शुक्रवार, सितंबर 23, 2011

सतना में बच्चों की मौत: क्यों नहीं लेते सबक



राकेश  कुमार मालवीय 

इन्हें मौत नहीं हत्या कहना ही लाजिमी होगा। मध्यप्रदेश  में बच्चों की लगातार मौत क्या प्रकृतिजन्य है या जिम्मेदार लोगों की लापरवाही का परिणाम। इस सवाल पर गौर किया जाना बेहद जरूरी इसलिए हो जाता है क्योंकि एक के बाद एक मासूम बच्चों की मौत का सिलसिला जारी है। ताजा मामला फिर सतना जिले के मझगवां ब्लाक  से आया है। यहां नौ दिनों के अंदर छह बच्चों की मौत होना पाया गया है। खंडवा जिले में भी जिला मुख्यालय की नाक के नीचे पोषण पुनर्वास केन्द्र में बच्चे की मृत्यु भी कई प्रष्नचिन्हों को जन्म दे रही है। सवाल यह है कि जिस मध्यप्रदेश में लाड़ली लक्ष्मी सरीखी योजना चलाकर एक बच्चों के हितैषी राज्य का चेहरा सामने लाने की कोशिश  हो रही है उसी राज्य में समाज के सबसे कमजोर बच्चों को सुरक्षा और बेहतर स्वास्थ्य देने वाले पोषण पुनर्वास केंद्रों से खदेडकर उनके बहिष्कार की एक दूसरी प्रक्रिया को अंजाम दिया जा रहा है।

सतना जिला बच्चों की सेहत के मामले में बेहद संवेदनशील  बना हुआ है। यहां वर्ष 2008 से अभी तक 156 बच्चों की मौत कुपोषण और कुपोषणजनित कारणों से हुई है। इससे यह बात साफ तौर पर सामने आ रही है कि प्रशासन बच्चों की मौतों को रोक पाने में निरंतर अक्षम साबित हो रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह भी है कि यहां आंगनवाड़ी सेवाओं से लेकर पोषण पुनर्वास केन्द्र और स्वास्थ्य संस्थाएं उस स्तर पर संवेदनशील  ही नजर नहीं आतीं, जिस स्तर की आज की परिस्थिति मांग कर रही है। 

दो गांव में 8 बच्चों की मौत

इस बार बच्चों पर मौत का कहर मझगवां ब्लाक  से महज 12 किमी की दूरी पर स्थित ग्राम किल्हौरा और चितेहरा में टूटा है। किल्हौरा गांव में तालाब तीर बस्ती है। इस बस्ती में मुख्यतः मवासी आदिवासी निवास करते हैं। यहां 1 से 9 सितम्बर के बीच ही छह बच्चे काल कवलित हो गए। इनमें मुकेषी पुत्र ददुआ मवासी उम्र पांच साल, सुनील पुत्री अच्छेलाल मवासी उम्र 11 माह, शिवनरेश पुत्र गिरधारी मवासी उम्र 1 साल, नवजात बच्ची पुत्री सिद्ध गोपाल मवासी, व इसी गांव के झिरिया घाट टोले के गोपीचन्द्र के पुत्र रामामवासी व उसी के एक साल के छोटे भाई की मृत्यु हो गई है। इन दोनों भाई की मृत्यु चेचक (छोटी माता) मीजल्स के कारण होना बताया गया है। वहीं अच्छे लाल के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इन परिवारों के पास न तो जाॅब कार्ड है और न ही राशनकार्ड ।

उधर एक अन्य आदिवासी बाहुल्य गांव चितहरा में भी दो सगी बहनों मीनू पुत्री प्रभु कोल उम्र पांच साल, व सीनू पुत्री प्रभु कोल उम्र तीन साल की मृत्यु होना पाया गया है। इन दोनों बच्चियों को उनके परिजन पोषण पुनर्वास केन्द्र, मझगवां में लेकर आए थे। परन्तु आंगनवाडी कार्यकर्ता के पोषण पुर्नवास केंद्र न पहुँचने की वजह से बच्चियों को भर्ती नहीं किया गया एवं उन्हे कहा गया कि केन्द्र में बिस्तर खाली नही है। सीनू और मीनू को खून की कमी थी और उनकी हालत ठीक न होने की वजह से उनके पिता ने उनका इलाज प्राइवेट डॉक्टर के पास भी कराया, जिसके लिए उसे अपनी जमीन 5000 रुपये में गिरवी रखनी पडी। उसे अपनी पत्नी के चांदी के गहने भी मझगवां के रमेश साहू के पास गिरवी रखने पडे। प्रभु कोल ने सीनू को शासकीय जिला चिकित्सालय में 13 जून से 26 जून तक एवं मीनू को 19 मई से 21 मई तक भर्ती रहकर इलाज भी करवाया, लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हो सका। जिला अस्पताल से सीनू को जबलपुर रैफर कर दिया गया। प्रभु कोल रूपए न होने की वजह से जबलपुर नहीं ले जा पाया। 8 जुलाई को मीनू और 11 जुलाई को  सीनू ने दम तोड़ दिया।

ताजा सर्वे में भी हालात खराब

राष्ट्रीय पोषण संस्थान के ताजा स्वास्थ्य सर्वे में भी सतना जिले में मध्यप्रदेष में सबसे अधिक कुपोषण पाया गया है। जनसंख्या स्थिरता कोष के देशव्यापी जिला स्तरीय सर्वेक्षण में में सतना जिले की स्थिति सबसे निचले पायदानों पर रही है । इस दृष्टि से यहां पर स्वास्थ्य के ढांचागत सुधार की दिशा  में आमूलचूल परिवर्तन की आवष्यकता है। लेकिन चिंताजनक तो यह है कि जिले में अब भी पोषण पुनर्वास केन्द्रों से बच्चों को लौटा दिया जा रहा है। आंगनवाडि़यां ठीक से काम नहीं कर रहीं। अस्पतालों में सही इलाज नहीं मिल रहा।

सतना जिले पिछले दो दशकों  में यहां स्थितियां सुधरने की बजाए बिगड़ी अधिक हैं। स्थानीय संगठनों की पहल पर यहां राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने फरवरी 2010 में एक जनसुनवाई की आयोजन भी किया था। इस जनसुनवाई के बाद आयोग ने जमीनी स्थितियों के मध्यनजर अपनी ओर से कुछ अनुषंसाएं भी की थीं। इस जनसुनवाई और आयोग की पहले के बाद उम्मीद यह की जा रही थी कि सतना जिले में बाल स्वास्थ्य की दिशा में कुछ बेहतर काम हो सकेगा और बच्चों की मौत का सिलसिला रूकेगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है।

सतना जिले में स्वास्थ्य संकेतांकों को (वार्षिक स्वास्थ्य सर्वे 2010-11 के मुताबिक) देखें तो स्थिति और स्पष्ट होती है। जिले की शिशु मृत्यु दर  90 प्रति हजार है, बाल मृत्यु दर 130 प्रति हजार है तथा नवजात शिशु  मृत्यु दर 63 प्रति हजार है । पोषण संस्थान, हैदराबाद के अनुसार सतना जिले में कुपोषण  का प्रतिशत 67 प्रतिशत है। यह समस्त स्थितियां चौंकाने वाली हैं।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अनुषंसाओं के बावजूद भी जिला प्रषासन की गंभीरता किसी भी स्तर पर दिखाई नहीं देती है, क्योंकि विगत वर्ष सतना जिला मुख्यालय पर शासकीय चिकित्सालय के सिक न्यू बार्न केयर यूनिट में ही में ही केवल 4 माह में 118 नवजातों की मौत हो गई।

लापरवाही और संवेदनहीनता का सबसे बडा उदाहरण सतना जिले के मझगवा विकास खंड के  किरहाईपोखरी गाँव का है, जहाँ वर्ष 2008 से बच्चो की मौतों का सिलसिला जारी है। गाँव में एक भी आंगनवाडी नहीं थी। यहाँ पर वर्ष 2010 में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने बच्चों की मौत के तुरंत बाद तत्काल एक पूर्ण आंगनवाडी खोलने के निर्देश दिए थे परन्तु प्रशासन द्वारा कोई कदम नहीं उठाया गया। कुछ दिन बाद जब इस गाँव में फिर बच्चो की मौत के मामले सामने आये तो प्रशाशन ने हडबडी में  मिनी आंगनवाडी शुरू  की जो कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश 13 दिसम्बर 2006 का भी उल्लंघन है। सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश कहता है की जिस भी गाँव में 40 बच्चो से अधिक वहां पर एक पूर्ण आंगनवाडी खोली जाएगी पर किरहाईपोखरी गांव में 40 से अधिक बच्चों के होने के बावजूद भी यहाँ पर मिनी आंगनवाडी शुरू की गयी ।

तंत्र में सुधार की आवश्यकता 

गौरतलब है कि हाल ही में मृत बच्चे आंगनवाड़ी में भी दर्ज थे। इनमें से दो बच्चों को पोषण पुनर्वास केन्द्र भी लाया गया। यहां लाने के मायने यह हैं कि वे बच्चे गंभीर रुप से कुपोषण के शिकार थे, लेकिन उन्हें नहीं बचाया जा सका। इससे इस बात पर सवालिया निशान  खड़ा होता है कि क्या तंत्र बच्चों की मौत के मामले में संवेदनशील  है ? अगर होता तो संभवतः पोषण पुनर्वास केन्द्र और आंगनवाड़ी उन्हें बचा पाने में सक्षम साबित हो सकते। आदिवासी अधिकार मंच के आनंद भाई कहते हैं कि दरअसल केवल आंगनवाडी केन्द्र और पोपुके में जाने से ही बच्चों की मौतों के मामले नहीं रुकेंगे बल्कि रोजगार के पर्याप्त साधन, समय पर मजदूरी मिलना, शासकीय योजनाओं का समुचित लाभ, प्राकृतिक संसाधनों पर आदिवासी जनों की पारंपरिक खाद्यसुरक्षा चक्र को सुनिष्चित करना बहुत जरुरी है जिसकी तैयारी किसी की भी नहीं दिखती है।



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