राकेश कुमार मालवीय
क्रिसमस के दिन हमारे देश के सांता नरेन्द्र मोदी नौ करोड़ किसानों को सिंगल क्लिक के जरिए उपहार सम्मान राशि देने जा रहे हैं। अर्श से देखकर 18 हजार करोड़ की यह राशि भारी—भरकम लगती है, फर्श से देखने पर हर दिन गरीब किसानों को पंद्रह रुपए रोज का आंकड़ा नजर आता है। पंद्रह रुपए में पाव भर दूध मिल सकता है, एक सेवफल और दो अमरूद मिल सकते हैं, किसी शहर की सामान्य होटल में आदमी दो रोटी एक कप चाय में डुबोकर खाई जा सकती है, पंद्रह रुपए का डीजल ट्रेक्टर में डालने से वह दो चार किलोमीटर आगे बढ़ सकता है बस... लेकिन भारतीय समाज में दान की गाय के दांत नहीं गिनने की परम्परा है। सम्मान को उपकार के भाव से देखा जाता है। और इस उपकारिता में जो मिले, जितना मिले वह अपने हासिल से ज्यादा लगता है, इसकी अलग ही खुशी होती है। देश के करोड़ों किसानों को कल ऐसी ही भावना मन में आएगी। कुछ के मन में यह बात भी आएगी कि वह मांग तो समर्थन मूल्य रहे हैं और सरकार उन्हें सम्मान देने जा रही है। यदि सही समर्थन दे दिया जाएगा तो शायद सम्मान की ऐसी जरुरत नहीं पड़ेगी, खैर।
पीएम किसान योजना के पहले देश में सामाजिक सुरक्षा देने के लिए पेंशन राशि की तमाम योजनाएं थीं, जिनसे समाज के सबसे कमजोर वर्ग के लोगों को सहायता राशि दी जाती थी। इनमें सबसे कमजोर और जरुरतमंद लोग शामिल रहे। किसानों को इस तरह से खातों में सीधे रकम पहुंचाने का विचार पहली बार आया। इससे पहले किसान अप्रत्यक्ष रूप से सब्ििसडी या कर्ज में रियायत के रूप में लाभ लेता रहा है। वह मौसम की तरह ही अनिश्चित और सरकार की कृपा पर रहा। पीएम किसान सम्मान निधि योजना पहली बार एक व्यवस्थित रूप में आई, इसे सम्मान के पेपर में लपेटकर पेश करने से उम्मीदें और बढ़ गईं। एक पारदर्शी व्यवस्था बनाई तो गई, जिसमें किसान अपना आया—गया हिसाब देख सकता है। किसानों को अपनी आय दोगुनी होने की उम्मीदों को और बल मिला।
इसके बावजूद इसे और बेहतर बनाने के लिए काम किया जाना बाकी है। इसके लिए यहां किसानों से जमीनी बातचीत के आधार पर कुछ विचार और हकीकत निकलकर आ रही हैं।
समय:
योजना का लाभ देना अच्छी बात है, पर यदि इसे सही समय पर दिया जाए तो इसका उपयोग सही जगह होने की संभावना बढ़ जाएगा। 25 दिसम्बर ऐसी तारीख तक तकरीबन सभी किसानों की फसल बोहनी हो चुकी है, और अब उन्हें बड़ी रकम की जरुरत फसल काटने के वक्त पड़ेगी। इस बीच खाद—पानी के जो खर्चे होते हैं, उनकी व्यवस्था किसान पहले ही कर लेता है। इस समय रकम देने से वह दीगर खर्चों और व्यसनों पर पर खर्च होने की आशंका होती है। भारतीय समाज में दारू कितनी बड़ी समस्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। जाहिर तौर पर यदि ऐसे समय में यह रकम दी जाएगी तो बड़ी संभावना इस बात की है कि सम्मान निधि का सदुपयोग नहीं हो पाएगा।
किसी और के नाम पर खाता न हो:
कई जगह यह भी देखने में आया है कि जिन महिला किसानों के नाम पर खेती है, उनके नाम पर खेत का तो पंजीयन है, आधार कार्ड भी महिला का है, लेकिन खाता उनके पति का दर्ज है। ऐसे में महिला किसानों को उनका वाजिब हक नहीं मिल पाएगा, पैसे को खर्च करने में उनका निर्णय और अधिकार का दायरा कम होगा। वास्तव में यह सम्मान उन्हें ही दिया जाना चाहिए जो खेत में श्रम कर रहे हैं। बटाईदार या जो लोग छोटे—छोटे खेत किराये पर लेकर खेती करते हैं, उन्हें भी सरदार पटेल किसान मानते थे, सरदार पटेल की मंशानुरूप उन्हें सम्मान देना चाहिए।
पंचायत में लगाई जाए सूची :
भारत में डिजिटल डिवाइड की खाई अब भी बहुत गहरी है। दूरस्थ इलाकों तक इंटरनेट का पहुंचना, और उसके उपयोग का ज्ञान अब भी दूर की कौड़ी बना हुआ है। सरकार ने पीएम किसान पोर्टल पर गांववार—किसानवार सूचनाएं दर्ज करके ऐतिहासिक काम किया है, इसके बावजूद लोग वंचित हैं और उनके अधिकारों की जानकारी उन तक नहीं पहुंच पा रही है। ऐसे में इन्हीं सूचनाओं का गांवों तक कागजी रूप में पहुंचना जरूरी लगता है। जो सूचना पोर्टल पर है वही सूचना गांव में पंचायत की दीवारों पर चस्पा करके पारदर्शी प्रशासन को मजबूत बनाया जा सकता है।
पटवारी और व्यवस्था को जवाबदेह बनाया जाए :
लालफीताशाही अब भी एक बड़ा संकट है। मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री कमल पटेल ने एक साक्षात्कार में इसे स्वीकार भी किया है। जमीनी अनुभव यह कहता है कि किसानों के प्रति सरकार का सिस्टम अब भी जवाबदेह नहीं है। उन्हें अधिकारों से वंचित होने का कोई जवाब कहीं से नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में व्यवस्था को जवाबदेह बनाया जाना बहुत जरूरी है। एक कोशिश यह भी हो सकती है कि जिन लोगों को पोर्टल पर सभी किस्तें नहीं मिल पा रही हैं, वहां पर उनके नहीं मिलने का कारण भी दर्ज किया जाए।
सम्मान नहीं समर्थन मूल्य पहले जरूरी :
किसान किसी भी सम्मान से पहले अपनी फसल का समर्थन मूल्य चाहते हैं। फसलों का समर्थन मूल्य घोषित जरूर है, लेकिन जब तक सरकार उस मूल्य पर खरीदी नहीं करती तब तक किसानों को वह मिलना मुश्किल हो रहा है। मप्र में सरकार ने भावांतर योजना के जरिए समर्थन और सम्मानजनक मूल्य देने की कोशिश की थी, लेकिन यह योजना उस तरह से परवान नहीं चढ़ सकी है। यदि दिल्ली में ताजा आंदोलन को छोड़ भी दिया जाए तो समर्थन मूल्य देश के किसानों के एजेंडे में हमेशा से रहा है। यदि वास्तव में लागत की तुलना में किसानों को लाभकारी समर्थन मूल्य का वायदा और जमीनी क्रियान्वयन दे दिया जाए तो उससे बड़ा सम्मान कुछ और नहीं होगा।
0 टिप्पणियाँ