टिकर

5/recent/ticker-posts

बच्चों के साथ अपराधों पर क्यों खून नहीं खौलता

 



हैरान करने वाली बात है कि मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बच्चों के सबसे संवेदनशील नेता हैं, और दूसरी तरफ उनके ही प्रदेश में बच्चों के साथ सबसे ज्यादा अपराध होते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2020 की रिपोर्ट में एक बार फिर बच्चों के साथ अपराध के आंकड़ों ने प्रदेश का नाम खराब कर दिया है। इन आंकड़ों ने एक बार फिर चिंता में डाल दिया है कि जैसा इस प्रदेश को बच्चों के मामले में राजनैतिक रूप से संवेदनशील बताया जाता है, क्या वास्तव में बच्चों को संरक्षण देने का काम किया जा रहा है या योजनाएं, नियम, कानून और समाज में जागरुकता लाने का पूरा काम हवा—हवाई है।

एक ऐसे वर्ष में जिसमें एक बड़ा हिस्सा कोविड 19 के लॉकडाउन और एक अजब किस्म के डर में बीता, तब भी बच्चों के साथ अपराधों में कोई कमी नहीं आई है। इसमें भी शांति के टापू कहे जाने वाले मध्यप्रदेश में तो बच्चों के साथ अपराध और भी बढ़ गए हैं। आईये एक नजर डालते हैं कि एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट क्या बताती है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कोरोनाकाल में एमपी में सबसे ज्यादा 8751 बच्चे लापता हुए हैं इनमें 7230 लड़कियां हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं को बच्चों को घोषित तौर पर मामा बताते हैं।

उन्होंने लाड़ली लक्ष्मी जैसी योजनाएं चलाई हैं, जिन्हें बाद में दूसरे राज्यों में भी लागू किया गया है। उनके नेतृत्व में लाड़ो अभियान जैसे कवायद से बाल अपराध जैसी प्रवृत्तियों पर भी लगाम कसने की भरसक कोशिश हुई है। वह ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने सरकारी आयोजनों की शुरुआत कन्यापूजन से की है। वह दावा करते हैं कि अपराधियों को बख्शेंगे नहीं इसके लिए या तो जमीन में गडढा खोदकर गाड़ देने से लेकर साथ में डंडा लेका चलने का बयान देते हैं, वह ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने नाबालिग बच्चों के साथ बलात्कार किए जाने पर देश में सबसे पहले फांसी का कानून बनाकर लागू कर दिया,

लेकिन, लेकिन, लेकिन, यदि एमपी में बच्चों पर हुए अपराधों पर एक नजर डालें तो पता चलता है कि हत्या के 144 मामले इस साल की रिपोर्ट में दर्ज हैं। हत्या और बलात्कार के 13 मामले सामने आए, जबकि 131 और बच्चों की मौतें दर्ज हुईं जो धारा 302 के अलावा हैं। 36 बच्चों की हत्या का प्रयास किया गया, 17 मामले भ्रूण हत्या के सामने आए, 1485 बच्चों के साथ मारपीट हुई, 176 और मामले गंभीर मारपीट के थे। अपहरण के 7058 मामले बने हैं, अपहरण और लापता होने के 3686 मामले हैं, अन्य अपहरण के 2364 मामले और हैं। लड़कियों की खरीद और बिक्री के 32 मामले हैं, जबकि हयूमन ट्रैफिकिंग के 25 मामले सामने आए, दस नाबालिग बच्चों से बलात्कार और 11 बच्चों के साथ दुराचार का प्रयास किया गया। पोक्सो में 5648 केस दर्ज हुए वहीं साइबर क्राइम में भी 24 मामले बने हैं।

होना तो यह चाहिए था कि प्रदेश में बच्चों के साथ अपराध की ऐसी तस्वीर सामने आने पर एक आपात बैठक बुलाई जाती और लगातार चिंतन करके इसे बदलने के लिए एक बड़ा मंथन होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आजकल काम करने से ज्यादा उस काम को इवेंट में बदले जाने और उसे विज्ञापन में तब्दील किए जाने की कवायद अधिक होती है, इसलिए उन आंकड़ों को ज्यादा तवज्जो ही नही दी जाती, जिनसे सरकार की छवि खराब होती है। हालांकि यह मसला सरकार से ज्यादा समाज की छवि खराब होने से जुड़ता है। बच्चों से अपराधों के मामले में हम एक बर्बर और आदिम युगीन समाज में ही जीते हुए लगते हैं, जो किसी भी तालिबानी समाज से ज्यादा घातक है।

ऐसा नहीं है कि यह पहली बार पता चल रहा हो कि मध्यप्रदेश में बाल संरक्षण की हालात इतनी ज्यादा खराब है। एनसीआरबी की रिपोर्ट हर साल सामने आती है और हर साल ही उसमें शर्म करने लायक आंकड़े आते हैं, पर हमारे समाज को शर्म बची हो तब तो। वह ऐसी संप्रदाय और धर्म के विषयों पर तो फौरी मुखर हो जाता है, लेकिन यहां पता नहीं क्यों उसका खून उबाल नहीं मारता है ?

मामला नया नहीं है। इस सदी की शुरुआत के सोलह सालों में अब तक देश में बच्चों के विरुद्ध अपराध के 595089 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। इनमें से 290553 यानी 49 प्रतिशत मामले 2014 से 2016 के बीच में ही घटित हुए हैं। इस अवधि में बच्चों के प्रति अपराध के मामलों में 54 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। बच्चों के विरुद्ध जितने मामले दर्ज हुए उनमें से 153701 मामले (26 प्रतिशत) बलात्कार-यौन शोषण और 249383 मामले (42 प्रतिशत) अपहरण के ही थे। इन सोलह सालों में अपहरण की मामलों में 1923 प्रतिशत और बलात्कार-गंभीर यौन अपराधों में 1705 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अगर इन सोलह सालों में मध्यप्रदेश की स्थिति को देखा जाए तो प्रदेश में इस श्रेणी यानी बच्चों के साथ बलात्कार  के मामलों में प्रदेश पूरे देश में अव्वल रहा है। यहां पर 23569 मामले दर्ज किए गए।

क्या यह वक्त काफी नहीं था जब साल दर साल घातक जा रही स्थिति को थोड़ा संभाला जाता, लेकिन जब समाज ही इन विषयों पर मुखर नहीं होता तब किसे पड़ी है कि इनको तवज्जो दी जाए। साल में एकाध दिन रिपोर्ट आती है, और भुला भी दी जाती है। अगले साल भी एक और रिपोर्ट जारी हो जाएगी, किसे फर्क पड़ता है ?

 राकेश कुमार मालवीय

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ