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News18: किसान रेल से कितना भला होगा किसानों का ?

राकेश कुमार मालवीय

देश में पहली बार अब किसानों की रेल होगी। आम बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की इस घोषणा को रेल मंत्रालय ने अमली जामा पहना दिया है। तकरीबन 1500 किलोमीटर से ज्यादा का सफर यह महज 32 घंटों में तय कर लेगी, इस लिहाज से हर घंटे 45 से 50 किलोमीटर का सफर तय करेगी, यानी इसकी स्पीड के मामले में यह यात्री गाड़ियों को टक्कर देने वाली है। इस तेजतर्रार रेलगाड़ी से किसानों की जल्दी खराब होने वाली फलसब्जियां अब एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच सकेंगी। इसके लिए ​रेल मंत्रालय ने विशेष कोच तैयार किए हैं, जिनमें किसानों के उत्पाद खराब नहीं होंगे।

केन्द्रीय रेलमंत्री पीयूष गोयल और कृषि मंत्री नरेन्द्र तोमर की यह मिलीजुली पहल से किसानों के चेहरों पर अपने उत्पादों को लेकर एक नयी उम्मीद जागी है, अब देखना यह होगा कि ये रेलगाड़ी खेतों में पसीना बहाने वाले किसानों के लिए कितनी फायदेमंद होती है, क्या वाकई उन्हें इस रेल का कोई फायदा मिल पाता है ? देखना यह भी होगा कि साल 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर देने के मोदी सरकार के वायदे में ​यह किसान रेल कितनी भूमिका निभाएगी? 

इस देश का किसान उत्पादन के मामले में जितना धीरवीर है उत्पादन का मूल्य हासिल करने में उतना ही लाचार। ज्यादातर किसानों का यह हाल है कि पूंजी के अभाव और कर्ज के दलदल में गलेगले तक गड़े हुए उसके अंदर इतनी ताकत भी नहीं है कि अपनी फसल को वह अच्छे मूल्य होने तक घर में रोक सके। तुरंत बेचना उसकी मजबूरी है, मूल्य अच्छा मिले इसके लिए सरकार ने समर्थन मूल्य नामक एक व्यवस्था की है, लेकिन तमाम रिपोर्ट में यह कहा जाता रहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत के अनुपात में काफी कम है। यही वजह है कि किसान लगातार कम मुनाफे में अपनी फसल बेचने को मजबूर होता रहा है, मौसम की परिस्थितियां उसके इस कम मुनाफे को कई बार घाटे में तब्दील करने में कोई रहम नहीं करती हैं। कहा जा सकता है कि किसान अपने हौसले से फसल उत्पादन में तो बाजी मार ले जाता है, लेकिन मार्केटिंग के मामले में उसके हाथपैर फूल जाते हैं, वह असहाय महसूस करता है, वह देश में अपनी तरह का अकेला उत्पादक है, जिसकी उपज का मूल्य कोई और व्यक्ति तय करता है।

कृषि बाजार की ऐसी लाचारियां झेल रहे किसानों के लिए किसान रेल एक वरदान साबित हो सकती है, पर क्या वास्तव में यह उन किसानों को सीधे तौर पर लाभ पहुंचाएगी या फिर उन बिचौलियों के लिए मुनाफे और नए बाजार का रास्ता खोलेगी जो किसानों की मेहनत का हिस्सा लूट खाते हैं। सवाल यही है कि ऐसा कौन सा तरीका होगा जिससे किसानों तक सीधे इस रेल का फायदा पहुंचे ? यह कैसे संभव होगा कि बुरहानपुर का केला उत्पादक किसान बिहार के किसी शहर में अपने केलों को पहुंचा पाएगा, क्या केवल परिवहन की एक व्यवस्था मात्र कर देने से वह इस बात में सक्षम होगा या एग्रो मार्केटिंग का कुशल कारीगर बनने के लिए उसे कुछ और भी पहलुओं पर काम करना होगा। अब जबकि डिजिटल भारत, आत्मनिर्भर भारत जैसे शब्दों पर सरकार का पूरा जोर है, तो इस नयी तकनीक को सीखने, अपनाने और खेतीकिसानी में उनका उपयोग करने के लिए किसान खुद कितने आगे आएगा, यह भी सवाल है।

केवल एक किसान रेल चलाने भर से कुछ नहीं होगा, सप्ताह में एक दिन चलाने भर से भी कुछ नहीं होगा। कृषि क्षेत्र बहुत बड़ा है और इसमें बदलाव तभी दिखाई देगा जबकि बड़े पैमाने पर यह सुविधा बढ़ाई जाएगी और इसे इतना सरल और सहज बनाया जाएगा कि कोई किसान भी इसका आसानी से इस्तेमाल कर पाए, कहीं ऐसा न हो कि यह बिचौलियों की किसान रेल साबित हो। जरूरी यह भी होगा कि रेल कनेक्टिविटी के साथ मार्केट कनेक्टिविटी का एक सहजसुगम्य तंत्र बने। ट्रक परिवहन के जरिए प्रदेश की सीमाओं पर अवैध वसूलियों को हमने कई टीवी चैनलों के स्टिंग आपरेशन में देखा है, किसान रेल के जरिए निश्चित तौर पर इस गोरखधंधे से मुक्ति पाई जा सकती है, लेकिन किसान के उत्पाद एक राज्य से दूसरे राज्य में कितनी सहजता से पहुंच पाएंगे, उसके लिए क्या प्रक्रियाएं,नियम कायदे और टैक्स की औपचारिकताएं होंगी, उसको समझना भी बेहद जरूरी होगा।

किसान रेल के जरिए हम उम्मीद कर सकते हैं कि एग्रो मार्केटिंग के लिए किसानों के लिए एक आशा का आसमान खुलेगा।

 https://hindi.news18.com/blogs/rakesh-kumar-malviya/how-much-farmers-will-be-benefited-from-kisan-rail-3198062.html 

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