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वो कौन हैं जिन्हें बापू से इस हद तक नफरत है ?

 

छत्तीसगढ़ में एक सिरफिर के मुंह से बापू को ऊलजुलूल कहने का मामला भुलाने की कोशिश कर ही रहे थे कि बापू की मूर्ति को खंडित करने की ताजा तस्वीरों ने मन को फिर दुखी कर दिया। इस बार बात और अधिक संगीन इसलिए थी कि यह तस्वीरें उस जगह से आई जहां गांधी ने बहुत जमीनी और जरूरी काम शुरुआत की थी। बिहार की उस धरती को बहुत प्रेम और सम्मान के साथ देख रहे थे। वहां की रैयत के लिए वह जेल जाने को तैयार थे। गांधी की खंडित प्रतिमा उसी धरती से आज कई कई सवाल करती है ! जहाँ अहिंसा न करने के सिध्धांत का पालन सौ साल पहले हुआ, उसी धरती के लोग आज क्या संदेश देना चाहते हैं ?

यह 1917 का साल था और चम्पारण के किसान जमींदारों के अत्याचार से खासे परेशान थे, उन्होंने गांधी को आग्रह किया था कि वह यहां पर आएं, और किसानों की स्थिति को देखें। गांधी आए, आते ही अंग्रेज अधिकारी एल एस मार्शहेड को लिखा कि ‘नील की खेत के संबंध में बहुत कुछ सुन रखा है और उसकी वास्तविक स्थिति को जानने के लिए यहां आया हूं। अपना काम स्थानीय प्रशासन की जानकारी में और यथा संभव हो तो उनके सहयोग से करना चाहता हूं। स्वयं से जानने आया हूं कि उपयोगी सहायता दे सकता हूं सा कोई समझौता करवा सकता हूं।‘

गांधी अपने आप को खुला और पारदर्शी रखते हैं। इसलिए वह आसपास के गांवों में जमींदार के अधीन काम करने वाले लोगों का अध्ययन करते हैं। इस पहल से अंग्रेजी शासन को घबराहट होती है, एक गांव में जाते वक्त गांधी को रोक दिया जाता है, जिले से बाहर  निकल जाने का हुक्म दिया जाता है, लेकिन गांधी ने उसे मानने से इंकार कर दिया।

सहयोग के बजाए इस हुक्म से गांधी आहत हुए और उन्होंने मगनलाल गांधी को ​उसी दिन लिखे पत्र में यह भी लिखा कि ‘उन्होंने इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि जिस बिहार में भगवान रामचंद्र भरत जनक और सीता ने विहार किया उसी जगह वह जेल में जाएंगे।‘ गांधी ने लिखा ‘यह प्रदेश देखने लायक है। गंर्मी कम है, लेकिन लोग बहुत गरीब हैं,  जिस प्रदेश में रामचंद्र ने रमण भ्रमण और पराक्रम किया चहां की यह कैसी दुर्दशा है ?

सौ सालों बाद भी बिहार की दशा क्या तो सुधरी ? दारिद्रय केवल धन का ही दूर नहीं हुआ, लगता है बुद्धि की दरिद्रता भी बढ़ गई, सौ साल पहले बिहार के लोगों ने संकट के समय में दूर बैठे गांधी को आग्रह करके बुलाया, उनकी सहायता ली, उनके ​अहिंसा के कथन को विपरीत परिस्थितियों के बीच भी माना, लेकिन सौ सालों बाद जब संकट जीवन—मरण का नहीं है, गरीबी भी कमोबेश वैसी नहीं है, तब यह कौन सा समाज है जो गांधी प्रतिमा के साथ हिंसा पर उतारू है। उसे अपनी धरती पर गांधी प्रतिमा भी बर्दाश्त नहीं है ?  

 अब न तो गांधी वहां पर कोई आंदोलन कर रहे हैं, वह बस अपने सत्य और अहिंसा के संदेश को देते हैं। और उनकी प्रतिमा कोई बिहार भर में तो नहीं है। दुनियाभर में किसी मानव की सबसे ज्यादा प्रतिमा लगी है तो वह गांधी ही है।

अंग्रेज कमिश्नर को यह अंदेशा था कि गांधी चम्पारण में कोई आंदोलन करने आए हैं, लेकिन गांधी ने इस बात का खंडन किया और जिला मजिस्ट्रेट को अपने वक्तव्य में कहा कि ​कमिश्नर यह सोचते हैं कि उनका मकसद कोई आंदोलन करना है, लेकिन ऐसा नहीं है बापू ने कहा कि ‘​मेरी विशुदध और एकमात्र इच्छा जानकारी प्राप्त करने का वास्तविक प्रयत्न करना है। और जब तक मुझे मुक्त रहने दिया जाएगा तब तक मैं अपनी इस इच्छा के अनुसार काम करता रहूंगा।‘ उन्होंने वायसराय के निजी सचिव मैफी को पत्र लिखा और बताया कि जो हुक्म उन पर तामील किया गया है उसका वे पालन नहीं कर सकते और इसके लिए हर सजा भुगतने को तैयार हैं।

हो सकता है कि आज ये बातें पढ़कर मूर्ति तोड़ने वाले का मन पसीजे और उन्हें समझ आए कि गांधी उनके पुरखों के संकटों के लिए किस सीमा तक संघर्ष करने को तैयार थे। यहां तक कि मैफी को कैसर ए हिंद स्वर्ण पदक भी वापस करने का प्रस्ताव लिख दिया जो उन्हे दक्षिण अफ्रीका में बेहतर मानवीय हितों के काम के लिए दिया गया था। गांधी ने लिखा कि ‘मेरा हेतु राष्ट्रसेवा है और वह भी उसी हद तक जिस हद तक वह मानवीय हित से मेल खाती हो।‘

गांधी ने तमाम दबावों के बावजूद चम्पारण में अपना अध्ययन जारी रखा, तकरीबन चार हजार काश्तकारों से बातचीत की और पाया कि जमींदारों ने काश्तकारों का नुकसान पहुंचाकर स्वयं धनी बनने में दीवानी और फौजदारी दोनों कानूनी अदालतों तथा गौर कानूनी ताकतों का प्रयोग किया हैं काश्तकार आतंक में दिन गुजार रहे हैं। उनकी संपत्ति, उनके शरीर और उनके मन सब जमींदारों के पैरों तले कुचले जा रहे हैं।

लेकिन इसके बावजूद अपने कार्यकर्ताओं को इस बात के लिए निर्देशित किया कि वह यह सुनिश्वित करें कि किसी भी स्थिति में किसी भी प्रकार की हिंसा का सहारा नहीं लें, भले ही किसानों को जेल भेज दिया जाए। यह गांधी थे और उनके संघर्ष के तरीके थे, जिससे उन्होंने अंग्रेजी शासन को हिलाकर दिखा दिया। एक वह गांधी की अगली पीढ़ी है जो गांधी की निर्जीव प्रतिमा पर अपना जौहर दिखा रही है। यह साहस है या कायरता है ? 

साहस तो वह था जो गांधी ने जिला मजिस्ट्रेट को यह स्पष्ट किया कि उन्होंने धारा 144 की उदूली करने और जिले से बाहर चले जाने की अवज्ञा का संगीन काम क्यों किया ? उन्हेांने बताया कि ‘मैं उस प्रांत में मानव जाति और राष्ट्र की सेवा करने के इरादे से प्रविष्ट हुआ हूं। मुझे यहां आने और रैयत की सहायता करने का जो आग्रहपूर्ण आमंत्रण भेजा गया था उसी को स्वीकार करने मैं यहां आया हूं। रैयत का यह कहना है कि बागान मालिक उनके साथ उचित व्यवहार नहीं करते हैं। मामले को पूरी तौर पर समझे बिना मेरे लिए उसकी सहायता करना कियी प्रकार से संभव न था।‘

गांधी ने कहा कि ‘इस बयान का मसकद किसी प्रकार की रियायत दिलाना नहीं है बल्कि यह जताने के लिए है कि जो हुक्म मुझे दिया गया है उसे न मानने का कारण सरकार के प्रति आदर भाव में कमी नहीं बल्कि अपने जीवन के उच्चतर विधान अंतरात्मा के आदेश का पालन था।‘ अंग्रेजी सरकार ने मुकदमा वापस ले लिया और इस मामले पर जांच के दौरान अधिकारी मदद करेंगे यह आश्वासन दिया।

अब हमारे देश की अपनी सरकार है। सब हमारे अपने लोग हैं। देश तरक्की की राह पर जा रहा है। शर्म की बात है कि देश में अब बापू के अपमान के लिए मुकदमे चल रहे हैं।


राकेश कुमार मालवीय

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