शुक्रवार, जून 19, 2015

बकरी तेल लगाती है, कंघी करती है…!


राकेश कुमार मालवीय

शीर्षक को समझने के लिए आपको यह लेख पूरा पढ़ने की जेहमत उठानी होगी। यह रिपोर्ट जो मैं लिख रहा हूं उसमें यह घटना सबसे आखिर की भी है। संभवतः सबसे मजेदार और तीखी भी। यह उस सरकारी सिस्टम का उम्दा प्रतीक बनकर सामने आती है, जिसके तहत जनकल्याण की योजनाएं जमीन तक पहुंचती हैं, आज भी। 

यह मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले का डुंगरा धन्ना गांव है। अमूमन जिला मुख्यालय से सटे गांव इतने पिछड़े नहीं होते। झाबुआ राजधानी से दूर है आखिर में। उसके समानुपाती डुंगरा धन्ना गांव भी झाबुआ से दूर ही है। जिला मुख्यालय से इसकी दूरी चार किमी है। रोड़ तो आ गई है यहां तक। आगे हम बता रहे हैं कि क्या नहीं है और क्या कैसा है।

जून माह की गर्मी में यहां एक विशेष ग्राम सभा का आयोजन किया जा रहा है। दिल्ली से आई एक पत्रकार के आग्रह पर यह ग्रामसभा की जा रही है। जिला पंचायत सीईओ एस नागराजू ने इसके लिए आदेश जारी किया है.
सुबह 9 बजे ग्राम सभा का वक्त तय है। ठीक समय पर हम डुंगरा धन्ना गांव में खड़े हैं। यह एक खेत है सूखा हुआ। गांव के कोने पर ही। झाबुआ जिले में केवल एक ही फसल ली जाती है, मानसूनी बारिष पर आधारित। खेत में टेंट लगाया जा रहा था। झाबुआ से टैम्पो में भरकर कुर्सियां लाई गई हैं। कुछ कुर्सियां प्लास्टिक वाली हैं। मंच के पीछे कुर्सियां आला दर्जे की हैं।


टेबल पर सफेद झक नया कपड़ा लपेटा है। व्यवस्थापक लाउड स्पीकर लगाने के लिए जगह खोज रहा है। प्रधानमंत्री बीमा योजना के तहत बैंक वालों ने भी अपना काउंटर लगा लिया है। आज गांव वालों का बीमा होना तय है। बैंक वाले समझा रहे हैं 12 रूपए में आपको काफी फायदा है। गांववाले बैंक वालों की इस बात को समझने कि कोशिश कर रहे हैं.

आयोजक मैडम की पहली प्रतिक्रिया ‘अरे आप अभी से आ गए।‘ वह हमारे समय पर गांव पहुंचने से अचरज में हैं, थोड़ी असहज भी। मैडम कह रही हैं ‘व्यवस्था करने में थोड़ा समय तो लग ही जाता है।‘ कुछ और अधिकारी भी पहुंच गए हैं। उन्होंने काम तेज करने का आदेश जारी कर दिया है। गांव वालों को जमा करने की कवायद तेज हो गई है।

तभी एक महिला ने हमसे आकर राम-राम की। मैडम ने बताया कि यह सरपंच हैं यहां की। उनके साथ दो और महिलाएं है। मैडम ने कहा ‘घूंघट क्यों लिया है इतना, घूंघट करोगी तो बात कैसे करोगी ?‘

सरपंच ने बताया कि ‘वह इसी साल सरपंच बनी हैं। समूह चलाती हैं गांव में महिलाओं का। उसी से कुछ अच्छे काम करवाए हैं। 65 हजार रूपए की बचत की है।‘ गांव के लोगों को एक प्रतिशत ब्याज पर कर्ज देती हैं, यह बाजार में बैठे साहूकार 10 प्रतिशत पर देते हैं। समूह से जुड़कर उनका आत्मविश्वास बढ़ा था। आठ उम्मीदवारों को हराकर वह 125 वोटों से जीती हैं।

धीरे-धीरे भीड़ बढ़ रही है। हम सवाल कर रहे हैं। सवालों और जवाबों के बीच सरकारी अधिकारी हैं। वह इन्हें अपने हिसाब से करेक्ट करवा रहे हैं। टेंट के नीचे दो समूह बन गए हैं। आगे महिलाएं बैठी हैं। पीछे पुरूष जमा हैं। महिलाएं बता रही हैं सबसे बड़ी समस्या पेयजल की है। नदी का पानी पूरी तरह सूख गया है, गर्मियों में बहुत मुश्किल होती है।

सरपंच महोदय का सपना है कि हर घर में शौचालय होना चाहिए। स्वच्छता अभियान के अधिकारी से उनकी कई शिकायते हैं। पैसा न आने की। मंच से उनका एक भाषण होता है मंच से। इसमें वह स्वच्छ रहने के फायदे सहित योजनाओं की तमाम जानकारी देते हैं। अच्छी बात है कि उनका पूरा भाषण भीली में है। इस भाषा से अनजान हम भाषण समझने की कोशिश कर रहे हैं। एक महिला से सवाल करते हैं कि ‘शौचालय बन भी गया तो उसके संचालन के लिए पानी कहां से आएगा। नदी तो सूखी पड़ी है।‘ इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
ग्राम सभा होती है या नहीं होती है, यह सबसे बड़ा सवाल बन गया है। लोग कह रहे हैं पच्चीस साल में डुंगरा धन्ना गांव में पहली बार ग्राम सभा बैठी है। अधिकारी बता रहे हैं कि ‘होती है, लेकिन आप आते ही नहीं हैं। आप आओगे नहीं तो कैसे होगी।‘
अधिकारी हमारी तरफ मुखातिब हैं, उनका कहना है गांव वाले मजदूरी के लिए निकल जाते हैं झाबुआ। तो इन्हें ग्राम सभा का पता ही नहीं चलता, ये लोग खुद ही नहीं आते।‘ गांव वाले सवाल करते है ‘यदि ऐसा होता तो हम भी आज की ग्राम सभा में क्यों आते, मजदूरी करने ही क्यों चले जाते।‘ अधिकारी इस जवाब पर खामोश हैं,
अधिकारी महोदय ग्राम सचिव से रजिस्टर मांगते हैं। पिछली ग्रामसभा का एजेंडा मांगते हैं। सचिव के पास वह रजिस्टर ही नहीं है,  दूसरा रजिस्टर अधिकारी को पकड़ा देते हैं, पढ़ते-पढ़ते सचिव से कहते हैं ‘जब कल फोन पर बताया था न तो लाए क्यों नहीं। आप लोग भी कलेक्टर से कम नहीं।‘ रजिस्टर को जमीन पर पटक देते हैं।
सभा में एक और व्यक्ति बहुत सक्रिय है, गांववाले से हमने पूछा यह सज्जन कौन हैं, उन्होंने बताया ‘एसपी साहब हैं.’ एस पी साहब यानी सरपंच पति.


कुछ लोग मनरेगा के जॉब कार्ड ले आए हैं घर से। अंदर सारे खाली हैं। उनके साथ उनकी तस्वीर लेने पर अधिकारी सक्रिय हैं। उनका फोकस ग्रामसभा पर नहीं है। पूरा ध्यान इस बात पर है कि हम किनसे क्या बात कर रहे हैं क्या तस्वीरों में उतार रहे हैं। वह कह भी रहे हैं ‘मैडम कवर पेज के साथ फोटो ले लीजिए।‘ दो घंटे की कवायद में उनका चेहरे के भाव बदल गए हैं।

हम अपने अगले पड़ाव की तैयारी कर उनकी इजाजत मांगते हैं गांव वालों से विदा लेते हैं। विदा की बेला पर महिला अधिकारी समूह की महिलाओं से एक गीत गाने को कहती हैं। भीली में एक बेहद सुंदर गीत महिलाएं सुनाती हैं।

जाते-जाते अधिकारी हमें गांव में मुर्गियों का एक शेड देखने के लिए कहते हैं। बकौल साहब ‘हमने कई गांव में इस तरह के शेड बनवाए हैं, इससे मुर्गियों को फायदा हो रहा है।‘ हम उनके साथ शेड देखने चले जाते हैं। खिड़की से अंदर झांककर देखते हैं अंदर तेल, कंघी, बिस्तर और मनुष्य के रहने का सामान दिखाई पड़ता है। मुर्गियों नहीं है वहां।

यह देखकर अधिकारी झल्लाते हैं। उधर से दौड़ते हुए शेड का हितग्राही भी आ जाता है। उससे अधिकारी सवाल करते हैं ‘मुर्गियां कहां हैं ?’ हितग्राही जवाब देता है ‘साहब ये शेड तो बकरी का है मुर्गियों के तो उधर बने हैं।‘

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