राकेश कुमार मालवीय
मध्यप्रदेश इस वक्त देश का अकेला ऐसा राज्य है जो बिना
स्वास्थ्य मंत्री के कोरोना—कोविड की जंग लड़ रहा है। लोकप्रिय मुख्यमंत्री
शिवराज सिंह चौहान अकेले ही दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारी से मोर्चा लड़ा रहे हैं।
हालात यह हैं कि 8 अप्रैल तक कोविड19
संक्रमित मरीजों की संख्या 341 थी जो एक दिन बाद 411 तक जा पहुंची है। मरीज दिनों—दिन बढ़ रहे हैं।
मध्यप्रदेश में स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों पर हमले हो रहे हैं, खादय सुरक्षा की
स्थिति गंभीर होते जा रही है, लेकिन इन्हें संभालने वाले हैं सिर्फ
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान।
शिवराज सिंह चौहान के फुटवर्क में कोई कमी नहीं है। उन्हें
तो कहा ही पांव—पांव वाले भैया जाता है, लेकिन दिक्कत यह
है कि कोविड19 वायरस ने जो जहां है, उसे वहीं रहने पर
मजबूर कर दिया है। ऐसे में जबकि मध्यप्रदेश में टॉप आफिसर्स ही कोविड—19 की चपेट में
हैं वहां पर मुख्यमंत्री खुद भी मोर्चे पर जाकर सीधी लड़ाई नहीं लड़ सकते
हैं।
मध्यप्रदेश भले ही पिछले कुछ सालों से विज्ञापनों में खुद
को बेहतर राज्य होने का दावा करता रहा हो, पर जमीनी हालात
कुछ और ही कहानी कहते हैं। बीच के डेढ़ साल एमपी में कांग्रेस का राज भुला भी दिया
जाए तो बीते पंद्रह सालों और उसके पीछे के पांच दशकों में स्वास्थ्य सेवाओं का
विकास किसी को दिखाने लायक नहीं है।
हेल्थ बुलेटिन के मुताबिक लगभग सवा सात करोड़ की आबादी पर
43000 लोगों पर एक आईसीयू है। 70000 आदमी पर एक वेंटीलेटर है। 2340 आदमी पर
सामान्य हास्पिटल बेड है। और अब जबकि राज्य में कोविड की रोकथाम के लिए आइसोलेशन
सबसे महत्वपूर्ण हो गया है तब राज्य में हर 7000 आदमी पर एक आइसोलेशन बेड है।
अब जबकि मध्यप्रदेश में कोरोना—कोविड ने छोटे
कस्बों की तरफ रुख कर लिया है तब मध्यप्रदेश के हेल्थ केयर सिस्टम पर एक नजर डालना
जरूरी लगता है। राज्य स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक कार्यालय से प्राप्त जानकारी के
अनुसार प्रदेश के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में स्वीकृत 1771 पोस्ट में से सिर्फ
1112 डॉक्टर पदस्थ हैं, लगभग 659 पद खाली हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य
केन्द्र ग्रामीण भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।
जब लोगों का प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर जाने से काम
नहीं चलता तो वह सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र जाते हैं। मध्यप्रदेश में इस वक्त
313 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, 51 जिला अस्पताल, 84 सिविल अस्पताल
हैं। हर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर विशेषज्ञ डॉक्टर की नियुक्ति होनी चाहिए।
प्रदेश में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में 1236
विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं, और केवल 248
विशेषज्ञ डॉक्टर ही काम कर रहे हैं। यह एक बहुत बड़ा गैप है। तकरीबन 988 पद खाली
पड़े हुए हैं। तकरीबन 1316 नर्सिंग स्टाफ के पद खाली हैं। यह तो मानव संसाधनों की
बात है। दवाएं और अन्य जांचों के मामलों में भी हालात खराब हैं।
यही स्वास्थ्य तंत्र अपनी छह लैबों के माध्यम से हर दिन 500
टेस्ट करने का दावा कर रहा है। इनमें से तीन लैब अकेले भोपाल में केन्द्रित हैं।
एक इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में है। इसलिए टेस्टिंग की गति भी धीमी
है, क्योंकि सैंपल लाने से लेकर उसे जांचने और रिपोर्ट भेजने
में वक्त लग रहा है। सवा सात करोड़ की आबादी वाले एमपी में अब तक महज 5135 टेस्ट
ही करवाए गए हैं। हालांकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान टेस्टिंग क्षमता को प्रति
दिन एक हजार तक लाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन कब तक, यह नहीं बताया
है।
तो क्या यह एक स्वास्थ्य तंत्र की ही लड़ाई भर है या इसमें
राजनैतिक नेतृत्व भी मायने रखता है। बिलकुल रखता है, ऐसे समय में जबकि
भोपाल के स्वास्थ्य संचालनालय में तकरीबन 40 पॉजीटिव मरीज हों, बीस पुलिस वाले
बीमार हों, इंदौर में स्वास्थ्य हमले पर लोगों के अटैक की खबरें हों, भोपाल में भी
पुलिस पर हमला हुआ हो, कई जगह पुलिस के भी नियंत्रण के लिए लाठी चलाने
के वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहे हों, प्रदेश में साफ—सफाई सहित अन्य
व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से रखने की चुनौती हो, प्रदेश के
दूरदराज के इलाकों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लक्षित सार्वजनिक वितरण
प्रणाली के तहत हर राशनकार्डधारी परिवार को प्रति व्यक्ति पांच किलो अनाज और प्रति
परिवार एक किलो दाल पहुंचाना हो या अन्य फौरी राहत की घोषणाएं हों।
इन सभी के मानकों को पूरा करने के लिए खुद मुख्यमंत्री
शिवराज सिंह को मददगार हाथों की जरूरत महसूस होती होगी। वह चाहते ही होंगे कि
प्रदेश में कम से कम एक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री, एक गृह मंत्री और
एक खादय सुरक्षा मंत्री तो बन ही जाए जो उनके काम को बांट ले।
पर ऐसा नहीं हो पा रहा है ! जाने कौन सी
मजबूरी है ? जिन परिस्थितियों में शिवराज सिंह चौहान ने
अपनी सरकार बनाई है और ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे के 22 विधायकों ने अपना पाला
बदला है, उसमें सिंधिया के इस गुट को भरोसे में लेना जरूरी लगता होगा, लेकिन अब
परिस्थिति भिन्न् हो गई है। शिवराज सिंह चौहान भले ही कितने सक्षम व्यक्ति क्यों न
हों, संकट इतना बड़ा है जिसमें सूझ—बूझ भरे चार हाथों
की जरुरत पड़े। नौकरशाही कितनी ही सक्षम क्यों न हो, राजनैतिक नेतृत्व
का महत्व लोकतंत्र में उससे बड़ा है।
इस बात को शीर्ष भाजपा नेतृत्व को भी समझकर शिवराज सिंह
चौहान को कुछ मंत्रियों के गठन के लिए हरी झंडी दे देना चाहिए। हालांकि बिना बैठक
किए और सिंधिया को भरोसे में लिए यह संभव नहीं होगा, लेकिन फिलहाल इस
परिस्थिति को कौन नहीं समझेगा।
यदि मंत्रीमंडल विस्तार संभव न भी हो तो एक टास्क फोर्स का गठन तो किया ही जा सकता है। इस वक्त राजनीतिक आग्रह—दुराग्रह को छोड़ने का वक्त भी है। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी एक पत्र लिखकर मुख्यमंत्री से इस लड़ाई में पूरा साथ देने का भरोसा दिलाया है, अब भाजपा नेतृत्व को यह समझना होगा कि संकट की इस घड़ी में वह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को कितने हाथ और देते हैं।
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