शनिवार, मई 04, 2013

धान के कटोरे से गायब होते किसान


राकेश कुमार मालवीय

भूमंडलीकरण, बेलगाम औद्योगीकरण की प्रक्रियाओं के परिणाम में जो अनुमान लगाए जा रहे थे वह अब तथ्य के रूप में हमारे सामने आ रहे हैं। यह तथ्य बेहद खतरनाक हैं, लेकिन किसी भी रूप में अप्रत्याशित नहीं। जिन नीतियों पर हम पिछले सालों में आगे बढ रहे हैं, उनको देखकर ऐसा तो होना ही था।
फोटो: विनय वर्मा

पिछले दिनों छत्तीसगढ़ राज्य के जनसंख्या के आंकड़ों को सामने रखा गया। इसमें बताया गया कि राज्य के किसानों की संख्या में 12 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है। दूसरी तरफ राज्य में कृषि मजदूरों की संख्या में इजाफा हुआ है।

जनगणना रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ में किसानों की संख्या में खासी कमी आई है। 2001 से 2011 के दशक में किसानों की संख्या 450,000 घट गई है।

इस बारे में छत्तीसगढ़ जनगणना निदेशक रेणु पिल्लई ने कहा, 2001 में छत्तीसगढ़ में किसानों की संख्या 3,488,672 थी, जो 2011 में कम होकर 3,038,094 हो गई।Ó उन्होंने कहा कि इस अवधि के दौरान राज्य में कृषि मजदूरों की संख्या 1,552,083 से बढ़कर 2,505,999 हो गई।

इसका मतलब क्या है। इसका मतलब यह भी है कि राज्य में छोटे जोत के किसानों की जमीनें तमाम कारणों से बाजार का शिकार बनी हैं और यह किसान अब अपनी ही जमीनों पर मजदूर बनने के लिए मजबूर हैं। यदि सरकार के ही आंकड़े यह बताते हैं तो इसे अलग से सिदध करने की क्या जरूरत है। मोटे तौर पर ही देखें तो सरकार ने अकेले एक नया रायपुर शहर बनाने में लगभग 37 गांव के किसानों की जमीनों का अधिग्रहण किया। अब इस जमीन पर एक ऐसे आलीशान शहर का निर्माण किया जा रहा है जहां कि एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का हवाई अड्डा है और एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का क्रिकेट खेल मैदान। मजे की बात तो यह है कि जिन लोगों की जमीनों पर इतने आलीशान शहर की कल्पना की गई उनके हिस्से में इन क्रिकेट मैदानों में पार्किंग वसूलने का सबसे घटिया किस्म का काम मिल रहा है। इन गांववालों के बलिदान की ​कीमत संभवत: इससे पहले इस हास्यास्पद रूप में कभी नहीं मिली होगी।  

लेकिन सरकार को इनकी चिंता नहीं है। बात वही है विकास के लिए किसी न किसी की बलि तो चढ़ानी ही होगी। बात मान भी ली जाए, लेकिन हर बार यह बलि किसानों, आदिवासियों की ही क्यों ली जाए। और फिर बलि का प्रतिफल जिस रूप में इन लोगों को मिलना चाहिए उस वक्त समाज और सरकार खामोश बैठ जाते हैं, या इस रूप में पार्किंग की वसूली कर तमाशा ही बन जाता है। पिछले साल नवंबर में भी नया रायपुर में ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट का आयोजन किया गया था, इसमें तमाम बड़ी हस्तियों को बुलाने के लिए सरकार ने रेड कॉरपेट तैयार किया। इस पूरे आयोजन में भी स्थानीय उद्योगों की, छोटे उदयोगों की सिरे से ही अनरेखी की गई थी। इस मीट के छह महीने बाद उसमें हुए करारों का विश्लेषण किया जाए तो कुछ खास हमारे हाथ में आता नहीं है।  


इस जनगणना के आंकड़ों में उस राज्य के किसानों की स्थिति जो एक समय में हजारों किस्म के धान उगाने में सक्षम थे, उनकी स्थिति नीतियों का एक पूरा विश्लेषण मांगती हैं।  एक दशक में राज्य में कृषि मजदूरों की संख्या में 70 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी हुई है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जनगणना से स्पष्टï है कि राज्य में छोटे और मंझोले किसानों को अपनी जमीन गंवानी पड़ी है। ऐसा या तो औद्योगिक परियोजनाओं या ढांचागत विकास कार्यों की वजह से हो सकता है। 

यहां के किसान नेता वीरेंद्र पांडेय कहते हैं, 'चूंकि, किसानों की संख्या में जबरदस्त कमी आई है, इसलिए इससे साबित होता है कि कई छोटे और मझोले किसान अपनी जमीन खो चुके हैं। वह कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में ज्यादातर छोटे या मध्यम दर्जे के किसान हैं और इनको ही नीतियों के जरिए संरक्षण देना बेहद जरूरी है नहीं तो यहां की कृषि व्यवस्था चौपट हो सकती है। 

वह बताते हैं कि एक और किसान कम हुए हैं और कृषि मजदूरों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, इससे भी किसानों के जमीन गंवाने की बात सिद्ध होती है। पांडेय कहते हैं कि किसानों की संख्या कम होने के आधिकारिक आंकड़े राज्य सरकार के किसान हितैषी होने के दावे खारिज करते हैं।

वैसे देश् के परिदृश्य के बरअक्स भी देखें तो केवल छत्तीसगढ़ में ही  यह अनोखी स्थिति नहीं है। जनगणना के ही आंकड़े बताते हैं कि देश में 1991 के बाद से किसानों की संख्या करीब 1.50 करोड़ घट गई है, जबकि 2001 के बाद यह कमी 77 लाख से थोड़ी ज्यादा है।

वरिष्ठ पत्रकार पी साईंनाथ के विश्लेषण के मुताबिक पिछले बीस सालों में हर दिन औसतन 2035 काश्तकार या किसान अपनी स्थिति से बेदखल होते जा रहे हैं। 

पूंजीपतियों और वैश्विक बाजारों के लिए पलक—पांवड़े बिछाने वाली सरकारों को यह आंकड़े चिंता में नहीं डालते यह बहुत ही हैरत की बात है। यह जरूर है कि छत्तीसगढ़ में विदर्भ की तरह किसान आत्महत्याओं के मामले सामने नहीं आते,

एनसीआरबी के मुताबिक वर्ष 2007 में छत्तीसगढ़ में 1593 किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने का आंकड़ा दर्ज हुआ| यह संख्या सन 2006 के मुकाबले 110 ज्यादा रही| आंकड़ों के विस्तार में जाने पर मालूम चलता है कि सबसे अधिक किसान आत्महत्याएं (287) रायपुर जिले में हुईं|

आंकड़ों पर भरोसा करें तो रायपुर इससे पूर्व भी हर साल सबसे ज्यादा किसान आत्महत्याओं वाला जिला रहा है| रायपुर के बाद दुर्ग (206) और महासमुंद (143) का नंबर रहा|इन जिलों को यहां के समृदध जिलों में गिना जाता है। 
आंकड़ों को क्षेत्रवार ढंग से देखने पर मालूम चलता है कि उत्तर छत्तीसगढ़ के 6 आदिवासी जिलों में किसान आत्महत्या की सम्मिलित संख्या 312 रही जबकि दक्षिण के 5 जिलों में यह संख्या 240 थी|

मध्य छत्तीसगढ़ किसान आत्महत्याओं के मामले में सबसे अव्वल रहा जहां 1040 किसानों ने विभिन्न कारणों (?) से आत्महत्या कर ली| 

सन 2006 में छत्तीसगढ़ में जिन 1483 किसानों द्वारा आत्महत्या के आंकड़े देखने को मिलते हैं, वह केवल उन किसानों की संख्या है, जिनके नाम पर जमीन है| यानि इन 1483 किसानों में खेतों में काम करने वाले मजदूर, अधिया/रेगहा लेकर किसानी करने वाले किसान शामिल नहीं हैं| 

सार्वजनिक वितरण प्रणाली की उम्दा व्यवस्थाओं ने यहां बहुत हद तक भुखमरी की नौबत से भी निजात दिलाई है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि लाल आतंक से जूझते प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में घुसकर सच्चाई की पड़ताल करने की हिम्मत न तो यहां अब तक कोई नहीं दिखा पाया है। यही वजह है कि प्रदेश के एक हिस्से के अंदरखानों के समाज में क्या चल रहा है यह अब भी एक पहेली ही बना हुआ है। 

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