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Digital Divide : चौथा दिन: अस्पताल और बीमारी

 

राजपुर में आज सुबह से ही बारिश हो रही थी। बेमौसम की यह बारिश किसी अनहोनी की आशंका दे रही थी। हम विमल जी के घर पहुंचे तो यह आशंका सच भी साबित हुई। दयाल जी की तबियत खराब थी। वे आराम कर रहे थे। उन्हें रात को तेज बुखार आया था और सीने में भी दर्द हो रहा था। 80 के आसपास की उम्र में यह चिंताजनक तो है, लेकिन विमल जी के परिवार ने इसे बेहतर ढंग से संभाला। सीमा जी ने बताया कि रात को इला जी से पता चला कि दयाल जी का शरीर गर्म हो रहा है और सीने में भी हल्का दर्द है।

इसके बाद दयाल जी ने तुरंत अपने एक डॉक्टर मित्र को फोन लगाया, लेकिन उनका फोन आउट आफ कवरेज था। तो उन्होंने इंटरनेट के सहारे दर्द और बुखार के बारे में सलाह ली।

विमल जी ने बताया किदिक्कत यह थी कि उस वक्त गांव में तो इलाज की व्यवस्था थी नहीं और जिला अस्पताल पहुंचने में कम से कम डेढ़ घंटा लग जाता। तो हमने इंटरनेट पर मौजूद घरेलू इलाजों की जानकारी ली। लेकिन संतुष्टि नहीं मिली। तो डॉक्टर्स फोरम पर तुरंत उपचार के लिए जरूरी ऐहतिहात बरतने की सलाह मांगी।

विमल जी बोलेजर्मनी के एक डॉक्टर उस वक्त आनलाइन थे और उन्होंने तुरंत स्काई पे के जरिये वीडियो चैट की। हमने सिमटम्स तो पहले ही बता रखे थे, तो उन्होंने घर में उपलब्ध दवाइयों की सूची मांगी। हमने जो भी दवाएं उपलब्ध थीं, उनकी जानकारी दी। तब उन्होंने एक कॉम्बीनेशन बनाकर बताया और पूरी रात आराम से गुजर गई। अब तन्मय अपने दादाजी को गांव के हास्पिटल ले जा रहा था।

 हम बात करते हुए बाहर निकल आए थे और सामने देखा तो शेखर जी भी परेशान टहल रहे थे। विमल जी नमस्कार किया, तो वे करीब आए और बोले कि सामू की तबियत बहुत खराब है। पूरी रात सिर पर ठंडे पानी की पट्टियां रखते हुए गुजरी है। अभी सामू की मां उसे अस्पताल लेकर गई हैं।

 इस पर विमल जी बोले कि आपने रात को ही हमें क्यों नहीं बताया। इस पर शेखर जी ने संकोच से कहा कि रात बहुत हो चुकी थी। हमने परेशान करना ठीक नहीं समझा। विमल जी ने इस पर सख्त ऐतराज जताते हुए कहा कि बच्चे की तबियत का मामला था, ऐसे मामलों में संकोच किया करें।

 फिर विमल जी ने अपने पिता की तबियत और इंटरनेट से जर्मनी के डॉक्टर से वीडियो चैटिंग की बात भी बताई। उन्होंने बताया कि आजकल ऐसी कई साइट हैं, जो बीमारियों के लक्षण और संभावित इलाज के साथ घरेलू उपचार के तरीकों को भी बताती हैं। इनकी मदद ली जा सकती है। हालांकि बीमारी के मामले में विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह ही सबसे महत्वपूर्ण होती है, लेकिन फिर भी कभी कभार बहुत ज्यादा मुश्किल वक्त में हमें इंटरनेट पर मौजूद सोशल साइट्स की भी इस बारे में मदद ले लेनी चाहिए।

 उन्होंने बताया कि सोशल साइट्स पर हमें अपने डॉक्टर दोस्तों की अलग से प्रोफाइल रखनी चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि कौन किस बीमारी का विशेषज्ञ है, ताकि बुरे वक्त में मदद ली जा सके।

 इस बीच माधुरी जी और सामू घर गए थे। उन्होंने एक पर्चा दिखाते हुए कहा कि अस्पताल में यह दवाएं नहीं थीं, तो डॉक्टर साहब ने इन्हें मंगवाने को कहा है। शेखर जी पर्चा हाथ में ले लिया और बोले कि आजकल दवाएं ढूंढने के लिए दुकानों के कितने चक्कर लगाने होते हैं। आखिर ये डॉक्टर ऐसी दवाएं लिखते ही क्यों हैं। 

बात तो सही थी। लेकिन क्या किया जा सकता था। विमल जी ने इसका रास्ता सुझाते हुए कहा कि आप दवाओं को आनलाइन क्यों नहीं मंगवा लेते हैं। आसानी से मिल जाएगी। शेखर जी इस पर मुस्कुरा दिए। बोलेहां, भई हम तो भूल ही गए थे कि आप सभी काम को इंटरनेट के जरिये करते हैं। तो बताइये कैसे होगी दवाओं की डिलेवरी!

 विमल जी बोलेअरे भई ढेरों साइट हैं। किसी पर भी जाकर अपनी दवाएं सर्च कीजिए और कहीं भी डिलेवरी ले लीजिएगा। गांव में तो नहीं पहुंचाएंगे लेकिन जिला स्तर पर किसी भी पहचान वाले के घर पर दवाएं मंगवा लीजिए, वहां से किसी भी बस पर वह रख देंगे आप यहां गांव में ले लीजिएगा।

 

शेखर जी:बात तो सही है आपकी, लेकिन देखिये आखिर हम गांव वालों के लिए पारंपरिक तरीके ही काम आते हैं। डिलेवरी के लिए अपने परिचितों की मदद का तरीका ही सबसे विश्वसनीय है।

विमल जी:जी विश्वसनीयता तो आज भी परिचित तरीकों पर ही है, लेकिन इसमें कुछ डिजिटल मिलावट कर देने से काम आसानी से और जल्दी हो जाता है।

शेखर जी:क्या इन दवाओं की कीमत भी पहले से पता चल जाती है।

विमल जी:बिल्कुल आप अलग अलग साइट्स पर जाकर दवाओं की कीमत को कंपेयर कर सकते हैं और फिर उसमें से चयन कर सकते हैं।

शेखर जी:लेकिन यह बताइये कि आपकी यह दवाओं वाली साइट को पैसे कैसे भेजे जाएंगे।

विमल जी:इसके लिए दो आप्शन होते हैं। एक तो यह कि आप पहले से ही क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड या फिर किसी एप के जरिये पैसा ट्रांसफर कर दें या फिर जब दवाओं की डिलेवरी हो तो उसी वक्त कैश पैमेंट कर दें।

शेखर जी:ये क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड से पैमेंट के कई खतरे भी सुने हैं। यह क्या मामला है।

विमल जी:बिल्कुल, जैसा मैंने एक बार पहले भी कहा था कि आनलाइन इंटरनेट की दुनिया में बुरे लोगों की कमी नहीं है। कई लोग पासवर्ड चुराकर या आनलाइन खाते की जानकारी चुराकर लोगों के डिजिटल लेन देन को प्रभावित करते हैं और पैसा चुराते हैं। इनसे सावधान रहने की जरूरत है।

शेखर जी:इनसे सावधान रहने के तरीके क्या हैं।

विमल जी:सबसे पहले तो इंटरनेट पर अपने खाते से मोबाइल नंबर को जरूर जोड़कर रखें और अपने एटीएम या आनलाइन ट्रांजैक्शन के पिन नंबर को किसी को बताएं। इसके अलावा जब ट्रांजैक्शन करें तो उसका जो ओटीपी नंबर आता है, वह भी किसी अन्य को बताएं।

शेखर जी:ये नंबर क्या बैंक वाले पूछें तब भी बताएं।

विमल जी:बैंक के कर्मचारी या कोई भी बैंक कभी भी किसी ग्राहक से उसका पिन नंबर या ओटीपी नंबर नहीं पूछता है। अगर कोई व्यक्ति आपका पिन नंबर पूछ रहा है तो समझिये कि वह आपको चूना लगाने की तैयारी कर रहा है।

शेखर जी:ओह ये बात है।

विमल जी और शेखर जी को इसी बातचीत में छोड़कर हम गांव में आगे की ओर बढ़ गए।

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Content by: Sachin Srivastava 

Illustration : Pooja Malviya 

इस सीरीज की पांचवी कहानी पढ़िए कल... 

( नोट: इन कहानियों की किताब विकास संवाद ने प्रकाशित की है। यदि आपको यह उपयोगी लगे तो कॉपी प्राप्त करने के लिए हमें लिख सकते हैं। ) 

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