“मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा जिसमें गरीब से गरीब लोग भी यह महसूस कर सकें कि यह उनका देश है, जिसके निर्माण में उनकी आवाज का महत्व है। मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा जिसमें उंचे और नीचे वर्गों का भेद नहीं होगा। और जिसमें विविध संप्रदायों के लिए पूरा मेलजोल होगा। ऐसे भारत में अस्पृश्यता के या शराब और दूसरी नशीली चीजों के अभिशाप के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। उसमें स्त्रियों को वही अधिकार होंगे जो पुरषों को होंगे।“
बापू की इन बातों को आज गांव के अंतिम व्यक्ति से पूछा जाए कि क्या वाकई उनको
लगता है कि देश के निर्माण में उनकी बातों को सुना जाता है ? क्या उन्हें लगता है
कि वह इस देश को बना रहे हैं ? इसका जवाब उत्साह से नहीं आता। उस आम आदमी की हैसियत एक वोट
से ज्यादा की नहीं हो पाई है। निर्माण में वे भागीदार नहीं होते, वह उन पर थोपा
जाता है, देश लालफीताशाही के उस चंगुल
से आजाद नहीं हो पाया है, बल्कि भ्रष्ट तंत्र ने उसे ऐसा बना दिया है, जिसमें तकरीबन हर दिन किसी न किसी अधिकारी, कर्मचारी, सरपंच के घर छापा पड़ने या रंगे हाथों रिश्चत लेते पकड़े जाने की खबर छप रही
है। यह तो गांधी के सपनों का भारत नहीं है !
दूसरे छोर से नीति निर्माण में लोगों की भागीदारी को तौलें तो व्यवस्था ने यह
मान लिया है कि देश में अंतिम व्यक्ति तक इंटरनेट और कम्प्यूटर की पहुंच हो गई है, इसलिए जितनी भी नीतियां बनाई जाती हैं, उन्हें इंटरनेट के माध्यम
से सलाह—मशविरे तक समेट दिया गया है। चूंकि लोकतंत्र है तेा इतनी रस्मअदायगी तो
करनी ही पड़ेगी, और हम यह भी देख रहे हैं कि कानून को बनाने में
भी एक बड़े वर्ग की असहमति होने के बावजूद उसे लागू कर दिया जाता है, आज हजारों किसान
सड़कों पर क्यों हैं ? सवाल अब यह नहीं है कि कृषि कानून गलत हैं या सही है, उससे बड़ा सवाल यह है कि साल भर के विरोध के बाद बातचीत के रास्ते बंद हैं। यह
तो गांधी के सपनों का भारत नहीं है !
यह आजाद हिंदुस्तान है, इसलिए इतना लंबा कोई भी संघर्ष बापू की आत्मा
को दुखी करता होगा कि यहां पर लोगों की आवाज को अनसुना किया जा रहा है। अब यह एक
दूसरे पर भरोसे का संकट भी बन गया है। यह तो गांधी के सपनों का भारत नहीं है !
हम जैसा सबका साथ और सबका विकास का नारा लगाते हैं, उसके विपरीत अमीरी—और गरीबी के आंकड़े कुछ और तस्वीर सामने लाते हैं,
गाँधी कहते हैं कि ‘आर्थिक समानता अहिंसापूर्ण स्वराज की चाबी है’
पर आक्सफेम की रिपोर्ट बताती है कि देश की आधी से ज्यादा संपत्ति तो गिने—चुने लोगों के पास है, अस्सी करोड़ की आबादी अब भी सरकार के सस्ते अनाज पर जिंदा है। उस एक गरीब आदमी के लिए पांच किलो अनाज भी महीने भर के लिए कम पड़ जाता है और बकौल गाँधी ‘गरीब के लिए तो रोटी ही अध्यात्म है’। पर देश में रोटी से ज्यादा धरम के झगड़े हैं ! यह तो गांधी के सपनों का भारत नहीं है !
गांधी कहते हैंकि
‘जब तक एक भी सशक्त आदमी ऐसा हो जिसे काम न मिलता हो या भोजन न मिलता हो, तब तक हमें आराम करने या भरपेट भोजन करने में शर्म महसूस होनी चाहिए।‘सांप्रदायिक सदभाव की बात तो किसी से छिपी नहीं है। आज जिस तरह से राजनीति ने
संप्रदाय और धर्मों का अपने—अपने हितों के लिए उपयोग किया है, उसके दुष्प्रभाव समाज में तरह—तरह की नफरतों के रूप में देखने को मिल ही रहा
है। आजाद भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ कि लोगों को इतने ज्यादा खांचों में बांट कर
रख दिया हो और एक—दूसरे के साथ किसी तरह का व्यवहार करने तक में यह जांचा जा रहा
हो कि अमुक आदमी किसी धर्म का है। धर्म और संप्रदाय के आधार पर उसे दोषी या
निरपराध माना जा रहा हो, यह तो गांधी के सपनों का भारत नहीं है !
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