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एमपी में नए कारखानों का भूमिपूजन, लेकिन पुराने क्यों हो रहे बंद



पिछले दिनों एमपी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिस शहर में कपड़े की मिल्स का उदघाटन करके कोरोनाकाल में ध्वस्त हुई अर्थव्यवस्था और रोजगार को संजीवनी पिलाने की कवायद कर रहे थे, उससे डेढ़ सौ किलोमीटर दूर एक कारखाने के तकरीबन हजार से ज्यादा मजदूर अपनी बंद पड़ी कपड़ा फैक्ट्री को चालू करवाने की मांग लेकर गेट पर धरना दे रहे थे। कर्मचारी चाहते हैं कि कंपनी में कामकाज चालू हो, पर कंपनी उन्हें वीआरएस का आफर देकर अपना पिंड छुड़ाना चाहती है। इस आंदोलन को अब देश के विभिन्न संगठनों—आंदोलनों का भी साथ मिल गया है। 

नए कारखानों के भूमिपूजन और पहले से स्थापित कारखानों को चालू करने की मांग से विचित्र स्थिति बन रही है, अजीब बात है कि एक तरफ नए उदयोगों को जमीनें आवंटित कर प्रोत्साहित किया जा रहा है दूसरी ओर बंद कारखानों को चालू करने को लेकर कोई हस्तक्षेप नहीं है। 

महाकाल की नगरी उज्जैन को एक नए औद्योगिक केन्द्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसकी शुरुआत के रूप में सीएम ने होजरी कारखाने का भूमिपूजन किया। अगले कुछ महीनों में छह और कारखाने शुरू हो जाएंगे। दावा किया जा रहा है कि इससे तकरीबन बारह हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। रोजगार में ज्यादा हिस्सेदारी महिलाओं की होगी। उदयोगों के निवेश की यह पहली कवायद नहीं है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के लगभग हर कार्यकाल में इंवेस्टर्स मीट करके देश भर से उदयोगों को एमपी आने का न्यौता देते रहे हैं। कई उदयोग आए भी, लेकिन बहुत सारे उदयोग एमओयू करने के बाद भी अब तक जमीन पर नहीं उतर पाए हैं। 

दूसरी ओर मध्यप्रदेश में पलायन की बहुत बड़ी समस्या रही है जो कोविड के बाद और भी बड़ी हो गई है। बुंदेलखंड, बघेलखंड, विंध्य, निमाड़, मालवा, तकरीबन हर क्षेत्र से बड़ी संख्या में मजदूर पलायन करके दूसरे राज्यों में जा रहे हैं। पिछले साल कोविड की लहर में इसका एक रूप देखने को मिला था, जब हजारों की संख्या में मजदूर पैदल चलकर अपने घरों को लौटे थे। इसकी बड़ी वजह स्थानीय स्तर पर रोजगार का नहीं मिलना है। मनरेगा का ढुलमुल क्रियान्वयन भी मजदूरों को मनरेगा में काम करने से हतोत्साहित करता है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि स्थानीय स्तर पर भी छोटे उदयोग धंधों को प्रोत्साहित किया जाए। इस रूप में मप्र सरकार की यह कोशिश अच्छी है, लेकिन सवाल यह है कि इसी प्रदेश में दूसरे कारखानों के बंद करने पर वह हस्तक्षेप क्यों नहीं कर सकती। आखिर ऐसे उदयोगों की समीक्षा क्यों नहीं की जाती है। 

अजीब बात है कि खरगोन जिले में सेंचुरी यार्न और डेनिम का कारखाना मजदूर चलाते रहना चाहते हैं, क्योंकि वह चाहते हैं कि उन्हें इससे रोजगार मिलता रहेगा, लेकिन कंपनी इसके लिए राजी नहीं है। 2017 से इस कंपनी में उत्पादन ठप्प पड़ा है। इन कंपनियों में तकरीबन नौ सौ नियमित कर्मी और छह सौ से ज्यादा ठेकाकर्मी काम करके अपने परिवार पालते थे। यह मजदूर पिछले 44 महीनों से लगातार कारखाने के दरवाजे पर धरना दे रहे हैं, जनप्रतिनिधियों से अपील कर रहे हैं,  इसके लिए कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा चुके हैं। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उन्हें वेतन आदि भी नियमित रूप से देना पड़ रहा है, लेकिन कंपनी अपना काम शुरू नहीं कर रही। 

आंदोलन करने वाले संगठन के प्रतिनिधियों ने दावा किया है कि इस कंपनी ने कोविड काल में भी अपने बहीखातों में लाभ को दर्शाया है, फिर आखिर क्या वजह है कि जिस प्रदेश में होजियारी और दूसरे कपड़ों के कारखानों को पलक—पांवड़े बिछाकर प्रोत्साहित किया जा रहा है, उसी प्रदेश में एक स्थापित कारखाना मांग करने के बावजूद चालू नहीं किया जा रहा है। 

मप्र के संवेदनशील मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस बात को समझना चाहिए। आखिर उन्होंने उज्जैन में उदघाटन करते हुए यह कहा भी कि निवेश ऐसे ही नहीं आ जाता, उसके पीछे बड़ी मेहनत लगती है। उन्होंने खुद ही कहा कि उज्जैन आने वाली कंपनियों को वे पिछले चार सालों से लगातार निवेश के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे, तब जाकर यह उपलब्धि हासिल हुई, उन्हें जाकर बंद होने जा रहे कारखानों से भी पूछना चाहिए कि उन्हें क्या दिक्कत है, और वे कैसे इस दिक्कत को दूर कर सकते हैं जिससे कारखाना चलता रहे और हजारों मजदूरों को वीआरएस की कुछ रकम लेकर घर न बैठना पड़े। 

 बात केवल सेंचुरी कारखाने की ही नहीं है। मध्यप्रदेश में ऐसे कई उदयोग हैं जिन्हें भारी—भरकम निवेश करके लगाया गया था, लेकिन वह धीरे—धीरे बंद होते गए। होशंगाबाद जिले के बनापुरा में तिलहन संघ का सोयाबीन प्लांट भी एक समय रोजगार की बड़ी उम्मीद लेकर आया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के कार्यकाल में स्थानीय विधायक हजारी लाल रघुवंशी ने इसे अपने गृहनगर में स्थापित करवाने में सफलता हासिल की। सोयाबीन की बंपर पैदावार के बाद यह कुछ साल चला भी, लेकिन एशिया का सबसे बड़ा सोयाबीन प्लांट पिछले बीस सालों से ज्यादा से बंद पड़ा है। उसकी बड़ी—बड़ी मशीनें खराब होती चली गईं, इन पंद्रह सालों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इस कारखाने को चालू करवाने की कोई कवायद नहीं की, नतीजा आज यह एक गोडाउन बनकर रह गया है। जो प्रदेश देश में सबसे ज्यादा सोयाबीन पैदा करता है, वह प्रदेश सोयाबीन प्रोसेसिंग का एक प्लांट चलवा पाने में अक्षम है। 

मप्र में ऐसे तमाम बंद पड़े उदयोग जो थोड़ी सी कोशिश से चल सकते हैं, उनकी समीक्षा भी की जानी चाहिए। कोरोना काल में यह बहुत जरूरी हो गया है। 

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