राकेश कुमार
मालवीय
भोपाल। ‘थोड़ा सा भी
बुखार तेज होता तो धड़कनें बढ़ जातीं। सांस लेने में परेशानी कई तरह की शंकाओं को
जन्म दे देतीं। शरीर तो बीमार है ही, बार—बार मन में उठती शंकाएं दिमाग की तंदुरुस्ती भी छीन लेती। इंतजार केवल एक ही
चीज का रिपोर्ट। कोरोना—कोविड19 की
रिपोर्ट आए और मन को तसल्ली मिले। परिणाम चाहे पाजीटिव हो या नेगेटिव।‘ सेम्पल देने
से रिपोर्त आने तक के वक्त को याद करके सुनीता अब भी सहर उठती हैं। सुनीता बताती
हैं कि ‘यह चार दिन उनकी जिंदगी में त्रासदी की तरह
बीते हैं।‘
सुनीता अकेली ऐसी संदिग्ध नहीं है जो कोविड—19 को इस तरह
महसूस कर रही हैं। मध्यप्रदेश में टेस्टिंग की गति धीमी है। रिपोर्ट आने में तीन
से चार दिन का समय औसतन लग ही रहा है। खासकर दूर—दराज के जिलों
से तो परिवहन में ही समय लग जा रहा है फिर लंबी लाइन। ऐसे में बीच का वक्त केवल
संदिग्ध मरीज के लिए ही नहीं आसपास वाले लोगों के लिए भी बैचेनी भरा साबित हो रहा
है।
सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता आर्य मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में गैरतगंज नामक कस्बे
में रहती हैं। गैरतगंज मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से सौ किलोमीटर की दूरी पर
स्थित है। यह एक तहसील मुख्यालय है। 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां की जनसंख्या
18090 है। यहां पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र है।
सुनीता गैरतगंज में लगभग चार साल से सामाजिक मुददों पर काम कर रही हैं। अपनी
सक्रियता के कारण वह यहां प्रशासन और समुदाय में पहचान रखती हैं। वह अपने दो
बच्चों और माता—पिता के साथ गैरतगंज की एक घनी आबादी वाली बस्ती में रहती हैं।
देश में कोविड—19 का खौफ
पसरने लगा तो उन्होंने इस वायरस की गंभीरता को समझा। तय किया कि अपने क्षेत्र में
इसके लिए जागरुकता अभियान चलाना चाहिए। अपने समुदाय में वह इसके लिए कई लोगों से
मिलती रहीं। उन्हें हाथ धोने और सोशल डिस्टेंसिंग के लिए प्रेरित करते रहीं।
‘जनता कर्फ्यू’ के दो दिन
पहले उन्हें पता चला कि नजदीकी गांव मदनपुर ग्राम पंचायत शहीदपुर में प्रेम नारायन
अहिरवार के घर 21 मार्च को एक तेरहवीं एवं गंगाजली कार्यक्रम होने वाला है। इस
कार्यक्रम में कई लोग जमा होने वाले थे। इसकी जानकारी उन्होंने तहसीलदार को दी।
तहसीलदार के निर्देश पर वह इसकी समझाइश देने के लिए मदनपुर पहुंची। वहां पर
तेरहवीं करने वाले परिवार से मिलीं और इन्हें संभावित खतरे से अवगत कराया। परिवार
ने सुनीता की बात को समझा और तय किया कि बड़ा कार्यक्रम नहीं करेंगे। अपने
रिश्तेदारों को फोन करके आने से मना करेंगे। सुनीता ने गांववालों को 104 हेल्प
लाइन नंबर पर किसी भी परेशानी से बात करने की जानकारी दी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा कर दी। लॉकडाउन के दिन गुजर ही रहे थे कि 1 अप्रैल से
सुनीता को अपनी तबियत थोड़ी खराब लगी। सर्दी—जुकाम का
अहसास हुआ। 2 अप्रैल को तेज बुखार आया। पसीना भी निकलने लगा। यह भी लगा कि सांस
लेने में मुश्किल हो रही है। वह घबरा गईं। यह सारे लक्षण तो उसी खौफनाक बीमारी के
हैं जिसके लिए वह लोगों को समझाइश देती घूम रही थीं। किसी भी स्थिति के लिए
प्रशासन के साथ मिलकर काम कर रही थीं। लोग आइसोलेट हो सकें। इसके लिए अपने घर के
पास स्थित एक छात्रावास में आइसोलेशन सेंटर बनवाने के लिए तैयारी करवा रही थीं। एक
अन्य आइसोलेशन सेंटर सामुदायिक स्वास्थ्य
केन्द्र के नए भवन में बनाया गया था। क्या
पता कि यह तैयारी उनके खुद के लिए की जा रही थी ?
सुनीता घबराकर गैरतगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में पहुंचीं। उनको लग रहा
था कि वह वायरस की चपेट में हैं। शारीरिक लक्षणों को देखकर उन्होंने तय किया कि वह
खुद को आइसोलेट करेंगी। वह एक घनी आबादी वाले इलाके में रहती हैं। उनके दो बच्चों
और माता—पिता की सुरक्षा के लिए यह जरूरी लगा। डॉक्टर ने उसी को देखते हुए उनका सैंपल
लिया। टेस्टिंग की व्यवस्था सबसे नजदीक सौ किलोमीटर दूर भोपाल में है।
मध्यप्रदेश में टेस्टिंग की रफतार बहुत धीमी है। सात करोड़ की आबादी वाले
मध्यप्रदेश में आठ अप्रैल तक भी पांच सौ
टेस्ट प्रतिदिन की क्षमता ही हासिल हो पाई है। तीन लैब भोपाल में हैं, जबकि एक लैब इंदौर, जबलपुर और
ग्वालियर में काम कर रही है। मुख्यमंत्री सोशल मीडिया पर लगातार एक्टिव है।
उन्होंने टेस्टिंग क्षमता को बढ़ाकर एक हजार टेस्टिंग प्रतिदिन पर लाया जाएगा, लेकिन इसके लिए समय सीमा नहीं बताई है।
हेल्थ बुलेटिन के अनुसार प्रदेश में 5 अप्रेल तक किसी भी स्थिति से निपटने के
लिए 29914 बेड हैं। जबकि 9492 बेड को चिन्हांकित किया गया है। 1598 आईसीयू बेड
क्षमता है। सात करोड़ की आबादी वाले एमपी में 993 वेंटीलेटर उपलब्ध हैं। स्वास्थ्य
अमले की भी अपनी चुनौतियां हैं।
इन्हीं परिस्थितियों के बीच सुनीता ने प्रशासन के साथ अस्पताल के आइसोलेशन
सेंटर का भ्रमण किया था तब भी व्यवस्थाएं ठीक नहीं थीं। सुनीता ने बताया कि
“2 अप्रेल को
वह उसमें भर्ती होने पहुंचीं उस दिन भी व्यवस्थाएं जस की तस बनी रहीं। पीने का
पानी भी नहीं था। पानी लेने सेंटर दूर जाना था, जाहिर है जो मरीज आइसोलेशन में होगा वह नहीं
जाएगा। पंखा नहीं चल रहा था,क्योंकि उसकी
फिटिंग ठीक तरह से नहीं हुई थी। टॉयलेट में पानी नहीं था। न ही मग—बाल्टी। चादर मैले थे। लगभग तीन बजे तक जब खाने को भी कुछ नहीं मिला। कोई ठीक
से रिस्पांस भी नहीं कर रहा था। इस परिस्थिति में 14 दिन गुजारना कठिन था। मैंने
वहां डयूटी डॉक्टर्स को घर जाने को निवेदन किया। डॉक्टर ने परेशानी पूछी। फिर
पैरासिटामोल की दवा देकर घर जाने की इजाजत दे दी। मैंने खुद को घर पर कोरेंटाइन
किया, क्योंकि छात्रावास में आइसोलेशन सेंटर बनाया
गया था उसमें बिस्तर तो लगा दिए गए थे, लेकिन उसे तब
तक सेनेटाइज नहीं किया गया था। पर मेरा मन तो जैसे रिपोर्ट में ही लगा था।“
सुनीता ने अनुमान लगाया कि गैरतगंज सरीखी जगह में टेस्ट होकर रिपोर्ट आने में
लगभग चार से पांच दिन का समय लगने वाला था। दूसरे दिन जब ज्यादा तकलीफ होने लगी।
सांस लेने में तकलीफ होने लगी।
प्रशासन में जान—पहचान होने के
बाद भी उनको सहायता मिलना मुश्किल होता रहा। घबराकर उन्होंने अपने भोपाल के
नेटवर्क साथियों को फोन किया। भोपाल के साथी एक्टिव हुए तब जाकर उनकी गंभीरता को
समझा गया। सुनीता समुदाय में सक्रिय थीं तो डर था कहीं इस बीच यह फैल न हो गया हो।
रिपोर्ट जल्दी मिलना जरूरी था। कुछ टिवट कलेक्टर को किए गए।
कलेक्टर ने फोन पर सुनीता से बात की। आश्वासन दिया कि जल्दी रिपोर्ट बुलाएंगे।
वह घबराये नहीं. वह पूरी मदद करेंगे।
अगले दिन पटवारी घर में राशन का कुछ सामान रख गए। नजदीकी आइसोलेशन सेंटर में आक्सीजन
लेवल चेक करवाने पहुंची तो वहां मशीन काम ही नहीं कर रही थी। वहां मौजूद स्टाफ ने
उनको कह दिया कि आपको अस्पताल ही जाना पड़ेगा। यह दिन भी बहुत भारी पड़ रहा था।
4 अप्रैल को एक डॉक्टर घर पर देखने आया। उसने देखा और बता दिया कि “सुनीता
आपकी रिपोर्ट नेगेटिव है।“ राहत की गहरी सांस ली। उन्होंने धन्यवाद कहने के
लिए कलेक्टर को फोन किया। पर कलेक्टर ने बताया कि “उनकी तो रिपोर्ट अभी आई ही
नहीं है।“
यह सुनकर सारी तसल्ली एक पल में उड़ गई। गुस्सा भी आया कि “यह कैसा नाटक
उनके साथ हो रहा है।“ डॉक्टर नेगेटिव रिपोर्ट होने का कहकर चला गया है, और कलेक्टर रिपोर्ट आई ही नहीं बता रहे हैं।
सुनीता ने बताया
“सचमुच उस दिन मेरे मन बहुत भारी हो गया था। कई तरह के ख्याल आ रहे थे। बच्चों की फिक्र हो रही थी। सोचा भोपाल भाग जाउं। वहीं इलाज कराउं। फिर सोचा अंडग्राउंड हो जाउं। क्योंकि कहीं से भी ठीक रिस्पांस नहीं मिल रहा था। पता नहीं चल रहा था कि हो क्या रहा है ?”
रिपोर्ट आती भी तो कैसे। मध्यप्रदेश में हालात बेहद खराब होते जा रहे हैं।
सियासी संकट से पहले ही तैयारियों में लेट हो चुके मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य अमला
भी बीमार हो गया। अब तक सुरक्षित रहे भोपाल में सरकारी अधिकारियों के संक्रमित
होने से मुश्किल और ज्यादा हो गई।
पांच अप्रैल को जारी मीडिया बुलेटिन के अनुसार मध्यप्रदेश में कोरोना संक्रमण
के 225 मामले सामने आ चुके थे। इसी दिन भोपाल में कोरोना से पहली मौत की खबर भी आ
रही थी। यह खबरें घबराहट और बढ़ा रही थीं। जैसे तैसे खुद को काबू में कर रखा था।
दोस्तों से बात करतीं। बार—बार अपनी टेवल
हिस्टी याद करतीं। दोस्त भरोसा देते कि धीरज रखो रिपोर्ट नेगेटिव ही आएगी। पर मदद
के लिए तो कोई भी नहीं आ सकता था। सभी अपने—अपने घरों में
थे। सब मजबूर थे।
इसी दिन दोपहर को कलेक्टर उमाकांत भार्गव का फोन आया। बताया गया कि “रिपोर्ट
नेगेटिव है।“ सांस में सांस आई। बुखार तो फिर भी था, पर कोरोना का खौफ खत्म हुआ।
दोबारा अस्पताल में खून की जांच कराई तो वायरल फीवर और टाइफाइड निकलकर सामने
आया। हीमोग्लोबिन भी कम था। पर राहत थी कि वह नहीं था जिससे इस वक्त पूरी दुनिया
में कोहराम मचा है।
सुनीता ने अपने टिवटर पर कलेक्टर को लिखा “आप के प्यार, आशीर्वाद और स्नेह से मेरी कोविड 19 की रिपोर्ट नेगेटिव आई है। आप का तहे दिल से बहुत—बहुत धन्यवाद। यदि इन 4 दिनों के भीतर मानसिक तनाव के कारण मेरे व्यवहार या बातों से आपको ठेस पहुंची तो मैं क्षमाप्राथीं हूं।“
सुनीता बताती हैं कि “इस वक्त सैकड़ों लोगों की जिंदगी में मेरी जैसी ही कहानी किसी और रूप में चल रही है। कई जगह अखबारों में खबरें आ रही हैं कि लोग आइसोलेशन सेंटर्स से भाग रहे हैं। ऐसे में सबसे जरूरी दो काम हो जाते हैं एक सैंपल लेने से रिपोर्ट आने तक के वक्त को कम से कम किया जाए, यानी टेस्टिंग की गति बढ़ाई जाए। और दो आइसोलेशन सेंटर की व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाए, क्योंकि यही वह जगह है जहां से इस वायरस की चेन को तोड़ा जा सकेगा।“
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