कोनी करौली गांव तक पहुंच पाना किसी कमाल से कम नहीं है। शुक्र यह था कि नदी में रास्ता रोकने लायक पानी नहीं था और गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर एक साहसी ड्राइवर सवार था। रीवा से सतना जाने वाली इस सड़क पर दस-बीस किमी की दूरी के बाद ही इक्का-दुक्का वाहन नजर आए। पहले हम पहुचे जवा। जवा एक ब्लॉक मुख्यालय है, लेकिन इसकी हालत एक कस्बे से अधिक नहीं है। मुख्य बस स्टैंड, बाजार की तस्वीरें यहां के पिछड़ेपन की हालत सापफ कह रहे थे। जवा बस स्टैंड पर ही हमने स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं रमेष भाई, सियादुलारी, छोटेलाल के साथ नाष्ता किया। रीवा से जवा की दूरी कोई सत्तर किमी होगी। और यहां से हमें फिर कोनी करोली गांव के लिए निकलना था। रास्ते भर किस्से-कहानियों का दौर चलता रहा। रमेष भाई ने बताया कि कैसे उन्हें स्थानीय लोगों के हितों की बात करने के लिए सरकार विरोधी कहकर नक्सली करार देने की कोषिषें भी की गईं। यही स्थिति मझगवां में प्रतीक भाई और आनंद भाई के साथ भी है। वहां उनसे सरकार ने आने-जाने वाले लोगों की जानकारी मांगनी शुरू की तो उन्हें मजबूरी में विजिटर्स बुक खरीदकर उसमें एंट्री करवाना शुरू कर दिया। मुझे लगता है कि यह एक बड़ी समस्या है।
उबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए जब हम मुख्य सड़क से एक दूसरी पगडंडी नुमा सड़क को हुए तो मानो किसी बीहड़ का अहसास होने जैसा था। वह तो ड्राइवर की बहादुरी ही थी जो इन कठिन और अनजान रास्तों पर भी चालीस डिग्री तापमान के बीच कुषलता के साथ सफर को मंजिल तक ले जा रहा था। उम्मीद नहीं थी पर हम बिना गाड़ी से उतरे कोनी कुरैली गांव में खड़े थे। उम्मीद इसलिए नहीं थी क्योंकि एक साल पहले विकास संवाद के दूसरे साथी प्रषांत भाई ने लंबा रास्ता पैदल तय करके अपनी कलम चलाई थी। इस गांव तक पहुंचने में तमस नदी सबसे बड़ी बाधा है। तमस का मतलब होता है अंधेरा। सचमुच तमस के पार विकास की रोषनी पहुंचना आसान नहीं था।
इसी बीच एक-एक कर गांव के कई लोग पेड़ के नीचे जमा हो चुके थे। कुछ बच्चे भी आए, कुछ बुजुर्ग भी। महिलाएं भी। आषीष नाम के बच्चे की आंखों पर काजल की एक मोटी सी रेखा चढ़ी हुई थी। लेकिन सबसे दर्दनाक था आदिवासी महिला सुषीला के बेटे अमित की हालत। लगभग तीन साल की उम्र का यह बच्चा दक्षिण अफ्रीका के अतिकुपोषित बच्चों की तरह ही नजर आ रहा था। इसमें उसका कोई दोष नहीं। खुद सुषीला ने बताया कि एक साल बाद ही दूसरा बच्चा हो गया, इसलिए इस पर ध्यान नहीं दे पाए। न तो उसे पेट भर दूध मिला और न अनाज। बहरहाल भर गर्मी में उसकी हालत देखकर तरस ही आ रहा था। मजबूरी यह थी कि उसका पिता उसी दिन मजदूरी के लिए गांव से जाने वाला था। आंगनवाड़ी की तरपफ से भी उसे कुछ नसीब नहीं हुआ। हमने बाद में जवां लौटकर ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर को अमित की हालत से अवगत कराया। उन्हें उसकी फोटो भी दिखाई। यहां हमें पता चला कि स्वास्थ्य विभाग और महिला बाल विकास ने जिले के बारह हजार बच्चों का सर्वे किया है। दिलचस्प आंकड़े यह आ रहे थे कि कुपोषण की स्थिति इस सर्वे के बाद लगभग 14 प्रतिषत थी। हमने डॉक्टर साहब से सवाल किया यह तो आपने कमाल कर दिया। उन्होंने बताया कि इसकी सही जानकारी दस्तावेज सहित महिला एवं बाल विकास से ही मिल पाएगी। वहां पहुंचें तो अधिकारी थे नहीं, मातहत कर्मचारी ने अपनी अक्षमता जाहिर कर दी।
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