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एक गांव जहां कोई गरीब नहीं रहता

 

गांधी जी मानते थे कि गांव का विकास ही देश का विकास है। यदि देश के गांवों को स्वावलंबी बना दिया जाए, तो बाकी समस्याएं खुदखुद हल हो जाएंगी। गांधी का सपना आजादी के सत्तर साल बाद भी साकार होने की राह देख रहा है, लेकिन एक गांव ऐसा भी है जो अपनी तरक्की की इबारत खुद लिख रहा है। देवास जिले की टोंक खुर्द गांव का गोरवा गांव यूं तो पहले भी राष्ट्रपति पुरस्कार और पानी के लिए स्वावलंबी बनने के कारण चर्चाओं में रहा है, लेकिन इसके कदम यहीं थमे नहीं हैं।

मध्यप्रदेश में कोई पांच हजार गांव हैं। गोरवा भी उनमें से एक है। 12—13 साल पहले यहां केवल एक फसल होती थी। यह इलाका केवल बारिश के पानी पर निर्भर था। इस कारण यहां पर केवल खरीफ के मौसम में सोयाबीन की फसल भर होती थी। वह भी अच्छी वर्षा पर निर्भर थी। खाने के लिए गेहूं भी बाजार से खरीदना पड़ता था। टोंक खुर्द ही नहीं देवास जिला पानी के मामले में इतने बुरे हालात में था कि सूखे की स्थिति से निपटने के लिए पानी से भरी रेलगाड़ी पहली बार देवास में ही आर्इ् थी।

देवास में यह समस्या बहुत पुरानी नहीं थी। मालवा की जमीन जमाने से उपजाऊ रही है। इसी को देखते हुए सरकार ने सन 1960-70 के दशक में खेती के लिए नलकूप और पंप लगाने के लिए ऋण की सुविधा प्रदान की थी। इसका नतीजा कुछ वर्षों में भूजल का बेतहाशा दोहन हुआ और अंतत: भूजल स्तर ने जवाब दे दिया। खेती करना मुश्किल होता चला गया। किसान कर्ज में डूबते चले गए।

वर्ष 2006 में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी उमाकांत उमराव देवास के कलेक्टर बने। पानी की विकराल समस्या ने बहुत जल्दी उनका ध्यान खींचा। उमराव उमराव ने क्षेत्र में पानी की कमियों की वजह की पड़ताल करने की कोशिश की। पता लगा कि नलकूपों के जरिये अधिकांश भूजल का दोहन कर लिया है, लेकिन क्षेत्र में पर्याप्त मॉनसूनी बारिश होने के बावजूद वह भूजल रिचार्ज नहीं हो पा रहा है।

उमराव ने फैसला किया कि स्थानीय किसानों को इस बात के लिए मनाया जाए कि वे अपने खेतों के दसवें हिस्से में तालाब बनाकर वर्षा जल का संरक्षण करें। वह अधिकारियों के साथ गांव-गांव जाते और किसानों से बात करते। निपानिया गांव के पोपसिंह राजपूत नामक किसान को उमराव ने अपनी गारंटी पर 14 लाख रुपए का बैंक ऋण दिलवाया। इससे राजपूत ने 10 बीघे का बड़ा तालाब बनवाया। नतीजा, पहले केवल सोयाबीन की फसल लेने वाले राजपूत अब साल में दो फसल लेने लगे। उन्होंने न केवल बैंक का कर्ज चुका दिया, बल्कि कुछ ही सालों में 10 बीघा खेत और खरीद लिया।

लेकिन, असल काम तो करके दिखाया गोरवा गांव में। दस साल पहले के गोरवा और अब के गोरवा को आप देखेंगे तो पाएंगे कि क्या नहीं बदला यहां। आज से दस साल पहले यहां पर 28 तालाब थे, आज इनकी संख्या 300 है। हर परिवार के पास अपना एक निजी तालाब। जिनके खेत बड़े हैं, उनके पास दो तालाब हैं।

हर घर में ट्रेक्टर, कुछ किसानों के पास कार,  और अपनीअपनी मोटरसाइकिल। दस साल पहले कवेलू के घरों वाला यह गांव पक्के घरों में त​ब्दील हो गया है, और इन्हीं घरों में बड़े साइज की एलईडी टीवी। गांव में कहीं भी आपको कीचड़ नहीं मिलेगी, सड़कें पक्की हैं, नाली वाली, ताकि पानी की सही निकासी हो सके। गांव में ऐसी सार्वजनिक जगह भी जहां बारिश के मौसम में दो हजार लोग भी बैठकर सामूहिक भोज का आनंद ले सकें। ग्राम सचिव महेंद्र आर्य बताते हैं कि  गांव में पिछली ग्राम सभा में परिवारों के नाम गरीबी रेखा की सूची से काटे गए.

आखिर यह बदलाव हुआ कैसे ? किसी भी गांववाले से चलते हुए पूछ लेंगे तो उसका जवाब होगा तालाब। खेत तालाबों ने इस गांव में सूखे को ही खत्म नहीं किया, पूरी तकदीर को बदलकर रख दिया। इस गांव के निवासी हैं रणछोड़जी। रणछोड़ जी अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाकर खेतखेत बने तालाबों को दिखाते हैं। रास्ते में हर कोई उन्हें ‘जयरामजी’ की करता है। पूछता है ‘कहां जा रहे हैं। चाय पीकर जाईये।‘ उन्हें हर खेत का अंदाजा है। एक के बाद एक लाइन से बने तालाब। एक दूसरे से जुड़े हुए। ऐसे लगभग 25 तालाब आपस में जुड़े हए हैं। इसी तरह दूसरी तरफ भी। कई खेतों में जमीन के अंदर से पाइप लाइन डाल दी गई है। डेढ़ से दो किलोमीटर तक भी इन्हीं तालाबों से पानी जा रहा है। मध्यप्रदेश सरकार की बलराम ताल योजना को देखना हो तो गोरवा गांव जरुर जाना चाहिए.   

केवल तीन बच्चे कुपोषित:

यदि लोगों की खेती सुधर जाए तो बाकी के हालात भी खुद-ब-खुद सुधर जाते हैं। गोरवा गांव हमें यह सीख भी देता है। एक ओर जहां प्रदेश में कुपोषण के हालात चिंताजनक हैं और जिसे ठीक करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज​ सिंह चौहान ठोस कदम भी उठा रहे हैं, उस दिशा में गोरवा एक आदर्श प्रस्तुत करता है। गोरवा की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता साधना बताती हैं कि उनके गांव में केवल तीन बच्चे कम वजन के यानी कुपोषित हैं। वह भी इसलिए क्योंकि उनके पैंरेट्स बारबार कहने के बाद भी बच्चों को पोषण पुनर्वास केन्द्र में नहीं ले जा रहे हैं। पोषण पुनर्वास केन्द्र वह जगह होती है जहां कि कम वजन के बच्चों को 14 दिन तक भर्ती करके इलाज किया जाता है। और इसके लिए सरकार मातापिता को 1400 रूपए की सहायता राशि भी उपलब्ध कराती है। साधना पंद्रह साल से आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं, उनकी आंगनवाड़ी में सौ बच्चे दर्ज हैं, इस तरह से देखा जाए तो गोरवा गांव में केवल तीन प्रतिशत कुपोषण है। वह बताती हैं कि जब से मुख्यमंत्री की बलराम ताल योजना के तहत तालाब बने हैं और गांव में खेती की स्थिति बेहतर हुई है, म​हिलाओं का खानपान भी सुधरा है और यहां के बच्चे अब बहुत स्वस्थ हैं।

गांव के लोग तत्कालीन कलेक्टर उमाकांत उमराव को अब भी सम्मान के साथ याद करते हैं। वह अपने गांव की बदली हुई तस्वीर का श्रेय कलेक्टर और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को देते हैं, जिनकी कोशिशों से उनके गांव की खेती एक दशक में लाभ का धंधा बन गई है। गोरवां गांव से प्रेरित होकर आसपास के तकरीबन एक दर्जन गांवों में बलराम ताल बन गए हैं एक गांव से यह इलाका एक​ विकसित क्षेत्र में तब्दील हो रहा है।  वह दुआ करते हैं कि हमारे गांव के जैसी खेती पूरे प्रदेश की हो जाए, तो सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी।

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