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डिजिटल इंडिया में जिंदा परिवार के बीच अकेली कैसे मनियारो ?


राकेश कुमार मालवीय

मनियारो छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले की सिंगचौरा ग्राम पंचायत की निवासी हैं। आदिवासी समाज से  ताल्लुक रखने वाली मनियारो चवालीस साल की महिला हैं। उनके हाथ में राशन कार्ड है। राशन कार्ड देखकर आपको समझ आएगा कि वह अपने घर की अकेली महिला हैं ! लेकिन ऐसा नहीं है।

मनियारो का सात सदस्यों वाला खातापीता परिवार है। उनके पति धरमा भी दस दुनिया में सही सलामत हैं, लेकिन राशन कार्ड में वह बिना पति के जिंदगी गुजार रही हैं। परिवार के बबलू, सुवंती, इनोश, करसा, अनामिका और सृष्टि का नाम राशन कार्ड के किसी पन्ने पर नजर नहीं आता है।

छह महीने पहले नया राशन कार्ड उनके लिए बड़ी मुसीबत लेकर आया। जब नाम नहीं था, तो सीधेसीधे उनका राशन कम हो गया। अब बड़ी मुश्किल से परिवार अपना गुजारा कर पा रहा है, क्योंकि मजदूरी कहीं मिलती नहीं। वह आने वाले दिनों को लेकर बहुत चिंता में हैं, क्योंकि गर्मियों में उनके घरों में मिलने वाली सागभाजियां खत्म हो जाएंगी, ऐसे में उनके पास अपने बच्चों को खिलाने के लिए नमकरोटी के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

सरगुजा जिले के लुण्डा विकासखंड के राजू भुइहर की दूसरी समस्या है। इसे ठीक करवाने के लिए एक आधार केन्द्र पर आए हैं। आधार कार्ड की एक गड़बड़ ने उन्हें सारी योजनाओं से वंचित कर दिया है। दरअसल करेसर गांव के इस वाशिंदे के पिता का नाम मंगरू की जगह मंगल कर दिया है। आधार केन्द्र इस एक गलती को ठीक करने के लिए तकरीबन दो सौ रूपए वसूलेगा। हो सकता है कि एक बार में काम न हो, अमूमन एक काम के लिए गांव में तीन से चार बार चक्कर लगाने पड़ते हैं, कभी बिजली नहीं रहती, कभी इंटरनेट ठीक से काम नहीं करता। ऐसे में लोगों की मजदूरी जाती है सो अलग।

राजपुर ब्लॉक के डुमरपारा की निवासी उर्मिला जब पहली बार माता बनने वाली थी तो उन्हें आंगनवाड़ी दीदी से प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना का फार्म भरने का सुझाव मिला। पर इस योजना के लिए बैंक खाता होना जरूरी है। बैंक में खाता खुलवाने राजपुर गयीं, वहां बताया गया कि इसके लिए कम से कम एक हजार रूपए होना जरूरी है। गर्भावस्था में ही उर्मिला ने  मजदूरी कर 2000 रुपए जमा किए और तीन माह बाद खाता खोल पाईं। उनकी डिलीवरी भी हो गई, और बच्चा अब दो माह का हो गया है, लेकिन उनके खाते में अभी कोई भी पैसा नहीं आया है।

 

समस्याएं और भी हैं, किस योजना का पैसा किस खाते में आया या नहीं आया, इसकी जानकारी लेना भी बेहद कठिन है। क्योंकि बैंक के प्रिंटर खराब हैं, और पासबुक में एंटी करवा लेना भी यहां बड़ी उपलब्धि है। शहरी चकाचौंध से दूर यह उन गांवों की कहानियां हैं जो डिजिटल इंडिया में ही दर्ज किए जाते हैं, नियमकायदे कानून वहां ठीक वैसे ही लागू होते हैं जैसे कि फोरजी चलाने वाले शहरों में।

डिजिटल डिवाइड को दूर करने और समाज को सशक्त करने के लिए डिजिटल सशक्तीकरण पर सरकार जोर भी दे रही है। डिजिटल इंडिया बनाया जा रहा है। सूचना क्रांति से कदमताल करने के लिए यह जरूरी भी लगता है।


इस कार्यक्रम के नौ मकसद में ई-शासन के जरिए शासन व्यवस्था में सुधार का भी एक बिंदु है। माना यह भी जाता है कि लोगों के हाथों में इंटरनेट आ जाने से वह अपने काम भी कर सकेंगे, इसके लिए सरकार ने नेशनल डिजिटल साक्षरता मिशन के तहत अब तक लगभग 53 लाख से ज्यादा लाभार्थियों को प्रशिक्षित किया है। प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अ​भियान खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए संचालित किया जा रहा है, जिसमें छह करोड़ लोगों को साक्षर करने का लक्ष्य रखा गया है, हर परिवार से एक व्यक्ति यानी छह करोड़ परिवार। इसमें से अब तक ढाई करोड़ लोगों को साक्षर करके तकरीबन दो करोड़ लोगों को प्रमाणपत्र भी जारी कर दिए गए हैं, लेकिन वास्तव में डिजिटल साक्षरता का अपेक्षित जमीनी असर नजर नहीं आ रहा है। यह असर केवल सेवाएं लेने वाले ही नहीं देने वालों की तरफ से भी गंभीर है।

नीति आयोग ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है। पोषण मिशन की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना का लाभ देने में हर तीन में से एक भुगतान गलत खाते में जा रहा है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि तकरीबन 28 प्रतिशत आधार आधारित खातों में भेजा गया पैसा दूसरे अकाउंट में चला गया है। यह संख्या तकरीबन 31.29 लाख होती है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इससे हितग्राहियों में गंभीर असंतोष है जिसको तुरंत ही प्राथमिकता के साथ ठीक किया जाना चाहिए। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि केवल 60 प्रतिशत महिलाओं को ही यह पता है कि उन्हें इस योजना के अंतर्गत कोई भुगतान बैंक खातों में आया है, बाकी महिलाओं को नहीं पता है।

नीति आयोग की बात को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह एनडीए सरकार की ही नहीं, प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना इसलिए है क्योंकि इसका आगाज उन्होंने खुद किया था। तब एक उम्मीद जागी थी कि देश में मातृत्व सुरक्षा के लिए कुछ अच्छा होने जा रहा है। सतत विकास लक्ष्यों के तहत मातृत्व मृत्यु दर को कम किए जाने की दिशा में एक बेहतरीन कदम हो सकता है, क्योंकि इस योजना के तहत सहायता राशि को भी पांच हजार रूपए तक कर दिया गया था। यह राशि केवल मां ही नहीं, नवजात शिशु के लिए भी कारगर होती, लेकिन बाद में योजना को जिस तरह से नियमों में बांधकर उसका लाभ सीमित किया गया, उससे सुरक्षित मातृत्व के प्रयासों को झटका लगा। और रही सही कसर अब योजना के क्रियान्वयन ने कर दी है। जमीनी क्रियान्वयन का हाल इतना लचर है कि ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिनको योजना का लाभ तब तक भी नहीं मिल पा रहा, जबकि बच्चे दो से तीन साल के हो जा रहे हैं। यह डिजिटल इंडिया के प्रयासों को लचर व्यवस्था का ठेंगा दिखाना मान सकते हैं।

यह मात्र एक मिसाल है। बात केवल मातृत्व वंदना योजना की नहीं है। मनरेगा की मजदूरी भुगतान के विलंब ने भी लोगों से इस योजना के प्रति भरोसा उठाया है। पीडीएस का भी यही हाल है और पेंशन वाली योजनाओं का भी। इनकी जड़ में आधार कार्ड की गड़बड़ियां एक बड़ी वजह बनी हुई हैं। आधार कार्ड कैसे गड़बड़ बन रहे हैं और इसकी अंतिम जिम्मेदारी किसकी है। क्या ऐसे केन्द्रों पर या आधार कार्ड बना रहे लोगों पर भी गड़बड़ कार्ड बनाए जाने का जिम्मा तय नहीं किया जाना चाहिए।

बात यह है कि शहरों में इंटरनेट हाथों में लिए हमें सब कुछ आसान लगता है, लेकिन वंचित और हाशिए के लोगों के लिए कागज बनवाना, कागज सुधरवाना, कागज संभाल पाना अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसमें सालों पुरानी व्यवस्थाओं में अब भी आमूलचूल सुधार नजर नहीं आता, कई बार तो ऐसा भी होता है कि जितनी धनराशि का लाभ उन्हें मिलता है उसे पाने के लिए वह उतना वह पहले ही खर्च कर चुके होते हैं। इसमें उनके श्रम का तो कोई मूल्य भी नहीं होता।

आज भले ही मध्यवर्गीय समाज को भी यह योजनाएं मुफ्तखोरी लगने लगी हों, लेकिन जहां कुछ भी नहीं होता वहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली का पांचदस किलो अनाज या दो ढाई सौ रूपए की पेंशन ही उनके जीने का सहारा होती हैं, जरूरत इस बात की है कि उन्हें समय पर और सही हाथों में पहुंचाया जाए।

 


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