राकेश कुमार मालवीय
देश में कोविड-19 के नौ हजार से ज्यादा संक्रमण और सवा तीन सौ मौतों को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लॉकडाउन को आगे बढ़ा सकते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और वायरस की विभीषिका को देखते हुए एकमात्र रास्ता भी यही है। चंद मामलों का छोड़ दें तो देश के 130 करोड़ लोगों ने लॉकडाउन को अभूतपूर्व समर्थन भी दिया ही है। इस एकजुटता के बीच अब लॉकडाउन बढ़ाने से पहले कुछ बातों का ख्याल जरूर करना चाहिए।
खादय सुरक्षा का
सवाल :
इसमें सबसे बड़ी
चीज है खादय सुरक्षा। भोजन का अधिकार। दो वक्त की रोटी। प्रधानमंत्री ने देश के
निर्धनतम लोगों के लिए इसका बंदोबस्त किया भी है। केन्द्रीय खादय सुरक्षा एवं
आपूर्ति मंत्री रामबिलास पासवान ने देश बताया कि देश के भंडारगृहों में नौ महीने
के खाने लायक अनाज है। यह राहत की बात है।
केन्द्र सरकार ने
अप्रैल से जून तक तीन माह के लिए हर राशनकार्डधारी परिवार को प्रतिव्यक्ति 5 किलो अनाज की एक महत्वपूर्ण घोषणा है। एक किलो
दाल है। यह नियमित मिलने वाले राशन के अतिरिक्त होगा। उज्जवला योजना के तहत इन्हीं
तीन माह में तीन सिलेंडर निशुल्क दिए जाएंगे। लॉकडाउन का पालन करते हुए अपने घरों
में कैद लोगों के लिए यह बहुत बड़ी राहत है।
लॉकडाउन कुछ ऐसी
जल्दी में हुआ है कि प्रशासन को भी तैयारियों के लिए वक्त नहीं मिल पाया। दहशत के
बीच काम करते कर्मचारियों ने कोशिशें कीं, लेकिन जमीनी खबरें यह हैं कि राशन ठीक तरह से सभी लोगों तक नहीं पहुंच सका है।
गेहूं, चावल, शक्कर मिल भी गई तो मसालों, तेल और नमक की भी मारामारी है। पिछले 18 दिनों के बाद अब लोगों के पास जो कुछ भी था
वह खाया जा चुका है। इन परिस्थितियों में यदि लॉकडाउन को सप्ताह—दो सप्ताह तक बढ़ाया जाना तय किया गया है,
तो उसकी सबसे बड़ी शर्त सबसे गरीब, सबसे वंचित और दूरदराज वाले उन लोगों तक राशन
पहुंचाना ही होगा, जिनका काम—काज एकदम ठप्प पड़ गया है। लॉकडाउन की वजह से
वह घर नहीं जा पा रहे हैं।
किसानों की फसल
कटाई और उपार्जन
यह रवि फसल का
सबसे अंतिम चरण है। कई इलाकों में गेहूं, चना की फसल कट रही है। जिन संपन्न इलाकों में हारवेस्टर मशीनें उपलब्ध हैं
वहां पर फसल जैसे—तैसे कट भी गई,
लेकिन जहां मजदूर ही कटाई का माध्यम थे वहां पर
किसान अब भी मुश्किल में हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों ने कृषि कार्य करने के लिए
थोड़ी शिथिलता भी दी, लेकिन व्यावहारिक
दिक्कत खड़ी हो गई मजदूरों की।
ज्यादातर इलाकों
में मजदूरों का संकट वैसे भी बरकरार है, और दूर—दराज के इलाकों से फसल
कटवाने के लिए मजदूरों को लाया जाता है। लॉकडाउन में या तो मजदूर आए ही नहीं,
या जो आए थे वो वापस हो लिए, जो गांव में अटक गए उन्होंने इस भय के माहौल
में फसल कटाई से ही इंकार कर दिया। हालात यह हैं कि कई इलाकों में नमी खत्म होने
से गेहूं की बाली में से दाने खेत मे ही बिखरने की खबर आ रही है। ऐसे में किसानों
की फसल कटाई पर नजर रखने और उचित मदद पहुंचाने की जरूरत है।
दूसरा संकट
समर्थन मूल्य पर फसल उपार्जन का है। यही वह वक्त है जब फसल बेचकर किसान अपने सारे
कर्ज आदि चुकाता है और अन्य तैयारी करता है। कई किसान तो ऐसे हैं जिनके पास अनाज
के भंडारण के लिए समुचित ऐसी जगह नहीं होती जहां वह अधिक समय तक उसे रख सकें जहां
वह विपरीत मौसम से बच जाए। इसलिए किसानों के आंगन से मंडी तक पहुंचाने के लिए
जितना कम वक्त लिया जाए उतना अच्छा है। कई राज्यों ने इसकी शुरूआत कर दी है,
पर इसका एक्शन प्लान अभी तक सामने नहीं आया है।
एक साथ खरीदी करने पर भीड़ को कैसे नियंत्रित किया जाएगा, यह देखना भी बहुत जरूरी होगा, और पुलिस के किसानों के प्रति व्यवहार को भी देखना ही होगा।
प्रधानमंत्री
श्री नरेन्द्र मोदी ने कर्ज को चुकाने में थोड़ी राहत देते हुए इसकी अंतिम तिथि 31 मई तक कर दी है। इसके बाद भी 7 प्रतिशत की ब्याज दर से कर्ज चुकाया जा सकता
है। यह एक अच्छी रियायत है, लेकिन कर्ज केवल
सरकारी बैंक अथवा सहकारी समितियों का ही नहीं होता। भारत में महाजनी कर्ज भी एक
बड़ी समस्या है, अब देखना यह होगा
कि महाजन किस तरह से अपना कर्ज वसूलता है। क्या उस पर भी कोई नियंत्रण हो पाएगा।
वरना किसान खरीदारी की वजह से दो महीने भी देर से चुका पाया तो उसके लिए यह बड़े
नुकसान वाली बात होगी।
बच्चों का
स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण
देश में बच्चों
के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े बेहद खराब हैं। देश का हर तीसरा बच्चा किसी न किसी तरह
के कुपोषण का शिकार है। कुपोषित बच्चों में किसी भी तरह के संक्रमण को झेलने की
क्षमता पहले से ही कमजोर होती है। कोरोना की इस त्रासदी से बच्चों को बचाना है तो
उनके पोषण पर भरपूर ध्यान देने की जरुरत होगी। स्कूल बंद होने से मध्याहन भोजन बंद
हो गया है, और उसकी जगह प्रतिपूर्ति भत्ते से की जा रही
है। आंगनवाड़ी के बच्चों के लिए रेडी टू ईट फूड का प्रावधान किया गया है। पर यहां
भी सवाल पोषण की उपलब्धता का है।
लॉकडाउन में सब
कुछ बंद होने से बच्चों को जो कुछ भी मिलता था, वह पूरी तरह से बंद हो
गया है। सिक्कों से बच्चों का पेट नहीं भरा जा सकता, अब यह पूरी जिम्मेदारी
परिवार और समुदाय पर आ गई है। पर समुदाय क्षमतावान होंगे तब तो ! ऐसे में कमजोर
वर्ग के बच्चों के लिए यह दोहरी मुसीबत का वक्त होगा, जब पोषण भी छिनेगा और कोरोना के संकट से भी बचना होगा।
इस बीच बच्चों की
शिक्षा तो खैर प्रभावित हो ही रही है, गैर सरकारी स्कूल में
पढ़ने वाले बच्चों की फीस पर भी राज्य सरकारों को स्पष्ट निर्देश दे देने चाहिए, ताकि शहरी मध्यवर्गीय परिवारों को भी राहत मिले।
खातों में पैसा
डालकर ही नहीं चल सकेगा काम
इस बीच सरकार ने
मजदूरों, कई तरह की पेंशन पाकर राहते पाने वाले मजबूरों को भी खातों
में पैसा डालकर राहत देने की कोशिश की है। पर दूरदराज वाले इलाकों में केवल पैसा
डालने से बात नहीं बनने वाली, बैंकों तक जाना, पैसा निकालना इसलिए भी
कठिन है क्योंकि सभी जगह बैंके हैं नहीं, परिवहन बंद है और सोशल
डिस्टेंसिंग का पालन भी करना है। ऐसे में तो वस्तु ही महत्वपूर्ण है।
हम उम्मीद करते
हैं कि समाज और सरकार इस वायरस के साथ ही पोषण के संकट से भी मिलकर भी लड़ लेंगे।
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