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साल के खास दिन 100 रुपए किलो मिलती है यह चीज

रीवा से जयकुमार की रिपोर्ट

जंगल और लोगों का आपस में क्या रिश्ता होता है इसे आप इस छोटे से उदाहरण से समझ सकते हैं। जंगल कभी लोगों को भूखा नहीं रख सकता और वह लोग जिनका जंगल से इस तरह का सघन रिश्ता रहा है वह भी जंगल के प्रति कभी क्रूर व्यवहार नहीं करते। वह जंगल से उतना ही प्राप्त करते हैं, जिसकी उन्हें जरूरत होती है।

विकास को हम आज पागल करार दे रहे हैं वास्तव में विकास का पागलपन बहुत पहले से शुरू हुआ है और उसी ने इस प्रकृति और इंसान के इस ताने—बाने को बर्बाद कर ​दिया है।

यह कुशुमकली हैं। रीवा जिले की निवासी। मेहनत—मजदूरी से अपना घर चलाती हैं, लेकिन इसी बीच इनकी दिनचर्या में ऐसे काम भी शामिल हैं जो इनकी खाद्य और पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित करते हैं।


जब यह मजदूरी करने नहीं जातीं तो यह जंगल से" फसही" की धान इकट्ठा करके लाती हैं। ये मुख्यतः सितम्बर माह में पाई जाती है, जब बारिश बंद हो जाती है और यह धान पक जाती है।

ये जंगलों के पोखर में मिलने वाली धान है। ये धान प्रकृति द्वारा मानव को उपहार में मिलती क्योंकि इसे तैयार करने में इंसान को मेहनत नही करनी पड़ती।

केवल बारिश के बाद वाले समय में जंगलों से इकठ्ठा करके लाना पड़ता है। इसके बाद इसे सुखा कर धान को कूटने के पश्चात बड़े ही चाव से इसका स्वाद लिया जाता है। यह स्वाद में बेहद अच्छी और पोषण से भरपूर होती है।

इस धान का धार्मिक महत्व भी है। समाज में हल षष्टी के दिन सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है,क्योंकि इस दिन महिलाएं उपवास के दौरान इस धान के चावल को ही खाती हैं।

उन दिनों ये धान 100 रुपये किलो में मिलती है। आम दिनों में इसकी कीमत बाजार में 40-50 रुपये में होती है। जिसे वनवासी समुदाय अपनी आजीविका के लिए इसे जंगलों से इकठ्ठा करके जीवन यापन कर रहे हैं।

"फसही"धान भी परम्परा धानो जैसे कोदो, कुटकी, सामा, गवर्वा, इत्यादि की नस्लो में से एक धान है। यह वन क्षेत्रों में तालाब नुमा  पोखर, नमी वाली जगहों पर स्वयं से उगती है। इस धान के बाली  नुकीली होती है। जिसके कारण पशु नुकसान नही पहुँचा पाते जिसके कारण यह सुरक्षित रहती है।

हालाकि इसके उत्पादन क्षमता में कमी होने लगी है। क्योंकि लोग इस धान की पूरी बाली इकट्ठा कर रहे हैं जिसके कारण जमीन में बीज नही गिरने पाता, तो ये आगे विलुप्त भी हो सकती है। 


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