रतिषत थी। हमने डॉक्टर साहब से सवाल किया यह तो आपने कमाल कर दिया। उन्होंने बताया कि इसकी सही जानकारी दस्तावेज सहित महिला एवं बाल विकास से ही मिल पाएगी। वहां पहुंचें तो अधिकारी थे नहीं, मातहत कर्मचारी ने अपनी अक्षमता जाहिर कर दी।

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