सोमवार, जनवरी 22, 2018

भाग 1 - आक्रामकता के कारण एवं समाधान


इस वक्‍त हि‍ंसा अपने वीभत्‍स रूप में सामने आ रही है। यह वह दौर है जब आदमी छोटी सी बातों पर हैवानि‍यत पर उतरने को आमादा है। हि‍ंसा या एक कि‍स्‍म की आक्रामकता पर वरि‍ष्‍ठ पत्रकार और लेखक श्री चि‍न्‍मय मि‍श्र ने पि‍छले दि‍नों एक लंबा आलेख लि‍खा था। यह एक बहुत महत्‍वपूर्ण आलेख है। इसे हम सोलह भागों की एक सीरीज के रूप में पटि‍येबाजी पर प्रकाशि‍त कर रहे हैं। उम्‍मीद करते हैं कि‍ आप इसे उपयोगी पाएंगे। आपकी प्रति‍क्रि‍याओं का स्‍वागत और श्री चि‍न्‍मय मि‍श्र का अाभार - राकेश मालवीय
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पढ़ि पढ़ि के पत्थर भया, लिखि लिखि भया जु ईंट।
कहैं कबीरा प्रेम की लागी न एकौ छींट।

कबीर
मानव सभ्यता के इतिहास में पिछले 100 वर्ष अशांति और हिंसक उथलपुथल के रहे हैं। पिछले ही वर्ष प्रथम विश्वयुद्ध के प्रारंभ के 100 वर्ष पूरे हुए हैं। पहले विश्वयुद्ध से दूसरे विश्वयुद्ध के बीच के दो दशक भी असंतोष से भरे हुए रहे और अंततः द्वितीय विश्वयुद्ध ने मानव की युद्धप्रियता या लड़ाकूपन को एक नये मुकाम पर पहुंचा दिया। 

आज हम इस लड़ाई के प्रति मनुष्य के लगाव को सिर्फ आतंकवाद का पर्याय भर मान रहे हैं। पहले हम अंग्रेजी शब्द डपसपजंदबल के शाब्दिक अर्थ को समझते हैं। इसका अर्थ हुआ युद्ध के प्रति उत्साह। इसका एक और बहुत अनूठा भारतीय पर्यायवाची है युयुत्सु। 

हममें से जिसने महाभरत को पढ़ा है वे इस चरित्र की जटिलता और परिस्थितियों से अच्छी तरह से वाकिफ ही होंगे। इस युद्धप्रियता को अपनाने वाला अग्रेंजी में Militancy कहलाया। यानि लड़ाका चरित्र और विशेषकर किसी सेवा या उद्धेश्य के लिए आक्रामक । ऐसा व्यक्ति एक राजनीतिक कार्यकर्ता भी हो सकता है। वहीं एक अन्य परिभाषा इस युद्धप्रियता को ऐसी स्थिति या परिस्थिति बताती है जो कि संघर्ष हेतु प्रवृत हो या किसी योद्धा से लड़ने को तैयार हो। 

वहीं मिलिटेंट या युयुत्सु की एक परिभाषा के अनुसार एक सक्रिय व्यक्ति जो कि किसी उद्देश्य या विश्वास (आस्था) का हिमायती हो। परंतु हम मिलिटेंट और आतंकवाद के इस  फर्क को मिटाकर एक ऐसी परिस्थिति निर्मित कर देना चाहते हैं, जिसमें किसी समझौते की कोई गुंजाइश ही न हो। 

आप इंटरनेट पर जाकर History of Militanty या Militant टाइप करें आपके सामने जो साइट्स खुलती हैं वे सिर्फ Islamic Militancy के बारे ही जानकारी देती हैं। क्या किसी और तरह की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक या धार्मिक आक्रामकता और उसके साथ की अतियों का कोई अस्तित्व ही नहीं है, पूरी दुनिया एक पक्ष की आक्रामकता को आक्रामकता मान रही है

ठेस हिंसक उत्साह के बरस्क यदि आतंकवाद को परिभाषित करें तो स्थितियां ज्यादा स्पष्ट दिखाई देती हैं। वैसे आतंकवाद की कोई निश्चित परिभाषा हमारे सामने नहीं आती। अतएव इसे व्याख्यायित करने की छूट भी हम सबने ले ली है। किसी एक के लिए आतंकवाद चरम हिंसा है तो दूसरे के लिए अपनी मुक्ति या स्वतंत्रता का मार्ग। यानि इससे निपटने के लिए इसे स्पष्ट तौर पर परिभाषित किए जाने की भी अत्यन्त आवश्यकता है। 

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखे तो पहली शताब्दी ईस्वी की कुछ घटनाओं को आतंकवाद की श्रेणी में रखा जाता है। परंतु इस शब्द को वास्तविक मान्यता सन् 1789 में शुरु हुई फ्रांसीसी क्रांति के लंबे संघर्ष के दौरान सन् 1795 में मिली। तब से इसका प्रयोग थोड़ा व्यापक हुआ। 

20 वीं शताब्दी में इसका प्रचलन बढ़ा और संयुक्त राष्ट्र संघ ने सन् 1963 से इसे रोकने के प्रयत्न शुरु कर दिए थे। तीन दशकों के मनन के पश्चात सन् 1997 मे संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसे एक पूर्ण परिभाषा तो नहीं दी, लेकिन इसे व्याख्यायित करते हुए कहा कि, सामान्य व्यक्तियों या किन्ही विशिष्ट व्यक्तियों को समूहों को राजनीतिक उद्देश्यों हेतु आपराधिक गतिविधियों के माध्यम से राजनीतिक उद्देश्यों हेतु उत्तेजित करने या भड़काने को किसी भी स्थिति में न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। 

भले ही फिर यह कार्य राजनीतिक, दर्शन, विचारधारा, नस्ल, जातीय, धार्मिक या किसी भी अन्य प्रकृति का हो, उसे न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।इसके पश्चात संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी इस व्याख्या को और विस्तारित किया। 

जारी

1 टिप्पणी:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन राष्ट्रीय मतदाता दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...