भोपाल, मध्यप्रदेश. लॉकडाउन के बाद
तमाम ठोकरें खाकर अपने गांव तो आ गए, लेकिन गांव में भी प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही
हैं। यहां भी उनका संघर्ष शहर जितना भले ही न हो, पर काम के अभाव में और योजनाओं का लाभ न मिल पाने के कारण
प्रवासी मजदूर भविष्य को लेकर चिंतित हो रहे हैं।
निवाड़ी जिले के प्रवासी मजदूर मनीराम अहिरवार पिछले पांच सालों से मजदूरी करने के लिए हरियाणा बार्डर के कापासेड़ा गांव जाते रहे हैं। वह अपने तीन बच्चे शिवानी, सोनम और पंकज को गांव पर अकेला ही छोड़ जाते हैं। लॉकडाउन के बाद तीनों बच्चों की फिक्र हुई। साधन नहीं होने के बाद भी गांव जाने का मन बनाया। ठेकेदार कृपालु से मजदूरी के तकरीबन बाईस हजार रुपए मांगे तो ठेकेदार साफ मुकर गया। बोला ‘हमने तुम्हारा ठेका थोड़ी ले रखा है अब तो लॉकडाउन के बाद ही मजदूरी मिलेगी।‘ उस वक्त उनके पास केवल नौ सौ रुपए की बचत थी। हरियाणा बॉर्डर से दो ट्रक, ट्रेक्टर और पैदल चलकर किसी तरह घर पहुंचे। सारे पैसे खर्च हो गए। मनीराम बताते हैं कि ‘दो दिन उन्हें कुछ खाने—पीने को नहीं मिला। हमारे पास पैसे भी नहीं बचे थे कि हम लोग कुछ खा पी सकें। मन में यह डर था कि कहीं हम लोग भूख से न मर जाएं।‘
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मनीराम ने बताया कि ‘गांव पहुंचे तो जांच की गई। 14 दिन के लिए हमें घर में रहने को कहा गया। मजदूरी की इजाजत भी नहीं। हमें 25 किलो सरकारी राशन मिला, जबकि हर महीने 60 किलो राशन लगता है। गांव में मजदूरी पर रखता नहीं, जिससे खाने—पीने की समस्या हो गई। हमने गांव के एक व्यक्ति से 10000 रुपए कर्ज लिया जिसे भारी ब्याज सहित चुकाना पड़ेगा।‘
मनीराम को चिंता है कि ‘आगे अब कैसे हमारा घर चलेगा ? यह सोच कर नींद भी नहीं आती। अब हम लोगों का क्या होगा ? गांव में काम नहीं मिलता, और अगर मिल भी जाए तो समय पर मजदूरी नहीं। अब घर में आए दिन लड़ाई होने लगी है। बच्चे कुछ मांगते हैं तो उनकी जरूरतें पूरी नहीं कर पाते। हमारी पत्नी हम और हमारे बच्चे चिड़चिड़े होते जा रहे हैं। बात—बात पर कहासुनी होने लगती है। जो कि पहले कभी नहीं होती थी।‘
मनीराम कहते हैं ‘हमारे गांव में किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं हुआ और न ही हमें कोई समस्या हुई, इस बार जब हम आए तो पहली बार गांव के सभी लोगों ने हमें हेय दृष्टि से देखा, किसी ने भी हमसे बात नहीं की। लोग कहते हैं कि बीमारी लेकर आए हो कहीं निकलना मत, यह सुनकर हम अकेले में रो लेते हैं। एक बार तो मन में आया कि अब यहां रह नहीं पाएंगे। हम खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि अब हमारा कोई इस दुनिया में हो ही नहीं है।‘
रीवा जिले के जवा ब्लॉक की बौसड पंचायत निवासी राजबहोर काम करने के लिए राजकोट गए थे। राजबहोर कहते हैं कि लॉकडाउन खुलने के बाद भी वे एक-दो साल तक कहीं बाहर काम करने नहीं जाएंगे। अपने गांव के आसपास ही काम की तलाश करेंगे। सरकार ने कुछ काम उपलब्ध कराया तो बहुत अच्छा होगा। एक-दो साल बाद फिर राजकोट जाने पर विचार करेंगे। उनके पास महज 1300 रुपए बचे हैं। इससे कितने दिन का खर्च चल पाएगा। राजबहोर ने बताया कि ‘उन्हें दो महीने का राशन पीडीएस की दुकान से मिल चुका है। इससे कुछ गुजारा हो जाएगा, लेकिन सब्जी-भाजी और तेल-मसालों के लिए रुपए की जरूरत होगी।‘
उनके बेटा राजेश, बेटी प्रिया, बेटा सुजीत और संजीत गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। कोविड-19 के कारण बच्चों का स्कूल बंद है। इससे उन्हें मध्याह्न भोजन भी नहीं मिल रहा है। राजबहोर ने बताया कि ‘एक हफ्ते पहले 33-33 दिन का चावल दिया गया था। यह प्राइमरी के बच्चों को 100 ग्राम और माध्यमिक के बच्चों को प्रतिदिन के हिसाब से दिया गया था।‘ राजबहोर कहते हैं साहब, आने वाले दिनों में हालात विकट होने वाले हैं। न जाने परिवार का गुजारा कैसे होगा।
निवाड़ी जिले के गिद्खिनी के जयराम अहिरवार भी एक प्रवासी मजदूर हैं। जयराम बताते हैं कि सरकार ने मजदूरी की व्यवस्था नहीं की तो हमें कर्ज लेना पड़ेगा। अब हमें कोई कर्ज देगा भी या नहीं, समय ही बताएगा। महंगाई इतनी है कि गांव में 25 की चीज 50 में मिल रही है।
चौथी में पढऩे वाली नातिन खुशी को स्कूल से तीन किलो गेहूं और 500 ग्राम चावल दिया गया है बस इसके बाद हमको कोई मदद नहीं मिल पा रही है। यदि गांव में मजदूरी नहीं मिलती है तो मजबूरन हमें पलायन करना पड़ेगा। बाहर जाकर काम तलाशें तब कोई बीमारी हो जाए या कोरोना से मर जाएं तो वह घर में रहकर भूखे मरने से अच्छा होगा।
जयराम बताते हैं कि पीडीएस की दुकान से राशन मिलता है, लेकिन वह पर्याप्त नहीं होता है। 10 लोगों के लिए हर माह कम से कम डेढ़ क्विंटल अनाज चाहिए। अभी तो हम लौटे हैं तो गांव में हेय दृष्टि से देखा जा रहा है। न हम किसी के यहां जा सकते हैं और न कोई हमारे यहां आता है। सभी ने दूरी बना रखी है।
जयराम ने बताया कि उसके परिवार में 10 सदस्य हैं। पत्नी ममता को श्वांस की बीमारी है। एक बहू गर्भवती है। जयराम ने बताया कि ‘जब से लौटकर आए हैं तब से पत्नी के जन—धन खाते में 500 रुपए जमा होने के अलावा कोई और मदद नहीं मिली है। उन्हें 14 दिन क्वॉरंटीन रखा गया। डॉक्टर ने जांच भी की। हालांकि, कोई बीमारी नहीं निकली।‘ जयराम ने बताया कि ‘गांव के 48 दलित परिवारों के 76 लोग काम करने बाहर गए थे। लॉकडाउन के बाद गांव लौटे हैं तो सभी की हालत उनके जैसी ही है।‘
पन्ना जिले के कल्याणपुर पंचायत के राजू ने बताया कि ‘उसके पिता की उम्र 50 वर्ष से ज्यादा हो गई है। वे काम नहीं कर पाते हैं। छोटा भाई 12 पास है। मैं काम के लिए बाहर जाता हूं तो वह माता-पिता की देखभाल करता है। मेरे मजदूरी करने से परिवार का खर्च चल जाता था। अब सभी गांव में हैं, खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है।‘ राजू का परिवार भूमिहीन है। राजू ने बताया कि ‘उसके परिवार पर कर्ज भी है। अब इस हालत में वह तकादा करने आ गया तो रुपए कहां से दूंगा। इसलिए, जो भी हो काम के लिए बाहर तो जाना ही पड़ेगा। परिवार का खर्च चलाना और कर्ज चुकाना दो बड़ी जिम्मेदारी हैं।‘
शिवपुरी जिले के पोहरी ब्लाक का बटकाखेड़ी गांव में रहने बाली विजना पति देशराज आदिवासी आगरा के पास काम के लिए गई थी। तालाबंदी के बाद वो वापस आ गई। पूरी कमाई किराये में खर्च हो गई। विजना को चिंता है कि अब आगे क्या होगा, कैसे घर खर्च चलेगा। जिस समय उन्होंने पलायन किया था उनका एक साल का बच्चा राजवीर स्वस्थ था। पलायन पर बच्चों की देखभाल अच्छे से नहीं हो पाती, राजवीर कमजोर होता चला गया। दवा भी नहीं ले सके। विजना ने आगरा जाने के लिए रु 3000 का कर्ज भी लिया था, काम से लौटने पर कर्ज लौटाने का सोचा था, पर वापस आ जाने से कर्ज चुकाने हेतु कमाई ही नहीं हुई।
विजना बताती हैं
कि ‘यदि लॉकडाउन नहीं होता तो हम कम से कम 5 क्विंटल गेहूं मजदूरी के बदले लेकर आते थे,
जिससे हमारा पूरा चौमासा यानि बरसात का समय
निकल जाता अब ये चार माह कैसे निकलेंगे ये समझ में नहीं आ रहा है। कोरोना के कारण
हमारे परिवार पर बुरा असर पड़ रहा है।‘
विजना बताती हैं कि ‘घर में मिर्च मसाला तेल भी नहीं है और तो इस समय सब्जी भी घर में नहीं बन रही है। रोज मिर्च कि चटनी बनाकर खा रहे हैं। कुछ दिन घर में दाल थी वो बना ली। अब वो भी खत्म हो गयी है, भूखे रहना पड़ रहा है।‘ विजना का राशन कार्ड भी नहीं बना है।
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